डॉ. नंदकिशोर आचार्य की चयनित हिंदी कविताओं का राजस्थानी अनुवाद


पुस्तक : ऊंडै अंधारै कठैई / विधा : अनुवाद (काव्य) मूल : नंदकिशोर आचार्य (हिंदी) / अनुवाद : नीरज दइया (राजस्थानी) संस्करण : 2016, प्रथम / पृष्ठ : 120, मूल्य : 200/- प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मंदिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334005
मूल कवि : डॉ. नंदकिशोर आचार्य
जन्म : 31 अगस्त 1945, बीकानेर (राजस्थान)
कविता संग्रह : जल है जहाँ, शब्द भूले हुए, वह एक समुद्र था, आती है जैसे मृत्यु, कविता में नहीं है जो, रेत राग, अन्य होते हुए, चाँद आकाश गाता है, उड़ना संभव करता आकाश, गाना चाहता पतझड़, केवल एक पत्ती ने, चौथा सप्तक (संपादक : अज्ञेय) आलोचना, नाटक व अन्य विधाओं में अनेक पुस्तकें प्रकाशित। मीरा पुरस्कार, बिहारी पुरस्कार, भुवनेश्वर पुरस्कार, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार आदि अनेक पुरस्कारों से सम्मानित। अहिंसा-विश्वकोश चर्चित।
संपर्क : सुथारों की बड़ी गुवाड़, बीकानेर - 334 005 (राजस्थान)
अनुवादक : डॉ. नीरज दइया 
जन्म : 22 सितम्बर 1968, रतनगढ़ (चूरू)

कविता संग्रह : उचटी हुई नींद (हिंदी) साख, देसूंटो, पाछो कुण आसी (राजस्थानी) जादू रो पेन (बाल कथाएं) आलोचना रै आंगणै, बिना हासलपाई (आलोचना) 24 भारतीय भाषाओं के कवियों की कविताओं का अनुवाद ‘सबद-नाद’ के साथ निर्मल वर्मा, अमृत प्रीतम, भोलाभाई पटेल, मोहन आलोक की कृतियों का अनुवाद। बाल साहित्य के लिए साहित्य अकादेमी एवं अनुवाद के लिए प्रांतीय साहित्य अकादमी का पुरस्कार। ‘नेगचार’, ‘जागती जोत’ आदि पत्रिकाओं का संपादन। 
संपर्क : सी-107, वल्लभ गार्डन, पवनपुरी, बीकानेर - 334 003 (राजस्थान)
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दूसरा भाग :

डॉ. आचार्य की रचनाओं का मनमोहक कॉलाज
० भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’, बीकानेर
    डॉ. नन्दकिशोर आचार्य की चुनींदा 83 कविताओं का अनुवाद करके डॉ. नीरज दइया ने सचमुच एक श्रमसाध्य और श्रेयस्कर काम किया है। श्रमसाध्य और श्रेयष्कर इसलिए क्योंकि ये कविताएं किसी एक काव्य-पुस्तिका तक सीमित न होकर पृथक-पृथक कालखंडों में कवि द्वारा सृजित 14 काव्य-पुस्तकों के समुच्चय में से चुनकर सम्मिलित की गई हैं। एक प्रकार से देखा जाय तो डॉ. नन्दकिशोर आचार्य की पूरी काव्य-यात्रा का अद्यतन प्रतिबिम्ब इन कविताओं में मिलता है। डॉ. दइया ने इसी शब्द-साधना के साथ अनुवाद किया है जो मौलिक लेखन में वांछित होती है और अनुवाद करते समय वैसा ही अपनापन भी महसूस किया है जैसा मनोनुकूल अच्छी कविता रचने पर मूल लेखक महसूस करता है।
    अनुवाद की प्रमुख शर्त यह है कि वह मूल रचना की आत्मा को अभिव्यंजित करे। ऐसा करते हुए वह न तो तथ्यों, भावों या विचारों के साथ छोड़छाड़ करे और न शिल्प या शैली में कोई घालमेल करे। अनुवाद एक प्रकार का स्वानुशासन, रचनात्मक निष्ठा और गंभीरता की मांग करता है। मूल भाषा की रचना में अपना एक खास काव्य-संवेदन, भाषा का एक विशिष्ट संस्कार टटकापन, शब्दों का अपनी ही लय, रंगत और अर्थ-परंपरा तथा एक भरीपूरी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ अनेक अंतर्मुखी ध्वनियां, अर्थ-संकेत और अर्थ-संभावनाएं होती हैं।
    अनुवाद करते समय अनुवादक को भाषा के इसी शील की रक्षा करनी होती है, सधा हुआ अनुवाद वैसा ही होता है जैसा एक संकरे पुल पर सजगता और सधे हुए कदमों से आगे बढ़ा जाए। अब सवाल उठता है कि डॉ. दइया इस श्रमसाध्य व श्रेयस्कर काम में इतने सफल कैसे हुए। इसके पीछे अनेक कारण हैं। डॉ. दइया ने अब तक पंजाबी, हिंदी व गुजराती की विविध विधाओं के साथ-साथ 24 भारतीय भाषाओं की कविताओं का राजस्थानी में सफल अनुवाद किया है। इसे देखते हुए कहा जा सकता है कि वे एक प्रकार से अनुवाद कला में पारंगत हो चुके हैं। कारण तो और भी हैं।   
    डॉ. दइया को श्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा दोनों पर समान अधिकार है। वे दोनों भाषाओं की सांस्कृतिक-सामाजिक पृष्ठभूमि से भली-भांति परिचित हैं। उन्हें शब्दों को साधने की कला का ज्ञान है। वे सही शब्द को सही जगह इस तरह पिरोते हैं कि उस शब्द को यदि हटा दिया या बदल दिया जाए तो पूरी संरचना बिखर सकती है, वे अनुवाद के लिए जरूरी पांच बातों के मर्मज्ञ हैं। ये बातें हैं तन्मयता, लगाव, विषय वस्तु में गहरी पैठ, संवेदना का रचाव तथा प्रभावपूर्ण भाषा में अभिव्यक्ति की विशेष दक्षता।
    डॉ. नन्दकिशोर आचार्य की रचना प्रक्रिया से वे अच्छी तरह भिज्ञ हैं। साथ ही वे मूल लेखक डॉ. आचार्य से निरंतर संपर्क में भी रहे तथा अनुवाद के प्रत्येक चरन पर उन्होंने पारस्परिक विचार-विमर्श को बनाए रखा। डॉ. आचार्य की कविताओं के शब्द अभिधात्मक रूप से चाहे सरल दिखते हो पर हर कविता आंतरिकीकरण की उपज होने से गहरा अर्थ बोध लिए हुए होती है। उस अर्थ बोध को राजस्थानी में सही रूप में रूपायित करने के लिए डॉ. दइया के पास मूल राजस्थानी शब्दों का विपुल भंडार है। एक प्रकार से उन्होंने डॉ. आचार्य की अनेक भावभूमियों की रचनाओं का राजस्थानी के एक मनमोहक कॉलाज प्रस्तुत किया है। साथ ही कविताओं की अर्थवत्ता, लय और अनुगूंज को भी बनाए रखा है। ऐसे शानदार अनुवाद के लिए वे वस्तुत: बधाई के सुपात्र हैं।
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अनुसृजन-प्रक्रिया भी बच्चे के जन्म की भांति
० शिवदान सिंह जोलावास, उदयपुर
  
     सृजन लेखक की कृति होती है लेकिन उससे कहीं दुश्कर काम है अनुसृजन। लेखक के मूल विचार, आत्मा और शब्दों का यथायोग्य चयन, संयोजन और उसी गंभीरता के साथ पुनः प्रस्फुटन। वैसे साहित्य जगत के लिए नीरज दइया कोई अनजाना नाम नहीं है। खास तौर से राजस्थानी के वर्तमान लेखकों की चुनिंदा सूची में शुमार सृजनधर्मी ने नन्दकिशोर आचार्य की रचनाओं को राजस्थानी भाषा में पिरोने का जो बेड़ा उठाया है वह निश्चित स्तुत्य है।
    पहली रचना के शब्द- “साचाणी कीं सिरजूंलाई/ का इयां ईज/ पग माथै आळी माटी लियां/ बस थपथपायां जावणौ है।” सच मायनै में अनुवादक दइया ने बड़ी ईमानदारी बरती, सबसे दूरभ कविताओं का चयन उससे भी दुश्कर कवि कलमगार नन्दकिशोर आचार्य जी से पुनः समीक्षा, इसके पश्चात् पाठक के पास अतिरिक्त संभावना नहीं रहती है। पुस्तक के शीर्षक को रेखांकित कविता पृष्ठ 63 पर प्रकाशित रचना पाठकों से कहती है।
    “म्हैं जिको/ मन-आंगणै थारै/ लेवणी चावूं कठैई नींद/ ऊंडै अंधारै/ क्यूं भटकूं उजास खातर/ जिको कर देवै म्हनै थारै सूं अळघो।” कवि ने जीवन के सत्य को कई रूपों में परिभाषित किया है, वह कविता के शब्दों में ही नहीं, शीर्षक के बिंब से भी अधिक सहज हो जाता है। ‘रम्मत’ में व्याख्यायित पंक्तिया हैं- “अेक दुनिय/ जिकी रम्मै म्हारै सूं/ है अेक दुनिया/ जिण मांय रम्मूं म्हैं।” ‘जातरा मांय’ कवि सीधे सरल शब्दों में जीवन का यथार्थ उकेरता है- “घर हुया करै उण रो/ हुवै पाछो आवणो जिण नै/ पण कोनी हुवै जातरी बो/ घिर परो आवै जिको।” वहीं ‘बेघर’ में कवि के भाव इस प्रकार है- “हरेक जातरा मांय/ घर सूं बेघर हुय’र/ जोवूं-/ खुद रो घर-/ रैय जावूं पण/ फगत थाकेलो लेय’र/ मानतां थकां धरमसाळा नै घर-/ आगली दाण/ फेर हुवण नै बेघर।”
    कवि ने रचनाओं के शीर्षक भी उतने ही गहरे परिवेश से जुड़े दिए है। यहां तक कि ‘चर-भर’ केवल शीर्षक मात्र से ही पूरा दृश्य उभर आता है- “सांकड़ी गळी री छियां मांय/ भाठै री चौकी माथै/ दोय जणा रम्मै चर-भर/ अेक चालै चाल/ दूजो मगन हुय’र/ रळावै-/ जरदै मांय चूनो।” ‘बंसरी: मोरपांख’ में संवाद को बड़े ही बेहतरीन ढंग से प्रस्तुत किया है- “इयां कोनी कै कोनी मिल्यो म्हनै माण/ गीरबो समझूं कै सदा होठां सज्योड़ी रैयी थारै। म्हारै करतां तो चोखी-/ बा मोरपांख/ जिकी सजी थारै मौड़-मुगट/ -अर जे नीं सजती तो ई/ उण रो रूप तो/ उण रो हो।”
    कवि ने समसामयिक घटनाओं के साथ पौराणिक ग्रंथों, महाकाव्यों के पात्रों व दृश्यों को भी अपनी रचनाओं में उकेरा है, जैसे- ‘बरबरीक’और ‘पांचाळी’ शीर्षक लम्बी कविताएं। “पण सगळा नै भोगण री चावना/ भरम हो म्हारो/ ऊंडै धंसग्यो हो म्हारै मन-आंगणै/ -ठेठ आतमा मांय- अर्जुन रो पराक्रम/ साची कैवूं तो किणी नै नीं भोग सकी/ म्हैं उण नै टाळ’र।” कवि अपनी शब्द-यात्रा कराता धरती के दक्षिणी गोलार्द्ध तक ले जाता है वो अपने संश्य को अण्टार्कटिका के चित्र से परिभाषित करता है। ‘दिन रो ई दिन’- “कित्ता’क दिन रैवैला रात? कदैई तो आसी/ दिन रो ई दिन/ कोई तो/ दिन।” दूसरी तरफ प्रेम की अभिव्यक्ति में उकेरे शब्द- “थारी ओळूं/ बो फूल जिको कोनी तोइयो म्हैं-/ डाली सूं/ उण मांय-/ खिलग्यो म्हैं ईज।” शीर्षक ‘बो फूल’।
    पुस्तक की हरेक कविता पढ़ते हुए लगता है अनुसृजन की प्रक्रिया भी उस बच्चे के जन्म की भांति है, जिसे मूल लेखक/ कवि ने अपनी आत्मा से जन्म दिया, इस मामले में नीरज दइया का ईमानदार प्रयास परिलक्षित होता है। हां, बेशक! किसी मोड़ पर जहां संवेदना का स्वाद बदलता है, कमी महसूस होती है कि कुछ और नया मिल जाता, लेकिन यह काव्य-यात्रा का अर्धविराम है। इसलिए गातांक से आगे क्या पर्दाफाश होगा, केवल रचनाधर्मी ही जानता है इसी उम्मीद में इस पुस्तक की समीक्षा पुस्तक की रचना से की जाए बेहतर होगा जहां “आसरै फगत ठौड़ माथै” में लेखक लिखता है- “अेक सबद री ठौड़/ बदळ्यां/ बदळ जावै जाणै/ कविता री आखी दुनिया/ ठीक बियां इज बदल जावै/ सबद रो ई आखो-संसार।”
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