बुधवार, 5 अक्तूबर 2016

रामस्वरूप किसान का राजस्थानी कहानी संग्रह : “बारीक बात” 04


बारीक बात(राजस्थानी कहानी संग्रह) रामस्वरूप किसान / संस्करण : 2015 / पृष्ठ : 112 / मूल्य : 175 रुपये / प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, एफ-77, सेक्टर- 9, रोड नं. 11, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर
रामस्वरूप किसान
जन्म : 14 अगस्त, 1952 हनुमानगढ़ जिले के परलीका गांव में।
‘हाडाखोड़ी’, ‘तीखी धार’ के बाद तीसरा कहानी संग्रह ‘बारीक बात’। एक लघुकथा संग्रह और कविता की तीन किताबें प्रकाशित। अनुवादक के रूप में साहित्य अकादेमी नई दिल्ली से पुरस्कृत-सम्मानित। ‘दलाल’ कहानी अखिल भारतीय स्तर पर चर्चित। वर्तमान में ‘कथेसर’ जैसी प्रमुख कहानी पत्रिका का संपादन और प्रकाशन परलीका से डॉ. सत्यनारायण सोनी के साथ मिलकर कर रहे हैं। पहली ही कहानियों की किताब पर राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर का मुरलीधर व्यास ‘राजस्थानी’ कथा पुरस्कार 2002 में अर्पित किया गया।  प्रमुख बात कि पिछले बीस वर्षों से रामस्वरूप किसान खेत में उपजाते हैं कविता-कहानियां। किसान वैसे तो खेती करते हैं पर खुद को फुल टाइम लेखन मानते हैं। खेत की गोद में बैठकर साधना करने वाले राजस्थानी की रेत में रमने वाले माटी से जुड़े इस लेखक के हृदय में हेत का समंदर छलछलाता है। 
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पुस्तक के ब्लर्ब का अनुवाद :  

बेजोड़ यात्रा का क्लेसिकल पड़ाव 
० मोहन आलोक, श्रीगंगानगर

        आधुनिक राजस्थानी कहानी में रामस्वरूप किसान एक बड़ा नाम है। ‘हाडाखोड़ी’ जहां ग्रामीण जीवन का अत्याधुनिक चेहरा है, वहीं ‘तीखी धार’ उसका विस्तार। इसी आधुनिकता की अद्भुत भाव-भंगिमा की बेजोड़ यात्रा का क्लेसिकल पड़ाव है- ‘बारीक बात’। किसान के मनोविज्ञान और चिंतन की गहरी छाप संग्रह की प्रत्येक कहानी में देखी जा सकती है।
        किसान की कहानियां अपने कथा-शिल्प को साथ लेकर आती हैं। एक ऐसा कथा-शिल्प जिसे शिल्प नहीं, उनका भाषााई स्वभाव कहना चाहिए। यूं लगता है कि जैसे लेखक ‘मचान’ पर खड़ा अपने खेत की रखवाली कर रहा है तथा भाषा के बुलबुले उसके चहुंओर तैर रहे हैं और वह शब्दों को ज्यों चुन-चुन अपने मन से मस्तिष्क के धरातल पर उतार रहा है और इस तरह सजाता है कि उन रंगों के फकत प्रतिबिम्ब पड़ते हैं। आकार, एक-दूजे में विलीन हो जाता है। किसान की कहानियों में आई हुई फंतासी का ही कारण है कि वह लिखते-लिखते जैसे स्वप्नलोक में पहुंच जाता है। फिर झिझककर अचानक होश में आता है। यहां शायद उसके मन को मस्तिष्क की भाषा भागकर पकड़ लेती है। कहानीकार को कहना पड़ता है- ‘‘मैं खुद को मुकम्मल पाने की कोशिश में अपनी समस्त ऊर्जा संकलित कर खाट पर उछला।’’
        किसान की भाषा मां के दूध संग चूंघी हुई निखालिस और तरोताजा है। अंचल विशेष के रंगों की वर्षा से स्नात। न्यारे-निराले स्वर से सरोबोर। निश्चय ही किसी क्लासिक राग में गाई हुई हैं किसान की कहानियां।
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पाठक को अपने तिलिस्म में जकड़ती कहानियां
० डॉ. जगदीश गिरी, जयपुर
          राजस्थानी कहानी प्रायः घटना बहुल होती है, क्योंकि राजस्थानी लोककथाएं और बातें यहां के रचनाकार के चित्त में गहराई से समाई हुई हैं। कहानी की एकरूपता को तोड़ने का जरूरी कार्य राजस्थानी के प्रसिद्ध कहानीकार रामस्वरूप किसान ने अपने नए संग्रह `बारीक बात` के जरिए बखूबी किया है। इस संग्रह में शामिल कुल सोलह कहानियों में से अधिकतर कहानियां कथ्य और शिल्प के स्तर पर सर्वथा नई भंगिमा लेकर अवतरित हुई हैं।
          सामान्यतः कथ्य और घटना-बहुल कथानक के अभ्यस्त पाठक को ये चौंकाती हुई, झुंझलाती हुई, अन्ततः अपने तिलिस्म में जकड़ लेती हैं। ये कहानियां एक निश्चित विकास क्रम को तोड़ते हुए अपनी ही मंथर गति से आगे बढ़ती हुई पाठक को महज संतोष नहीं देती, बल्कि उसे झिंझोड़ती हैं। ये कहानियां बॉलीवुड की फिल्म की तरह किसी खास पैटर्न और खास संदेश के बरक्स एक नया आस्वाद रचती हैं। पारंपरिक आस्वाद के आदी पाठकों और आलोचकों को ये सहज ग्राह्य नहीं होते हुए भी बहुत देर तक जीभ चरपराने को मजबूर करती हैं।
          इस संग्रह की अधिकतर कहानियां मानवीय-मनोविज्ञान की गुत्थियों को समझने और सुलझाने की ईमानदार कोशिश का नतीजा है। ‘वीणा रा तार’ कहानी का नायक टुंडा, ‘चिरळाटी’ का बदरी, ‘धंध’ का चायवाला और मशीन संवारने वाला ‘कबूतर’ का अस्सी वर्षीय बुजुर्ग, ‘चाकी रो पाट’ का गंजा व्यक्ति आदि सभी पात्र अपने मन के भीतर की ऊहा-पोह को ही अभिव्यक्ति देते हुए, बाह्य संघर्षों से चोट खाकर भीतरी दुनिया से दो-चार होते हैं। आश्चर्यजनक रूप से उपर्युक्त सभी पात्र मृत्युबोध, बेकारी, बेबसी से जूझते हुए या तो हार जाते हैं या फिर उसी तरफ बढ़ रहे प्रतीत होते हैं।
          स्पष्ट है कि रचनाकार एक आंख से पात्रों के मन को गहराइयों से नापता है तो दूसरी से मौजूदा वक्त की नब्ज को पहचानकर, आसन्न संकट को भांप रहा है। उसके पात्र जीतकर आए हुए योद्धा की भांति हुंकार नहीं भरते हैं वरन् इस भयावह दौर से टकराते हुए धीरे-धीरे नष्ट हो रहे हैं। उन्हें अपनी निश्चित हार दिख रही है। इससे रचनाकार मौजूदा अमानवीय और संवेदनशून्य हालातों की ओर ध्यान खींचने में सफल होता है। ‘धड़’ कहानी तो सीधे-सीधे दिल्ली में आम-आदमी पार्टी की रैली के दौरान आत्महत्या कर चुके किसान गजेन्द्र की मौत का जिम्मेदार राजनेताओं को बताती है तो इसी कहानी का किसान रामरख आलू की फसल का उचित मूल्य नहीं मिलने पर आत्महत्या कर लेता है जो अप्रत्यक्ष रूप से सरकारी संवेदनशून्यता पर ही करारी चोट है।
          कान्वेंट स्कूल के नाम पर शिक्षा के दलालों द्वारा बच्चों का बचपन छीना जा रहा है, उनके कंधे बस्ते के बोझ तले झुके जा रहे हैं। कुल मिलाकर बच्चों को रोबोट बनाकर या एटीएम मशीन बनाकर उन्हें अपनी जड़ों से उखाड़ने की साजिश चल रही है और किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, गांवों में भी कंक्रीट का जंगल खड़ा हो रहा है और मां-बाप बोझ बनते जा रहे हैं। ‘बारीक बात’ कहानी के जरिए जहां इस बड़ी समस्या की ओर दृष्टिपात किया गया है, वहीं ‘काची कळाई’, ‘कबूतर’ और ‘त्रिभुज’ जैसी कहानियों में बिन ब्याहे मर्दों की पीड़ा उजागर की गई है जो प्रकारान्तर से बेटियों की घटती संख्या और बिगड़ते लिंगानुपात की ओर ध्यान आकर्षित करती हैं।
          `ब्लड सर्कुलेशन` और `क्लेम` कहानियां रचना-प्रक्रिया और सृजन की पीड़ को बड़े अनूठे अंदाज से प्रकट करती हैं। अधिकतर कहानियों में कथ्य बहुत छोटा है, बिना कथ्य के एक बारीक से कथा-तन्तु के सहारे भाषिक चमत्कार और वैचारिक संयोजन कहानियों को अनूठा बनाता है। इस संग्रह की कहानियां पारंपरिक ढांचे को तोड़कर कहानी की सीमाओं का अतिक्रमण करती हुई ललित निबंध, संस्मरण, रेखाचित्र और रिपोर्ताज जैसी गद्य विधाओं के साथ कदमताल करती प्रतीत होती हैं।
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‘बारीक बात’ का किसान कि किसान की ‘बारीक बात’
० सत्यनारायण परलीका, परलीका
           रामस्वरूप किसान सीमांत किसान हैं और साहित्य में भी खेती की तरह पचते हैं। वे श्रमशील वर्ग को दूर से देखने वाले नहीं होकर खुद उसके अटूट हिस्से हैं। अपनी रचनाओं में वे भोगा हुआ यथार्थ व्यक्त करते हैं। वे ग्रामीण जन-जीवन और उसकी संस्कृति के चितेरे हैं। अपने तीसरे कहानी संग्रह ‘बारीक बात’ तक आते-आते किसान कुछ ज्यादा ही सूक्ष्म हो जाते हैं और झीनी-सी संवेदना को बड़ी बारीकी से पकड़ते हैं।
          शीर्षक कहानी ‘बारीक बात’ में किसान ने पीढ़ियों के अंतराल को निपट निराले अंदाज से प्रकट किया है। बाड़े और कच्चे मकानों में जो सुख और रागात्मकता है वह महलों व कोठियों से कोसों दूर। कच्चे मकानों के स्थानाभाव में मानव ही नहीं, जीव-जिनावर और घर का समस्त सामान भी घर का अटूट हिस्सा है, पर कोठी में मानव-मानव भी आपस में नहीं जुड़ पाते, मगर यहां आंगन-घर की समस्त चीजें मानवीय हो जाती हैं। कच्चे कोठों की जगह कोठी बन जाती है। घर में मानवीय तादाद कम हो जाती है और जीव-जिनावर का तो नामोनिशान ही नहीं, पर फिर भी वह खुलापन नहीं। कहानी का नायक उस सोहबत और उन संवादों को तरसता है। ‘कभी-कभी सोचता हूं कि यह कोठी शब्दों की कत्लगाह है।’ कहानी का एक-एक शब्द, एक-एक वाक्य, एक-एक दृश्य कहानीकार की लोकसंप्रक्ति की गवाही देता है। बाड़े, घर और कोठी के बहाने यह कहानी तीन युगों- आदिम, सभ्य और अति सभ्य युग का मार्मिक चित्रण है।
          कहानियों के अंत में कोई न कोई झीनी संवेदना, कोई न कोई बारीक बात पाठक को तरंगित कर देती है, उसे झकझोर कर छोड़ देती है। किसान की कहानियों में संवेदना के बारीक पहलू और नितांत नए कोण प्रस्तुत हुए हैं। बानगी के तौर पर बाढ़ में अमूमन जान-माल का नुकसान होता है और इस विषय पर अगर किसी भाषा में कहानी है तो वह जान-माल की क्षति पर ही केंद्रित मिलेगी, परन्तु किसान की कहानी ‘चिरळाटी’ में पूरा फोकस प्रतिष्ठा की हानि पर ही टिका हुआ है। पूरी कहानी में जान-माल की क्षति का कहीं आभास ही नहीं मिलता, जबकि आत्मसम्मान, आबरू और इज्जत की क्षति को अद्भुत हुनर से बिम्बित कर कहानी नायक के लिए पाठकों की जो करुणा किसान ने अर्जित की है वह बेजोड़ है।
           धन कमाने की होड़ में बिंधता बचपन, दूषित राजनीति में धड़ में तब्दील होती मानवता, सरमायेदारी व्यवस्था की करतूतों से अनजान सर्वहारा वर्ग में अपने व्यवसाय के प्रति उपजता असंतोष, मेहनतकश लोगों के राख होते सपने, घटते लिंगानुपात की पीड़ झेलते परिवार, संयुक्त परिवार में ढलती उम्र के पति-पत्नी की पीड़ के मनोवैज्ञानिक दृश्य किसान की इन कहानियों की खासियत है। एक ही संवाद में गुंथी हुई ‘क्लेम’ और औरत-विहीन घर की विडम्बक स्थिति को चित्रित करती ‘त्रिभुज’ सरीखी लम्बी कहानी भी इन कहानियों में शामिल है, जहां सुरजे की भूखी ऊंटनी मोहरी तुड़वाकर दरवाजे से सपाक से फिसल गई, जैसे कोई चिकनी साबुन हाथों से। असल में इस व्यवस्था में मेहनतकश मानव के हाथों से फिसलते हक का संकेत करती ये कहानियां उसमें समझ भरने का यत्न करती-सी प्रतीत होती हैं।
           किसान जो देखते हैं, उसे उसी रूप में नहीं लिखते, क्योंकि कहानी कोरा दृश्य-चित्रण नहीं है। उसमें लेखक का चिंतन, उसका मनोविज्ञान प्रत्यक्ष होना चाहिए और यह पुनर्सृजन के हुनर की मांग करता है। किसान देखे हुए दृश्य को चित्रित करने से पहले अपने चिंतन, अपने मनोविज्ञान और बौद्धिक स्तर को पात्रों की आत्मा में उतारते हैं और फिर उनकी क्रियाशीलता को कहानी में पिरोते हैं। इस संग्रह में कुल 16 कहानियां हैं। हर कहानी में कसाव इतना जबरदस्त है कि कोई शब्द निकालने या जोड़ने की गुंजाइश नहीं। निश्चय ही किसान की कहानियों से राजस्थानी का आधुनिक साहित्य समृद्ध हुआ है।
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‘क्लासिक’ खांचे में फिट किसान की ‘बारीक बात’
० डॉ. महेन्द्र मील, सीकर 

         रामस्वरूप किसान राजस्थानी के संजीदा एवं प्रयोगधर्मी कहानीकार हैं। लघुकथा, अनुवाद, संपादन और अन्य विधाओं में भी आपका महत्त्वपूर्ण अवदान है। एक रचनाकार विविध विधाओं में सृजन करता है परन्तु उनमें से एक विधा मुखर होती है। यहाँ हम कह सकते हैं कि श्री रामस्वरूप किसान मूल रूप में कहानीकार हैं। आप कहानी के समर्थ शिल्पी हैं। ‘बारीक बात’ में कहानी की कसौटी पर खरी सोलह आना खरी सोलह कहानियाँ संग्रहीत हैं। इन कहानियों में ग्रामीण जीवन के सुख-दुख को बड़ी शिद्दत के साथ उभारा गया है।
         संग्रह की पहली कहानी बाल मनोविज्ञान को प्रकट करती कहानी है। यहाँ लेखकीय चिन्ता है कि आज की शिक्षा किस तरह बच्चों के बचपन का हरण कर रही है। ‘धड़’ कहानी में दौसा के किसान गजेन्द्र और गोलूवालै के किसान रामरख के बहाने से गरीबी और शोषण से परेशान किसानों द्वारा आत्महत्या करने की करुण कथा है। यहाँ कहानीकार एक प्रतीक रूप में कहानी के नये शिल्प की सृजना कर कहानी के नये प्रतिमान स्थापित कर रहे हैं। आज लोकतन्त्र के चारों स्तम्भ पंगु होते जा रहे हैं। लोकतन्त्र का चतुर्थ स्तम्भ जनता की आवाज का प्रतीक समाचार-पत्र गर्दन कटे मुर्गे की भांति फड़फड़ा रहा है। ऐसे मस्तक विहीन लोकतन्त्र को देखकर संवेदनशील मनुष्य के ‘वीणा रा तार’ झनझना उठते हैं। ‘चिरळाटी’ कहानी में विपत्तियों से घिरे व्यक्ति की मानसिकता का बहुत ही मार्मिक मनोवैज्ञानिक चित्रण किया गया है। ‘कबूतर’ कहानी में व्यक्ति की दमित वासना का यथार्थ चित्रण किया गया है। ग्रामीण परिवेश में भांति-भांति के चरित्र मिलते हैं जिनकी यहाँ बानगी ही नहीं सबल प्रस्तुति है। संग्रह की केन्द्रीय कहानी है- ‘त्रिभुज’। त्रिभुज यहाँ एक नया प्रतीक बनकर सम्मुख आता है। इस कहानी में कृषक परिवार की समस्याओं की पहचान करते हुए ऐसे सरस वातावरण का निर्माण किया गया है कि पाठक यहाँ से निकलकर दूर नहीं जाना चाहता। कहानी में सुरजो, कासी और महाबीरो तीनों मिलकर एक विधुर और दो कुंवारी रेखाओं से एक त्रिभुज का निर्माण करते हैं। यह त्रिकोण कृषक जीवन की विडम्बना का प्रतीक प्रतीत होता है। लेखक ने सम्पूर्ण समाज के व्यवहार से अन्तर्मन में उत्पन्न भावों को शब्दों से संवारकर कहानी का जामा पहनाया है। कहानी का कथ्य चित्रपट की तरह चलता रहता है जो पाठक को पढने की शक्ति देता है। अन्त में कहानीकार ने अपनी ‘बारीक बात’ कही है। इस कहानी में औरतों के वार्तालाप के माध्यम से यौन सम्बन्धों के यथार्थ को आनावृत किया गया है जो कि मंटो का स्मरण करा देता है। एक बारीक सी बात किस तरह कहानी का केन्द्र बिन्दु बन जाती है, यह कहानी इस बात का प्रमाण है। आज की उपभोक्तावादी संस्कृति व्यक्ति को संवेदनहीन बना रही है। कहानी में जब बहू कपास की गंठड़ी को बहुत सारी जगह होते हुए भी अपने कमरे में नहीं रखने देती तो दलीप पूछता है, ‘...पैलां ई इयां ई होवतो के?’ तब बापू प्रत्युत्तर देता है, ‘पैलां अबाळै दांई छीदा-छीदा कोनी रैवता।’ यही बारीक बात है और संग्रह की आत्मा।
          कह सकते हैं कि संग्रह की सभी कहानियाँ आज के दौर में मरणासन्न मानवीय संवेदना से लबालब भरी हुई हैं जो पाठक के हृदय में गहरे तक उतर जाती हैं। यहाँ वर्तमान ही नहीं आने वाले वक्त का सृजन किया गया है। कहानियों की झीनी बुनावट और कसावट से ऐसा लगता है कि यहाँ कोई ‘क्लासिक राग’ में रचा संगीत बज रहा है। इस रूप में यह पुस्तक ‘क्लासिक’ खांचे में फिट ‘बारीक बात’ है।
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बारीक होते किसान
० कुमार श्याम, बरमसर (रावतसर) हनुमानगढ़ 

          कथाकार रामस्‍वरूप किसान का नया कहानी संग्रह ‘बारीक बात’ उनकी लम्‍बी चिंतन-प्रक्रिया एवं गहन सूक्ष्‍मान्‍वेषी दृष्टि का परिणाम है। इसमें कोई दोराय नहीं है कि किसान बारीक होते जा रहे हैं। या कहें कि बेजोड़ होते जा रहे हैं। जो उनके इस संग्रह की कहानियों से झलक रहा है। किसान इतने सूक्ष्‍म हो गए हैं कि उनकी पैनी निग़ाहों से कुछ भी बचकर नहीं निकल सकता। यही वज़ह है कि उनकी इन रचनाओं में कुछ भी पीछे नहीं छूटता। कहानीकार किसान सब कुछ तह से खरोंच कर निर्भिकता एवं जिम्‍मेदारी के साथ बड़ी ही सावचेती से कहानी में सौंपते हैं। सृजन के प्रति उनकी यही कर्तव्‍यबद्धता उनको अन्‍यों से अलग करती है।
          किसान अपने पहले कथा-संग्रह ‘हाडाखोड़ी’ से लेकर ‘बारीक बात’ तक पहुंचते हुए बहुत ही मुश्किल कथावस्‍तु को जिस सहजता एवं स्‍पष्‍टता के साथ पाठक के सामने रखने लगे हैं, भाषा और शिल्प की जुगलबंदी से ऐसा लगता है जैसे हमें किसान अंगुली थाम कर इन कहानियों में साथ कर लेते हैं। उनकी अनवरत आन्‍तरिक रचना-प्रक्रिया व दृढ़ वैचारिक प्रतिबद्धता के बल पर ऐसा संभव हो सका है। अग़र मैं कहानीकार किसान को और गहनता से परिभाषित करता हूं तो यह कृति किसान के आन्‍तरिक नव-संसार का बाह्य-प्रकटीकरण है, जो समकालीन राजस्थानी कहानी साहित्य में विरल है।
          किसान की कहानियां पाठकों को अपने से दूर नहीं होने देती बल्‍क़ि परत-दर-परत उन्हें अपने भीतर खींचती है। जो किसान के बेहतरीन कथ्‍य के साथ बेजोड़ भाषा-शैली का प्रभाव है। जिसे पढ़ते हुए पाठक उनकी चिंतन-धारा में बहता चला जाता है। यहां कहीं हिन्‍दी-स्‍वर नहीं बल्कि लोक भाषा राजस्‍थानी का मौलिक स्‍वर संभालने के जतन देखे जा सकते हैं। गांव के घरों की फुसफुसाहट से लेकर गवाड़ का मुखर भाषाई तेवर भी यहां है। एक देखें- ‘’ मुंह कानी के देखो...ठीक है। जगां पड़्यो पाथर भारी हुवै।...आपणै वरग में धंधो बदळण रो अरथ है- लीर-लीर रिजाई नैं फोर-फोर ओढ़णो। म्‍हैं तो भौत ओढ़ी है फोर-फोर’र रिजाई। पण पाळौ बियां ई लागै।...अगाणै सोयल्‍यो भावूं पगाणै, ढूंगा तो बिचाळै रैयसी।...।‘’ (धंधो- पृष्‍ठ संख्‍या-32)
          संग्रह की पहली कहानी ‘माळियै बंधी भैंस’ से लेकर अंतिम कहानी ‘बारीक़ बात’ तक पाठक विभिन्‍न पड़ावों से होकर गुज़रता है। किसान की ये कहानियां एक नए धरातल का निर्माण करती है। कहानी अपने पाठ में पाठक की हर ज़रूरत को पूरा करती हुई, जैसे कुछ अनुछुए अहसासों से वाक़ि‍फ़ करवाती है। इसे परखने के लिए ए‍क नई दृष्टि का सूत्रपात करना होगा।
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किसान की कालजयी कहानियां
० डा. ओमप्रकाश भाटिया, जैसलमेर

        रामस्वरूप किसान महत्वपूर्ण हस्ताक्षर जिन्होंने राजस्थानी कहानी की भाव-धारा को आधुनिक संवेदनाओं के साथ नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। इस संग्रह की कहानियां संवेदना, शिल्प, कथ्य व गठन के साथ मनुष्य के मनोविज्ञान, संघर्ष, जीजिविषा और उसकी आत्मा के उन अनदेखे रहस्यों, परतों को खोलती सहलाती बारीकी के साथ मर्म को छूती हुई, अपने अंतस में सुप्त भावनाओं की अभिव्यक्ति करती है। संग्रह में जीवन के विभिन्न रंगों की सोलह कहानियों में कई-कई कोलाज उतारे गये हैं। `मालियै बंधी भैंस` शिक्षा व लोक जीवन पर चलते छद्म विकास के पहिये से ध्वस्त होते टूटते परिवार और समाज का दर्द उकेरा गया है। आधुनिक युग में मूल्यों के ह्वास, व्यर्थ आडंबरों में फंसी अर्थहीन शैक्षणिक दौड़ और दम तोड़ती भाषा पर रामस्वरूप किसान ने इस कहानी के रूप में क्लासिक रचा है, जो पाठक को स्तब्ध कर देता है।
        `धड़` कहानी में रामरख की आत्महत्या एक किसान के जिंदा रहने के संघर्ष है जो आत्मा के उन अनदेखे रहस्यों, परतों को खोलती सहलाती बारीकी के साथ मर्म को छूती हुई अपने अंतस में सुप्त भावनाओं की अभिव्यक्ति करती है। कहानी में हार कर हाशिये में चले जाने की वही गाथा है जिसे प्रेमचंद ने `पूस की रात` में शुरू किया था और `धड़` में रामस्वरूप किसान ने अंजाम तक पहुंचाया है।
         `वीणा रा तार`, `चिरलाटी`, `धंधो`, `राख`, `तूफान` आदि कहानियां अंतिम व्यक्ति के जीवन के लिए संघर्ष की अनूठी कहानियां है जो किसान ने आसपास से मोतियों की तरह चुनी है। इन कहानियों से निकली संवेदनाओं के बुलबुले हृदय को द्रवित करती है। रामस्वरूप किसान बारीक व गहरी बात को सहजता से कहने में महिर है। `खबर`, `डंक` उनकी मनोवैज्ञानिक कहानियां है जो मनुष्य के स्वाभाविक अंतः पटल को खोलकर सामने लाती है। `खबर` कहानी में दूसरे की मौत की दुखद खबर में खुद के बच जाने की खुशी को व्यक्त करना किसान की जीवन को देखने की अद्भुत दृष्टि को दर्शाती है।संग्रह की अंतिम कहानी `बारीक बात` मनुष्य जीवन की यात्रा है। मनुष्य बचपन में जितना भरपूर जीवन जीता है उतना ही जवानी के संघर्ष के बाद बुढापे में आते आते फालतू, बोझ और कबाड़ की तरह व्यर्थ हो जाता है। यह बारीक बात रामस्वरूप किसान ने बचपन के समय के समाज के जीवन मूल्यों, खुशियों व अपनापन को रेखांकित करते हुए आधुनिक युग में हुए पतन को बखूबी उजागर किया है जिससे यह कहानी जीवन के कई रंगों को छूने में सफल हुई है।
         राजस्थानी मुहावरे, वाक्-सौंदर्य, नाद और प्रतीकों को एक मठोठ के साथ प्रयुक्त करते हैं कि पाठक उनके साथ डूबने उतरने लगता है। कहानी का गठन, शिल्प, कसावट, इस तरह ईंटों से चुनी गई होती है जिसमें से किसी ईंट को आप इधर उधर नहीं कर सकते। इसीलिए उनकी कहानियों में वातावरण के व्यर्थ के वर्णन, शिल्प के अनावश्यक प्रयोग,संवेदनाओं के उहापोह भरे दुरूह चमत्कारिक लम्बे विवरण नहीं होते हैं। कहानी में भरपूर कथ्य होता है। रामस्वरूप किसान की कहानियां न केवल राजस्थानी भाषा की बल्कि भारतीय साहित्य की कालजयी कहानियां हैं।
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