नीरज दइया की राजस्थानी कहानी-आलोचना पर केंद्रित आलोचना पुस्तक

बिना हासलपाई (2014) डॉ. नीरज दइया, प्रकाशक : सर्जना, शिवबाड़ी रोड, बीकानेर- 334003, पृष्ठ : 160, मूल्य : 240/-
डॉ. नीरज दइया
जन्म : 22 सितम्बर 1968, रतनगढ़ (चूरू)
कविता संग्रह : उचटी हुई नींद (हिंदी) साख, देसूंटो, पाछो कुण आसी (राजस्थानी) जादू रो पेन (बाल कथाएं) आलोचना रै आंगणै, बिना हासलपाई (आलोचना) 24 भारतीय भाषाओं के कवियों की कविताओं का अनुवाद ‘सबद-नाद’ के साथ निर्मल वर्मा, अमृत प्रीतम, भोलाभाई पटेल, मोहन आलोक की कृतियों का अनुवाद। बाल साहित्य के लिए साहित्य अकादेमी एवं अनुवाद के लिए प्रांतीय साहित्य अकादमी का पुरस्कार। ‘नेगचार’, ‘जागती जोत’ आदि पत्रिकाओं का संपादन। 
संपर्क : सी-107, वल्लभ गार्डन, पवनपुरी, बीकानेर - 334 003 (राजस्थान) 


पुस्तक पर लिखा गया  ब्लर्ब
राजस्थानी कहानीकारों का नए दृष्टिकोण से मूल्यांकन
० नंद भारद्वाज, जयपुर
राजस्थानी में सातवें दशक के बाद सुखद संयोग रहा कि नव सृजन के साथ ही आलोचना के आंगन में कई नए लेखक सामने आए, नीरज दइया का नाम इन नए लेखकों में अपनी अलग पहचान रखता है। पिछले वर्षों में उन्होंने राजस्थानी काव्य और कथा विधा की अंवेर-परख का कार्य लगातार किया है, परन्‍तु उन्हें यह बात कुछ नागवार-सी गुजरी कि कहानी को लेकर अब भी निजी पसंद-नापसंद, परस्पर पक्षपात और अपनी निजी हासलपाई लगाने का भाव चला आ रहा है। लोककथा से मुक्ति तो मिल गई, लेकिन कई पुराने लेखकों को एकदम भुला दिया गया तो किन्हीं को अभी तक कंधों से नहीं उतारा गया है। लगभग यही दशा आधुनिक कहानी को लेकर वर्षों तक बनी रही, जबकि किसी बात को बिना हासलपाई और बिना नफे-नुकसान की चिन्‍ता किये निरपेक्ष भाव से देखना-दिखाना आलोचना का मूल स्वभाव माना जाता है। कहानी और कहानीकारों पर केंद्रित इस पुस्तक में बिना हासलपाई के इसी निरपेक्ष भाव को कायम राखने का प्रयत्‍न किया गया है। इस पुस्तक के माध्यम से जहां कुछ भूले-बिसरे कहानीकारों को खोज कर सामने लाने का प्रयास किया गया है, वहीं कुछ एकदम नए कहानीकारों की ऊर्जा पर भी ध्यान दिया जाना जरूरी समझा गया है। नीरज दइया यह भी मानते हैं कि यदि इस कार्य में वस्‍तुपरक आलोचना का पक्ष थोड़ा पुख्ता और पर्याप्त बना रहे तो निश्चय ही यह यात्रा दुगने उत्साह से आगे बढ़ सकेगी। समय पर आलोचना के दायित्व निर्वहन से नए कहानीकारों की दिशा मिलेगी और स्थितियों के कई नए रंग देखे जा सकेंगे। आलोचना में कहानी की अपने समयानुकूल दृष्टि से जांच-परख और स्वयं की परंपरा में देखने-समझने का भाव महत्त्वपूर्ण हुआ करता है और इस दृष्टि से यहां कहानीकारों के नामों की तुलना में कहानी के पाठ को आधार बनाते हुए यह कोशिश की गई है। इस पुस्तक में कहानी का पूरा इतिहास क्रमबद्ध ढंग से लिखने के स्थान पर कुछ कहानीकारों को नए दृष्टिकोण से परखते हुए उनकी रचनाशीलता के मर्म तक पहुंचने की कोशिश की गई है। इस अंवेर-परख में जो रचनाकार शामिल हैं उनकी कहानियों के संबंध में इस प्रकार के अध्ययन से जहां आलोचना को मजबूत आधार मिलेगा वहीं अन्य कहानीकारों और पाठकों को किसी रचना को देखने-परखने और खासकर उस के मर्म‍ तक पहुंचने के प्रयत्न को अवश्य ही बल मिलेगा। 
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राजस्थानी कहानी का एक चेहरा : बिना हासलपाई
० डॉ. मंगत बादल, रायसिंह नगर
         डॉ. नीरज दइया की आलोचना पुस्तक ‘बिना हासलपाई’ में राजस्थानी कहानी को लेकर लिखे गए पच्चीस आलेख है। वर्ष 1970 के बाद जिन कहानियों और कहानीकारों की प्रमुखता के साथ चर्चा रही उन का लेखा-जोखा करने का गंभीर आकलन इस पुस्तक में किया गया है। यद्यपि राजस्थानी कहानी आलोचना की आलोचकीय सीमाएं भी श्याम जांगिड़ के बहाने उजागर हुई है कि सबसे बड़ी समस्या पुस्तकों की उपलब्धता की होती है। इसी प्रकार नंद भारद्वाज के इस विचार का समर्थन भी यहां मिलता है कि आज की कहानी कथानक या वातावरण चित्रण की तुलना में मनोविश्लेषण को अधिक महत्त्व देती है। घटनाएं अब उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं जवकि मानव मन पर उनका क्या प्रभाव हुआ है यह देखना कहानीकार का उद्देश्य होता है। संवेदना के स्तर पर जो कहानी सफल होती है उसे ही सफल कहानी कहा जाता है। कहानी में कथ्य और शैली के स्तर पर परिवर्तन कहानीकार सांवर दइया की कहानियों से माना गया है। इस पुस्तक में राजस्थानी के प्रमुख कहानीकारों और उनकी कहानियों की चर्चा के संग यह पड़ताल भी की गई है कि ये कहानियां विशेष क्यों है।
         राजस्थानी आलोचना की हालत वैसी भी कमजोर है। पुस्तक समीक्षा या कभी कभार किसी पत्रिका में कोई आलेख मिल जाता है जिस में ढंग की आलोचना के दर्शन होते हैं। आलोचक दइया का मानना है कि राजस्थानी कहानी ने भारतीय भाषाओं में मध्य अपनी अलग जगह बनाई है। राजस्थानी कहानी लोककथाओं की अंगुली छोड़ कर यथार्थ के धारतल पर पहुंच कर दलित कहानी आंदोलन तक पहुंच चुकी है। नीरज दइया की यह कोशिश सराहनीय है कि इतनी कहानियों और कहानीकारों को एक साथ समाहित करते हुए राजस्थानी कहानी का एक चेहरा बनाया है। कहीं प्रवृत्तियों को लेकर, कहीं कथ्य को लेकर, कहीं संवेदना के स्तर पर एक साथ मूल्यांन बहुत मेहनत का कार्य था जिसे डॉ. नीरज दइया ने कर दिखाया है। लेखक की भाषा आलोचना के अनुरूप है। राजस्थानी कहानी का अध्ययन करने वालों के लिए यह पुस्तक इस लिए भी पढ़ी जानी आवश्यक है कि समग्र रूप से एक साथ इतना कार्य किसी आलोचक ने आज तक नहीं किया है।
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कहानियों का बारीकी से अध्ययन
० देवकिशन राजपुरोहित,चंपाखेड़ी (नागौर)

         साहित्य की खास विधा है, आलोचना। वर्तमान में राजस्थानी भाषा के साहित्य में सभी विधाओं में पर्याप्त लिखा जा रहा है किंतु आलोचना अभी तक फलीभूत नहीं हो रही है। ऐसी स्थिति में राजस्थानी में आलोचना जैसे दुरूह कार्य को निरंतर कर रहे हैं डॉ. नीरज दइया।
नीरज दइया पहले भी आलोचना के क्षेत्र में बहुत काम कर चुके हैं और कई खट्टे-मीठे अनुभवों के उपरांत भी इस विधा में जम कर निडरता एवं निर्भीकता से कार्यरत हैं। आलोच्य कृति है उनकी बिना हासलपाई, जो कहानी विधा पर केंद्रित है।
         बिना हासलपाई का मतलब बिना कुछ जोड़े या कम किए जैसी रचनाएं है उनके गुण-दोष सप्रभाव अंकित कर दिए हैं मतलब ज्यों की त्यों धर दीनी। अब रचनाकार चाहे तो उन्हें धन्यवाद दे या उनसे दूरी बनाएं। पूरी पुस्तक में उन्होंने चर्चित और चुंनिदा 25 रचनाकारों की रचनाओं की परख की है। कई कहानीकारों की कहानियों की विधागत कमियों को गिनाया है तो पुनर्लेखन की गई रचनाओं को भी नहीं छोड़ा है। एक ही रचना दो बार लिखी गई है। दूसरी रचना में कुछ सुधार किया गया है।
         कहने का तात्पर्य यह है कि उन्होंने आलोचना में सम्मिलित सभी कहानीकारों की लगभग सभी कहानियों का बारीकी से अध्ययन किया है। बिना हासलपाई में जिन कहानीकारों को सम्मिलित किया गया है उनमेम सर्वश्री नृसिंह राजपुरोहित, श्रीलाल नथमल जोशी, अन्नाराम सुदामा, यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’, रामेश्वर दयाल श्रीमाली, करणीदान बारहठ, सांवर दइया, भंवरलाल भ्रमर, मनोहरसिंह राठौड़, मोहन आलोक, नंद भारद्वाज, मुरलीधर शर्मा ‘विमल’ तथा बुलाकी शर्मा आदि शामिल है।
         आलोच्य कृति बिना हासलपाई में आलोचक डॉ. नीरज दइया ने एक इशारा कवि से कहानीकार बने कहानीकारों की कहानियों और दूसरी भाषा से राजस्थानी में आए कहानीकारों की कहानियों की कमजोरी की तरफ भी किया है। इस आलोचना की पुस्तक में अपनी ओर से यह सफाई भी दी है कि उन्होंने चुनींदा सब कहानीकारों को इस पुस्तक में सम्मिलित नहीं किया है, अतः जो कहानीकार इस पुस्तक में नहीं आए हैं उन पर भी मंथन और मूल्यांकन होना चाहिए। चाहे कोई और करे या फिर कभी अवसर मिला तो वे स्वयं करेंगे। बिना हासलपाई में आरंभ में कहानी आलोचना और आधुनिक कहानी विधा पर खुलकर बात की है और कहानी के शिल्प और संवेदना पर भी अपना पक्ष उदाहरणों के माध्यम से रखा है। आलोचना के विद्वानों द्वारा बिना हासलपाई का स्वागत किया जाएगा।
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24-09-2014 लोकार्पण समारोह का एक चित्र

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संपादक : डॉ. नीरज दइया

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