शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2016

पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ का कहानी संग्रह : ‘‘ मेटहु तात जनक परितापा’’ 02

मेटहु तात जनक परितापा (राजस्थानी कहानी संग्रह) पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ संस्करण : 2012 / पृष्ठ : 112 / मूल्य : 80 रुपये / प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, एफ-77, सेक्टर- 9, रोड नं. 11, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर 
पूर्ण शर्मा ‘पूरण’
जन्म : 01 जुलाई, 1966 रामगढ़ (हनुमानगढ़)
नई पीढ़ी के सर्वाधिक चर्चित कहानीकार। कविता-कहानी और अनुवाद के साथ विविध विधाओं में लेखन। दो राजस्थानी कहानी संग्रह प्रकाशित- ‘डौळ उडीकती माटी’ और ‘मेटहु तात जनक परितापा’। आपकी कहानियों के मारठी-अनुवाद दो संग्रह- ‘अेक सुपना चा अंत’ और ‘विखुरेलेले आकाश’ प्रकाशित हैं। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के उपन्यास का आपने राजस्थानी अनुवाद ‘गोरा’ किया जो साहित्य अकादेमी नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित एवं ‘साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार’ से सम्मानित है।
संपर्क : प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, रामगढ़- 335504 (नोहर) हनुमानगढ़
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पुस्तक के ब्लर्ब का अनुवाद :
जीवन की तलाश में संघर्षशील पात्रों की कहानियां 
० श्याम जांगिड़, चिड़ावा (झुंझुनू)
    इन दिनों राजस्थानी कहानी के क्षेत्र में अग्रिम पंक्ति के जिन कहानीकारों ने उसे आधुनिक और असरदार बनाने का बीड़ा उठा रखा है, उनमें पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ का नाम बड़े उत्साह से लिया जाता है। ‘पूरण’ ने कहानी में अपना आना एक लम्बी तैयारी के साथ किया है। इनका पहला कहानी संग्रह इसी बात का साक्षी है। इस कहानी संग्रह की साहित्यिक जगत में खूब चर्चा रही है।
    ‘पूरण’ की भाषा जरा हटकर है, जो अपनी तरलता और सहजता के दम पाठक को बांधे रखती है। अपनी कहानी में अनुकूल भाषआ को ढूंढ़ लाना ही इन्हें औरों से अलग करता है। नित-नए शिल्पगत प्रयोग और उस पर भी कथारस को बनाए रख पाना, कोई इनसे सीखे। राजस्थानी कहानी को अन्य भारतीय भाषाओं की कहानी से जरा कदम आगे बनाए रखना इनकी कोशिस रही है। इसी कोशिस का परिणाम है संग्रह में आयी इनकी कहानी ‘सिमेंट की लड़की’। यह एक प्रतीकात्मक कहानी है, जो पात्रों की मनःस्थिति को प्रतीकों के माध्यम से उभारती है। संग्रह की शीर्षक कहानी ‘मेटहु तात जनक परितापा’ भी इनके इसी प्रयोगात्मक तेवर को दर्शाती है।
    कहानीकार का यह दूसरा कहानी-संग्रह अपने भीतर कई बेजोड़ कहानियां समेट लाया है। ‘बाग चिड़िया और स्वप्न’, ‘आईना झूठ बोलता है’, ‘जोगन’, ‘मेटहु तात जनक परितापा’, ‘फिर वहीं जीना’, ‘सिमेंट की लड़की’, ‘मोर तूने खूब गाया’, ‘मैं जीना चाहता हूं’, आदि कहानियां खूबसूरत रचनाएं हैं। निश्चय ही ये रचनाएं राजस्थानी कहानी में अपना एक निश्चित स्थान पा सकेंगी।
    पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ के पात्र अपनी ही परिस्थितियों में उलझे पर संघर्षशील हैं। कहानीकार अपने यहां कथानक ही ऐसा उठाते हैं जहां विद्रोह की गुंजाइश न के बराबर रह जाती है। मतलब यह कि ऐसी परिस्थितियां जहां मन चहुं ओर से घिर जाता है। ऐसी स्थिति में कहानी के भीतर किसी कोने से रिस आयी संवेदनाओं का दर्द पाठक को बींध-बींध देता है। ‘जोगन’ कहानी इसका उदाहरण है। ‘जोगन’ की नायिका कैसे और किससे विद्रोह करे? एक-एक कर अपने सामने आती मुश्किलें उसके समूचे वजूद को ही लील जाती हैं। ठीक इसी तरह ‘मेटहु तात जनक परितापा’ एक ऐसे बेबस और बेचारे बाप की कहानी है, जो अपने प्रत्यक्ष दीखती बदनामी को भी आखिरकार अपना हित मान लेने को मजबूर है। माने यह कि इनके सभी पात्र अपनी अंतिम सांस तक जीवन की तलाश में संघर्षशील हैं।
    मुझे पूरा विश्वास है कि ‘पूरण’ का यह कहानी संग्रह पाठकों को भाएगा, साथ ही साहित्यिक जगत में भी सराहना पाएगा।
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राजस्थानी कहानी के भविष्य के प्रति आश्वस्त करती कहानियां
० डॉ.मंगत बादल,रायसिंह नगर
      नई पीढ़ी के कहानीकारों में पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ एक जाना-पहचाना नाम है। ‘मेटहु तात जनक परितापा’ कहानी संग्रह इसका साक्ष्य है। इस संग्रह में उनकी पन्द्रह कहानियाँ हैं, जो अलग-अलग विषयों और भावभूमि पर रचित हैं। ‘बनवारी नै कुण मारियो’ एक मनोवैज्ञानिक कहानी है। अपनी परम्पराओं और रूढ़ियों को मानने वाला बनवारी एक छोटी-सी बात से इतना आहत हो जाता है कि अन्त में वह अपनी जीवन लीला ही समाप्त कर लेता है।‘बाग चिड़ी अर सपनो’ कहानी समाज में निरन्तर बढ़ती गुंडागर्दी को लेकर है। गुंडा तत्त्व लड़कियों को सरेआम छेड़ते हैं, उन पर तेजाब तक फेंक देते हैं लेकिन समाज में कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं होती।
‘आरसी झूठ बोलै’ कहानी में भारतीय नौकरशाही का पर्दाफास किया गया है कि देश में आँकड़ों की खेती किस प्रकार की जाती है? ‘कीं तो बाकी है’ कहानी इस बात की ओर संकेत करती है कि साम्प्रदायिक विद्वेष की जड़ों को कहीं न कहीं आर्थिक असमानता भी सिंचित करती है। ‘कर्फ्यू’ चाहे छोटा सा शब्द है किन्तु इसकी मार झेलने वाले जानते हैं कि यह कितना खतरनाक है। प्रतिदिन निरन्तर बढ़ती हुई असहिष्णुता जब साम्प्रदायिक दंगे का रूप धारण कर लेती है तो सामाजिक ढांचे को अस्त-व्यस्त कर देती है।
      ‘मेटहु तात जनक परितापा’ कहानी मातृविहीन पुत्री के विवाह योग्य होने पर होने पर बाप की चिन्ताओं को लेकर है। जाति-पाँति,समाज के रीति-रिवाजों और शास्त्रों को मानने वाले पंडित जी को जब बेटी की समीज की जेब में प्रेम-पत्र मिलता है तो वे एक तरह से आश्वस्त हो जाते हैं कि उनकी बेटी जो भी निर्णय लेगी वह ठीक होगा। ‘गोरू काको’ कहानी बतलाती है कि प्रत्येक व्यक्ति की पसन्द और प्रतिभा अलग-अलग होती है। सब को एक साथ हाँकना अत्याचार ही है। गोरू जैसे समाजसेवी और परोपकारी व्यक्ति को जब कोई विपरीत दिशा में हाँकना चाहेगा तो क्या परिणाम निकलेगा?‘तास री गट्टी’ एक मनोवैज्ञानिक कहानी है जब कि ‘जोगन’ औरत की पीड़ा और विवशता की कहानी है। इन्दरो का पति जब घर छोड़कर संन्यासी बन जाता है तो उसे घर की चारदीवारी के भीतर जो कुछ सहन करना पड़ता है वास्तव में वह उसे एक योगिनी ही बना देता है। यह एक अत्यन्त मार्मिक कहानी है। सांयत झील, फेर बठै ई जीणो,खिंडतो आभौ आदि प्रत्येक कहानी किसी न किसी सामाजिक समस्या का बड़ी सिद्दत से चित्रण करती है।
       ऊपर से छोटी और सामान्य दिखलाई पड़ने वाली घटनाएं कितनी मार्मिक हैं, इन कहानियों में चित्रित है। कहानियों की भाषा पाठक को अपनी रौ में बहा ले जानेमें सक्षम है। कहानियों की भाषा यथार्थ की परतें उधेड़ती हुई हमारी संवेदनाओं को झकझोरती हैं। लेखक ने इन कहानियों में शिल्प के नये प्रयोग किये हैं, जो पाठक को प्रभावित और राजस्थानी कहानी के भविष्य के प्रति आश्वस्त करते हैं।
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मेटहु तात जनक परितापा....
० सतीश छिम्पा, सूरतगढ़

    "मेटहु तात जनक परितापा" पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ का दूसरा कहानी संग्रह है। राजस्थानी कहानी में पुराने शिल्प के समानांतर एक नए शिल्प को उभारने वालों में पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ एक महत्वपूर्ण नाम है, इस संग्रह से पूर्व उनका 'डोळ उडीकती माटी' संग्रह प्रकाशित हो चुका है। मानवीय संवेदनाओं को स्वर देने और पात्रों को जीवन्त रूप प्रदान करने के ‘पूरण’ सिद्धहस्त कहानीकार हैं। उनके यहां उधार के सरोकारों की जगह भोगा हुआ यथार्थ है, या ऐसे भी कहा जा सकता है कि जो कुछ उनकी कहानियों में घटित होता है या कहानीकर मन द्वारा घटित करवाया जाता है वह रामगढ़,नोहर और भादरा की जमीन से किसी न किसी रूप में जुड़ा हुआ प्रगट होता है।
    पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ की कहानियाँ सजीव पदार्थ की चेतना और उनसे जुडी संवेनाओं का मूर्त रूप है, कोरा, थोथा आदर्श और सामन्तवादी दृष्टिकोण उनके यहां नहीं है। किसी भी कहानीकार के लिए जरूरी है- लोक और चीजों के प्रति उसका अन्वेषी दृष्टिकोण हो, अगर वह एक निवारक खोजी की तरह वस्तुओं को नही देखता है तो उसका कहानीकार संदिग्ध है, खुशी है कि पूर्ण शर्मा  ‘पूरण’ के कहानीकार में उक्त आधार विशेषतः मौजूद है। ‘खिंडतो आभो’, ‘सिम्मट री छोरी’, ‘फेर बठैई जीणो’,  ‘गोरु काको’ कहानियां इसके बेहतर प्रमाण हैं।
    पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ की भाषा प्रभावित करती है, टिंच करती हुई टणकाटेदार जो पाठक को कहानी के बीच ऊब महसूस नहीं होने देती बल्कि उन्हें अंत तक बांधे रखती है।
    इस संग्रह की सभी कहानियों में पात्र आर्थिक और सामाजिक संघर्षों में इस भांति उलझे हैं कि उनकी जियाजूण और संघर्ष एकमेक से लगते हैं, यह लेखक की स्याणप ही है कि उसने अपने पात्रों को खुला न छोड़कर कुछ खांचों में बांध दिया है। प्रस्तुत कहानियों में बहुत जगहों पर कोरा, उबाऊ और बोझिल-सा दिखावटी आदर्शवाद भी सामने आता है, जो मनुष्य की मूल-प्रवृत्ति से एकदम उलटा है। "मोरिया आछो बोल्यो रै....." कहानी को सोच-समझकर रोमानियत का पुट दिया गया है, और औरत को कुछ ज्यादा ही ईमानदार बनाने की कोशिश में कहानीकार भावों की ठोकर खा गया और कहानी 'अजीब-सी' हो गयी।
    राजस्थानी कहानी में जिस तरीके से बदलाव आ रहा हैं उसे देखकर एक बेहतर भविष्य का सहज ही अंदाज़ा हो जाता है। पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ इस बदलाव के आधार कहानीकार माने जा सकते हैं।
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