बुधवार, 5 अक्तूबर 2016

राजेन्द्र शर्मा 'मुसाफ़िर' का राजस्थानी कहानी संग्रह : "मेळौ” 03

 मेळौ (राजस्थानी कहानी संग्रह) राजेन्द्र शर्मा 'मुसाफ़िर' / संस्करण : 2015 / पृष्ठ : 112 / मूल्य : 90 रुपये / प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, एफ-77, सेक्टर- 9, रोड नं. 11, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर
राजेन्द्र शर्मा 'मुसाफ़िर'
जन्म : 27 जून, 1965 चूरू (राजस्थान)
शिक्षा : एम.ए., बी.एड., एलएल.बी.
पिछले पच्चीस वर्षों से विविध विधाओं में राजस्थानी और हिंदी में समान रूप से लेखन-प्रकाशन। राजस्थानी कहानियों के प्रथम संग्रह ‘मेळौ’ से चर्चित। काशीनाथ सिंह के उपन्यास का राजस्थानी अनुवाद ‘हाळी रग्घू’ साहित्य अकादेमी नई दिल्ली से प्रकाशित। डॉ. श्रीगोपाल काबरा की चुनिंदा हिंदी कहानियों का राजस्थानी अनुवाद ‘अस्पताळ रै दरूजै सूं’ प्रकाशित। कुछ कविताएं ‘थार सप्तक-3' (संपादक : ओम पुरोहित ‘कागद’) में प्रकाशित।
शिक्षा विभाग राजस्थान में शिक्षक के रूप में सेवारत।
संपर्क : सावित्री सदन, सी-122, अग्रसेन नगर, चूरू (राजस्थान)
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समाजिक आचरणों का कलात्मक चित्रण 
० डॉ. आईदानसिंह भाटी, जोधपुर

    भारत और दुनिया के बदलते सामाजिक परिवेश का राजस्थान के समाज पर जो असर हुआ है, और जो प्रवृतियां इस समाज में पनपी है, उनका उम्दा वर्णन राजेन्द्र शर्मा ‘मुसाफ़िर’ के कहानी-संग्रह में देखने को मिलता है। विकास की दौड़ में पीछे छूटे समाज की मनःस्थितियां और आचरण को मेळै (मेला) कहानी के अलावा ‘लाखां में अेक’ (लाखों में एक) और अन्य भी कई कहाणियों में प्रस्तुत किया गया है। ‘लाखां में अेक’ कहानी विकास और प्रगति की चिंदियां बिखेरती है। लेखक आपरी जमीन पर खड़े होकर कथा बुनता है। विशेषता यह है कि वह अपनी जमीन कभी नहीं छोड़ता है। 
          ‘रुजगार’ (रोजगार) कहानी में मनःस्थितियां तो है ही साथ ही सामाजिक आचरणों के अनेक चित्र भी है। पुलिस और समाज के मध्य जो अंतराल बढ़ गया है, उणकी पोल भी यह कहानी खोलती है। ‘अैफ.आई.आर.’ कहानी तो पुलिसिया-चरित्र को तार-तार कर देती है। समाज का साधारण नागरिक इस में खिलौना सा नजर आता है। भ्रष्टाचार और सामाजिक बदलाव को परखती ‘मेळौ’ संग्रह की कहानियां मनस्थितियां तो रचती ही है, भाषा और शैली-शिल्प भी रचती है, जिस से पाठक पाठ के आरंभ से ही जुड़ जाते हैं। यह इस संग्रह का विशिष्ट-पक्ष है।
          संग्रह की कहानियां ‘दीवळ’ (दीमक) और ‘ओळमौ’ (उलाहना) में स्त्री-पुरुष के संबंधां पर बात रखी गई है। एक कहानी में स्त्री खलनायिका है। ऐसी स्त्री खलनायिका वाली कहानियां कम ही है। ‘ओळमौ’ की नायिका सुरभी और कमल स्त्री-पुरुष के रूप में नहीं मिल कर संस्कार ढोते हुए मिलते हैं। ऐसे संस्कारों के दृश्यों से कमल एक चरित्रवान मनुष्य के रूप में नजर आता है, पर सृष्टि तो स्त्री-पुरुष के मिलन का ही फल है, फिर पाप तो मन में संस्कारों से ही घर किए है। यह बहुत गहरी बात कहानीकार इस कहानी के माध्यम से कहता है।
          ‘ढळता सांस’ और ‘इन्हेलर’ बुढापै री समस्याओं पर संवेदनशील और विवेकपूर्ण ढंग से दृष्टि देती है। एक कहानी में बुढापै की समस्याएं भुगतता एक बुजुर्ग अपना मकान ‘बुजुर्गां’ के लिए दान कर देता है तो दूसरी कहानी में बुजुर्गां की व्यथा-कथा सुन कर एक आदमी सुनसान में मकान बनवाने का निर्णय बदल लेता है। ‘होम करता हाथ नीं बळै’ एक व्यंग्य-कहानी है, यहां वर्णन और चित्रण पाठक का मन तो बहलाता ही है, साथ ही उसे गुदगुदाता भी है।
          वर्तमान समय में कहानीकार कहानियां लिखता है और उस में चुनाव की चर्चा नहीं आए यह कैसे हो सकता है। भ्रष्टाचार में डूबे हुए भीखा ने हसन को हराने के लिए धर्म का सहारा लिया और सफलता मिल गई। ‘धरम री जड़’ कहानी आज के समाजिक रूप-रंग का यथार्थ रखती है। इस कहानी-संग्रह के द्वारा कहानीकार मुसाफ़िर ने राजस्थानी नहीं वरन राजस्थान की आधुनिक कहानी को आधुनिक मनःस्थितियां दी हैं और उसे संवेदनशील व तार्किक बनाया है।
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कहानी को गरिमा देने वाली कहानियां
० नीरज दइया, बीकानेर

    बदलते इस युग की समस्या यह कि भाषा कहानी में पूरे अभिप्राय अभिव्यक्त नहीं कर पा रही है। प्रत्येक कहानी में कहानीकार जो कुछ पाठ से प्रस्तुत करता है, उस से अधिक अप्रगट को पाठ से आलोचना निकाल कर सहेजती है। शब्दों के अंतराल और कहानी के पाठ में गूंजते मौन में भी एक समानांतर संसार लुप्त रहता है। कथा-भाषा में कहानीकार कुछ संकेत छोड़ता है और मौन-संसार जैसे मुखर हो उठता है। राजस्थानी कहानी में राजेन्द्र शर्मा ‘मुसाफ़िर’ का संग्रह ‘मेळौ’ (मेला) ऐसी ही कुछ कहानियों का उल्लेखनीय संग्रह है।   
    शीर्षक कहानी ‘मेळौ’ में सांस्कृतिक रंगों का सशक्त चित्रण है। यहां अमीरी-गरीबी का दृश्य सामने आता है, वहीं अंत में पूरी दुनिया ही किसी बड़े मेले के रूपक में उठ खड़ी होती है। ‘गोगा नवमीं’ का मेला कहानी के दो किशोर भाईयों के लिए इस संसार की माया में खोने का एक अवसर है, तो अर्थी का दृश्य जैसे किसी मुक्ति का मार्ग। स्थूल अर्थों में कहानी में मेले के लिए चंद सिक्कों को पाने का प्रयास है। किशोरों का अर्थी के पीछे रेजगारी के लिए आकर्षण है। यह दृश्य जीवन के अनेक रंगों को अभिव्यक्त करता है। पुरानी परंपराएं, हमारे संस्कार और लोक-विश्वास के अनेक सत्य प्रस्तुत करते हुए कहानीकार जैसे हमारी मान-मर्यादाओं पर प्रश्नचिह्न लगाता है। हम सोचने को विवश हो जाते हैं। 
            “अरे अमीरजादे की ओलादों, तुम्हें जल्दी ही मौत आएगी.... कमीनों... ! हम तो मरे हुए ही हैं तुम भी जल्दी मरोगो... मैं आज यहीं खोल दूंगा तुम्हारी खोपड़ी! हमारे पैसे ही नहीं छोड़े मादर....।”
            इस पंक्ति में जो सत्य है उसमें किशोर अथवा युवा पीढ़ी का सिर्फ विद्रोह ही नहीं है। एक लड़के का पत्थर फेंकना और दूसरे भाई का देखना, अनेक यर्थाथ वर्णित करता है। एक बड़े मेले के इस अंतिम सत्य से हमारे आमने-सामने होते ही आदि सत्य प्रगट होता है जो सदा अनजान रहता था। प्रश्न यह है कि कोई पीढ़ी अपनी समवर्ती अथवा भविष्य की पीढ़ी को क्या कुछ सौंपती है? और क्या कुच सौंपना चाहिए। एक ही समय में हमारे समक्ष अनेक विकल्प मौजूद होते हैं, यह समयानुसार मनःस्थितियों का चयन है कि कोई हाथ ऊपर उठता है और कोई स्थिर-मूक मुद्रा में अपनी नियति समझता है। पूरी कहानी हमें बहुत पुरानी उक्ति का स्मरण करती है कि यह संसार एक मेला है। यह संयोग है कि कहानीकार का उपनाम ‘मुसाफ़िर’ है। 
            एक अन्य महत्त्वपूर्ण कहानी ‘ओळमौ’ (उलाहना) है। जिसमें कुछ शब्दों से कहानी जो व्यक्त करती है, उससे अधिक उसका मौन प्रभावित करता है। कहानी अपने सूक्ष्म और स्थूल संकेतों के जरिए अविस्मरणीय पाठ बन जाती है। कथा नायक-नायिका का ऐसा संयोग बनता है कि वे प्रकृति प्रदत्त स्त्री-पुरुष संबंधों से इतर धर्म और संस्कारों में बंधे जैसे त्याग का यर्थाथ प्रस्तुत करते हैं। यहां एक रात के दैहिक मिलन से अधिक मुखर है उनका नहीं मिलना। यह अधिक अर्थपूर्ण और समकालीन संदर्भों में प्रेरक भी है। एक तरफ जहां पिता और मां की अपनी चिंताएं है, तो दूसरी तरफ नई पीढ़ी के व्यस्कों के अपने तर्क और आस्थाएं है। कहानीकर कोई सीधा संदेश नहीं देता अपितु पाठ में अपने कहानीकार होने का दायित्व निभाता है।
    कहानियों में भाषा, चरित्र-चित्रण और वातावरण का जो प्रभाव पात्रों को उनके भावों और स्तारानुसार जीवंत करता है उसका एक उदाहरण ‘रुजगार’ (रोजगार) कहानी में देखा जा सकता है। हमारे संस्कारों और जीवनमूल्यों का जो वर्तमान स्वरूप हम देख रहे हैं, उनके मूल्यांकन की बात कहानीकार करता है। ये कहानियां अपने द्वंद्व और त्रासदियों द्वारा पाठकों को सजग होने और सजग रहने की दृष्टि देती है।  
            ‘एफ.आई.आर.’ कहानी संवाद-शैली की कहाणी है, जो संवादों में मौन को रचती है। संवादों का कोलाज पुलिस महकमे के साथ आज के मनुष्य और समाज की असलियत उजागर करता है। नाटकीय के मध्य संवेदनहीनता की यह कहानी है, तो किसी चोर के साहूकार बन जाने की कहानी ‘इन्हेलर’ है। इस में चोर के समक्ष एक ऐसी परिस्थिति आती है कि उसकी पूरी दुनिया ही बदल जाती है। सांस्कृतिक रंगों और संस्कारों से परिपूर्ण ‘मेळौ’ की कहानियों में कहाणी कहने-सुनाने का लोक स्वभाव मौजूद है। महत्त्वपूर्ण यह कि नए शिल्प और अपनी भाषा में ये लोक-व्यवहार का कोलाज प्रस्तुत करती हैं। निसंदेह ये कहानियां कहानीकार और राजस्थानी कहानी को गरिमा देने वाली हैं।
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पाठक की भूख भड़कती कहानियां
० पूर्ण शर्मा पूरण. नोहर (हनुमानगढ़)

    पिछले दिनों इन्हीं दिनों मैं पंजाबी कथाकार भाई जिंदर की चर्चित कहानियों का हिन्दी अनुवाद ‘ जख्म, दर्द और पाप’ पढ़ रहा था और अभी भाई राजेन्द्र शर्मा ‘मुसाफिर’ का राजस्थानी कहानी संग्रह ‘मेळौ’ की कहानियां। ऐसा कहना मेरे लिए इसलिए जरूरी था कि जिंदर की कहानियां जिस तरह बिना किसी पुख्ता अनुभव का सहारा लिए पाठकीय संवेदना की गहराई तक जा पहुंचती हैं, ठीक उसी तरह राजेन्द्र शर्मा के संग्रह ‘मेळौ’ की कहानियां भी बिना किसी तामझाम और भाषाई कारीगरी के फकत एक अनाम पर आवश्यक रसायन की बिना पर पाठक के मन की सीमा पर धीरे-से कदम रख देती हैं।
    ये सभी कहानियां अभी तक अघट और भावी अघट घटनाओं की गोधूलि में किसी प्रत्यक्ष होते प्रकाश-सी दमकती कहानियां हैं, जहां किसी अखबारी घटना की जरूरतभर नहीं है। क्योंकि कहानी जिन भीतर के कोठों में जिया करती है, उसे बाहर के कलेवर से भला क्या लेना-देना? भीतर के ये कोठे अंदर से जितने बड़े होते हैं, बाहर के दरवाजे उतने ही छोटे होते हैं। कतई बंद-बंद से। इन बंद-बंद से और कतई छोटे दरवाजों से गुजरकर भीतर की थाह लेना भला कोई हंसी-खेल है! भीतर की पीड़ा महसूसने के लिए तो खुद पीड़ा से गुजरना और पीड़ा को झेलना पड़ता है।
    संग्रह में संकलित सभी कहानियां पाठक को आश्वस्त करने वाली हैं। बानगी के लिए ‘दीवळ’ (दीमक) कहानी को ही ले लें। ‘दीवळ’ एक निराले तेवर की कहानी है। अपनी पत्नी रंजना से पीड़ित रामरतन जिस तरीके से आत्महत्या कर लेता है, वह सच जानने पर हत्या में बदल जाता है। यह हत्या छुरी से नहीं होती, बंदूक की गोली से भी नहीं होती और न ही गला दबाने से होती है। क्योंकि सही तो यही है कि देह का कत्ल होता ही नहीं है। कत्ल तो मन का होता है.......।
    संग्रह की शीर्षक कहानी ‘मेळौ’ (मेला) पढ़ने पर बेचारा पाठक देर तक ऊभ-चूभ-सा बैठा रह जाता है। पाठक भला अनजान है? सब जानता है। कहानी शुरू होते ही कहानी का एक-एक पात्र कहानीकार की निर्दिष्ट दिशा में ही बढ़ता है पर यह निर्देशन अधिक देर तक टिक नहीं पाता। पर जरा देर चलने पर ही पात्र एक-एक कर उससे छिटकते जाते हैं, और अपनी दिशा खुद तय करते जाते हैं। कहानीकार अब फकत उन्हें बराबर भागता देखता रह जाता है..... उन्हें टोक भी नहीं पाता है। ‘मेळौ’ कहानी के दोनों आवारा और मस्त किशोर यदि कहानी के अंत में शवदाह के लिए जाती भीड़ पर पीछे से पत्थर और गालियों की बौछार करने लगें तो उन्हें कौन रोक सकता है?
    मर्द-औरत के झीने-संबधों की पड़ताल करती ‘ओळमौ’ (उलाहना) कहानी भी क्या खूब है। अपने यहां तो इस तरह की बातों को धीरे-से उस ओर सरकाने की परम्परा रही है। पर यह सब इस कहानी में नहीं। औरत जो मां-बहन और पत्नी आदि सभी के लिए कुछ न कुछ होते-होते स्वयं के लिए भी कुछ होती है...। खुद के लिए यह ‘कुछ’ अलबत्ता जरा हटकर और हदकर होता है। इतना हटकर और हदकर कि शायद सामाजिक नियम-कायदों की मजबूत रस्सियों से जकड़े समाज को कतैई पसन्द न आए। समाज के बुढ़ाए फेफड़ों को भला ऐसी खुश्बाती हवा अच्छी लगे भी तो क्यों? शायद तभी तो सदियों से यों दबायी जाती रही है। पर लाख दबा-रौंदा जाए, भला खुशबू रौंदी जा सकती है?  कहीं न कहीं और किसी न किसी बहाने बाहर आएगी ही आएगी....... किसी ‘ओळमौ’ के बहाने ही सही।
    अलग-अलग एक-एक कहानी का चर्चा न कर मैं यदि यह कहूं कि इन सभी कहानियों से पाठक की भूख शांत नहीं होती, अलबत्ता जरा भड़कती ही है तो झूठ न होगा। कहानी के कहानी होने के लिए जिस चीज की सबसे अधिक जरूरत होती है वह सब खूब-सारा है इन कहानियों के पास।
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  2 टिप्‍पणियां:

  1. आदरजोग डॉ. भाटी साब अर भाई नीरजजी री टीप सूं सिरजण सारू म्हारो होसलो बध्यो है. दोनू सक्रिय अर विद्वान पारखी साहित्यकारां रो हियै तणो आभार.

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    1. भाई राजेन्द्र जी, घणो घणो आभार। एक टिप्प्णी भाई श्री पूर्ण शर्मा पूरण री फेर जोड़ दी है। दस टिप्पणियां एक किताब माथै एकठ करण री योजना है। सैयोग सारू फेर आभार।

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