बुधवार, 5 अक्तूबर 2016

सतीश छिम्पा का कहानी संग्रह : ‘‘वान्या अर दूजी कहाणियां’’ 01

वान्या अर दूजी कहाणियां (राजस्थानी कहाणी संग्रह) सतीश छिम्पा / संस्करण : 201 6 / पृष्ठ :100 / मूल्य : 100 रुपये / प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, एफ-77, सेक्टर- 9, रोड नं. 11, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर 
सतीश छिम्पा
जन्म : 14 नवम्बर, 1986  शिक्षा : एम.ए., बी.एड.
अपने पहले ही कहानी संग्रह ‘वान्य अर दूजी कहाणियाँ’ से चर्चित कहानीकार छिम्पा कहानी को मूलतः जन जागरण और चेतना का वाहक मानते हैं। उनकी पहचान राजस्थानी कहानी में नए प्रयोग और युवा मन की बेलाग अभिव्यक्ति के रूप में की गई है। मूलतः सतीश कवि है और राजस्थानी में उनके दो मौलिक कविता संग्रह- ‘डाण्डी स्यूं अणजाण’ और ‘एजेलिना जोली अर समेस्ता’ प्रकाशित हुए हैं साथ ही आपकी कविताएं युवा कवियों के प्रतिनिधि संकलन ‘मंडाण’ में भी संकलित है। संपादक के रूप में ‘किरसा’ नामक अनियतकालीन पत्रिका का प्रकाशन भी आपने किया। हिंदी में कविता और अनुवाद की पुस्तकें प्रकाशित। अनेक संस्थाओं से पुरस्कृत-सम्मानित।
संपर्क : वार्ड नंबर-11, त्रिमूर्ति मंदिर के पीछे, सूरतगढ़- 334804
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अभिनव प्रयोग की राजस्थानी कहानियां
० डॉ. नीरज  दइया, बीकानेर

          युवा कवि-कहाणीकार सतीश छिम्पा का ‘वान्या अर दूजी कहाणियां’ पहला कहानी संग्रह है। संग्रह में संकलित दस कहानियों में संवेदना के स्तर पर कहानीकार कहानी में भाषा और भाव के स्तर पर कविता करता है। यहां दोनों विधाएं बेहद नजदीक आती हुई, जैसे एकमेक हो जाती है। वैसे ‘वान्या अर दूजी कहाणियां’ संग्रह को मार्क्सवादी विचारधारा का एक लंबा गीत कहा जा सकता है। जिसकी मूल संवेदना वर्तमान समय में बदलती मानवीय भावनाएं, मानसिकता, सार्वभौमिक प्रेम, युवाओं के सपने-संघर्ष, बदलती दुनिया और रोजगार की समस्याओं के बीच संघर्ष करती नई पीढ़ी है। 
          संग्रह में ‘वान्या’ शीर्षक कहानी की कथा-नायिका वान्या है। ‘वान्या’ नाम से कहानीकार को अत्यधिक लगाव है जिस के रहते अन्य कई कहानियों की नायिकाओं के नाम भी वान्या रखे गए हैं। और विशेष बात यह भी कि यह संग्रह वान्या को समर्पित है। आखिर वान्य कौन है? कोई सच या सपना? यदि सच है तो कहानीकार ने समव्यस्क नायिका से जुड़ी आत्मकथात्मक कहानियां लिखी है। कहानी तो सपनों को सच में फिर-फिर रचने का आनंद है। ‘वान्या’ के प्रेम में लिखी इन कहानियों में सार्वभौमिक प्रेम है वह देश-विदेश की सीमाओं से परे कहीं आ-जा सकता है और कहीं भी किसी को बुला सकता है। कहानीकार ने अपने शहर सूरतगढ़ को इन कहानियों में अनेक स्थलों पर इस भांति गूंथा है कि पूरा वहां का पूरा मानचित्र हमारी आंखों के सामने आता है- कॉलेज, आकाशवाणी, सड़कें और दौराहे-तिहारों के साथ बहुत सी जगह तो साथ स्वयं सूरतगढ़ ही किसी देह रूप में पाठकों से मिलता है। राजस्थानी कहानी के संदर्भ में इसे अभिनव प्रयोग कहा जा सकता है।
          “बीं गा गुरू जी प्रवीण भाटिया बीं नै रोज फोन कर-कर नै कैंता ‘आपां नै हारणो कोनी, दूणी मेंनत कहणी है- कामयाबी जरूर मिल सी।’ पण बो हार ग्यो... हार ग्यो घर रै हालातां अर बारी-बारी री असफलता स्यूं। फेर सोचै- ‘अजे के बीगड्यो है- फेर खड्यो हो स्यूं अर कामयाब हो स्यूं।’ इस्सा विच्यार बीं रै मन में आवै अर जावै- पण सार किं कोनी नीसरै। पण मां री आंख्यां देख उण रो मन सरणाटो खींच ज्यै।”
(कहानी- म्हूं बेगो इ घरे आ स्यूं ; पृष्ठ-38)
          प्रवीण भाटिया सूरतगढ़ में स्वनाम धन्य शिक्षक हैं और सतीश प्रेरित रहा है। असल में इन कहानियों में सूरतगढ़ की जिस कसबाई मानसिकता का जिक्र शत प्रतिशत यर्थाथ है और यहां अभिव्यक्त एक सूरतगढ़ नहीं ऐसे अनेक सूरतगढ़ देश में है। संज्ञाओं को विलुप्त कर देखा जाए तो पाठक अनेक सवालों से घिर जाता है। ऐसा कैसे हो सकता है? क्या यह सब कुछ सच है, झूठे तो वे सपने भी नहीं हैं जो कहानियों के पात्र देखते हैं। ‘वान्या अर दूजी कहाणियां’ बदलते युग में बदलते प्रेम को अपने पूरे परिवेश में व्याख्यायित करती है- यह प्रेम विजातीय और सहजातीय दैहिक भी है। डॉ. हीरेन, आईसलैंड का रॉबर्ट, लेस्बीयन बबीता, वान्या और स्वयं नरेटर प्रेम के इन कई रूपों में मिलती है तो पुरानी मानसिकता के आधार पर इन्हें खारिज किया जा सकता है।
          गलोब्लाइजेशन की गिरफ्त में दुनिया नितांत छोटी हो गई है, तो पूरा देश-दुनिया गड़मड़ है। इन कहानियों के माध्यम से कहानीकार समय और समाज के बदलते अथवा कहें बदले हुए चेहरे की पहचान सर्वथा नई भाषा-शैली में करवाता है। यहां पात्रों द्वारा पूरी व्यवस्था और सत्ता एकमेक है, जहां हर कोई आपने सोच से अमीर-गरीब है, कोई किसी से प्रेम करता हुआ सब कुछ अपनी इच्छाओं से कर सकता है।
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