बुधवार, 5 अक्तूबर 2016

राजेन्द्र शर्मा 'मुसाफ़िर' का राजस्थानी कहानी संग्रह : "मेळौ”

 मेळौ (राजस्थानी कहानी संग्रह) राजेन्द्र शर्मा 'मुसाफ़िर' / संस्करण : 2015 / पृष्ठ : 112 / मूल्य : 90 रुपये / प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, एफ-77, सेक्टर- 9, रोड नं. 11, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर
राजेन्द्र शर्मा 'मुसाफ़िर'
जन्म : 27 जून, 1965 चूरू (राजस्थान)
शिक्षा : एम.ए., बी.एड., एलएल.बी.
पिछले पच्चीस वर्षों से विविध विधाओं में राजस्थानी और हिंदी में समान रूप से लेखन-प्रकाशन। राजस्थानी कहानियों के प्रथम संग्रह ‘मेळौ’ से चर्चित। काशीनाथ सिंह के उपन्यास का राजस्थानी अनुवाद ‘हाळी रग्घू’ साहित्य अकादेमी नई दिल्ली से प्रकाशित। डॉ. श्रीगोपाल काबरा की चुनिंदा हिंदी कहानियों का राजस्थानी अनुवाद ‘अस्पताळ रै दरूजै सूं’ प्रकाशित। कुछ कविताएं ‘थार सप्तक-3' (संपादक : ओम पुरोहित ‘कागद’) में प्रकाशित।
शिक्षा विभाग राजस्थान में शिक्षक के रूप में सेवारत।
संपर्क : सावित्री सदन, सी-122, अग्रसेन नगर, चूरू (राजस्थान)
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समाजिक आचरणों का कलात्मक चित्रण 
० डॉ. आईदानसिंह भाटी, जोधपुर

    भारत और दुनिया के बदलते सामाजिक परिवेश का राजस्थान के समाज पर जो असर हुआ है, और जो प्रवृतियां इस समाज में पनपी है, उनका उम्दा वर्णन राजेन्द्र शर्मा ‘मुसाफ़िर’ के कहानी-संग्रह में देखने को मिलता है। विकास की दौड़ में पीछे छूटे समाज की मनःस्थितियां और आचरण को मेळै (मेला) कहानी के अलावा ‘लाखां में अेक’ (लाखों में एक) और अन्य भी कई कहाणियों में प्रस्तुत किया गया है। ‘लाखां में अेक’ कहानी विकास और प्रगति की चिंदियां बिखेरती है। लेखक आपरी जमीन पर खड़े होकर कथा बुनता है। विशेषता यह है कि वह अपनी जमीन कभी नहीं छोड़ता है। 
          ‘रुजगार’ (रोजगार) कहानी में मनःस्थितियां तो है ही साथ ही सामाजिक आचरणों के अनेक चित्र भी है। पुलिस और समाज के मध्य जो अंतराल बढ़ गया है, उणकी पोल भी यह कहानी खोलती है। ‘अैफ.आई.आर.’ कहानी तो पुलिसिया-चरित्र को तार-तार कर देती है। समाज का साधारण नागरिक इस में खिलौना सा नजर आता है। भ्रष्टाचार और सामाजिक बदलाव को परखती ‘मेळौ’ संग्रह की कहानियां मनस्थितियां तो रचती ही है, भाषा और शैली-शिल्प भी रचती है, जिस से पाठक पाठ के आरंभ से ही जुड़ जाते हैं। यह इस संग्रह का विशिष्ट-पक्ष है।
          संग्रह की कहानियां ‘दीवळ’ (दीमक) और ‘ओळमौ’ (उलाहना) में स्त्री-पुरुष के संबंधां पर बात रखी गई है। एक कहानी में स्त्री खलनायिका है। ऐसी स्त्री खलनायिका वाली कहानियां कम ही है। ‘ओळमौ’ की नायिका सुरभी और कमल स्त्री-पुरुष के रूप में नहीं मिल कर संस्कार ढोते हुए मिलते हैं। ऐसे संस्कारों के दृश्यों से कमल एक चरित्रवान मनुष्य के रूप में नजर आता है, पर सृष्टि तो स्त्री-पुरुष के मिलन का ही फल है, फिर पाप तो मन में संस्कारों से ही घर किए है। यह बहुत गहरी बात कहानीकार इस कहानी के माध्यम से कहता है।
          ‘ढळता सांस’ और ‘इन्हेलर’ बुढापै री समस्याओं पर संवेदनशील और विवेकपूर्ण ढंग से दृष्टि देती है। एक कहानी में बुढापै की समस्याएं भुगतता एक बुजुर्ग अपना मकान ‘बुजुर्गां’ के लिए दान कर देता है तो दूसरी कहानी में बुजुर्गां की व्यथा-कथा सुन कर एक आदमी सुनसान में मकान बनवाने का निर्णय बदल लेता है। ‘होम करता हाथ नीं बळै’ एक व्यंग्य-कहानी है, यहां वर्णन और चित्रण पाठक का मन तो बहलाता ही है, साथ ही उसे गुदगुदाता भी है।
          वर्तमान समय में कहानीकार कहानियां लिखता है और उस में चुनाव की चर्चा नहीं आए यह कैसे हो सकता है। भ्रष्टाचार में डूबे हुए भीखा ने हसन को हराने के लिए धर्म का सहारा लिया और सफलता मिल गई। ‘धरम री जड़’ कहानी आज के समाजिक रूप-रंग का यथार्थ रखती है। इस कहानी-संग्रह के द्वारा कहानीकार मुसाफ़िर ने राजस्थानी नहीं वरन राजस्थान की आधुनिक कहानी को आधुनिक मनःस्थितियां दी हैं और उसे संवेदनशील व तार्किक बनाया है।
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कहानी को गरिमा देने वाली कहानियां
० नीरज दइया, बीकानेर

    बदलते इस युग की समस्या यह कि भाषा कहानी में पूरे अभिप्राय अभिव्यक्त नहीं कर पा रही है। प्रत्येक कहानी में कहानीकार जो कुछ पाठ से प्रस्तुत करता है, उस से अधिक अप्रगट को पाठ से आलोचना निकाल कर सहेजती है। शब्दों के अंतराल और कहानी के पाठ में गूंजते मौन में भी एक समानांतर संसार लुप्त रहता है। कथा-भाषा में कहानीकार कुछ संकेत छोड़ता है और मौन-संसार जैसे मुखर हो उठता है। राजस्थानी कहानी में राजेन्द्र शर्मा ‘मुसाफ़िर’ का संग्रह ‘मेळौ’ (मेला) ऐसी ही कुछ कहानियों का उल्लेखनीय संग्रह है।   
    शीर्षक कहानी ‘मेळौ’ में सांस्कृतिक रंगों का सशक्त चित्रण है। यहां अमीरी-गरीबी का दृश्य सामने आता है, वहीं अंत में पूरी दुनिया ही किसी बड़े मेले के रूपक में उठ खड़ी होती है। ‘गोगा नवमीं’ का मेला कहानी के दो किशोर भाईयों के लिए इस संसार की माया में खोने का एक अवसर है, तो अर्थी का दृश्य जैसे किसी मुक्ति का मार्ग। स्थूल अर्थों में कहानी में मेले के लिए चंद सिक्कों को पाने का प्रयास है। किशोरों का अर्थी के पीछे रेजगारी के लिए आकर्षण है। यह दृश्य जीवन के अनेक रंगों को अभिव्यक्त करता है। पुरानी परंपराएं, हमारे संस्कार और लोक-विश्वास के अनेक सत्य प्रस्तुत करते हुए कहानीकार जैसे हमारी मान-मर्यादाओं पर प्रश्नचिह्न लगाता है। हम सोचने को विवश हो जाते हैं। 
            “अरे अमीरजादे की ओलादों, तुम्हें जल्दी ही मौत आएगी.... कमीनों... ! हम तो मरे हुए ही हैं तुम भी जल्दी मरोगो... मैं आज यहीं खोल दूंगा तुम्हारी खोपड़ी! हमारे पैसे ही नहीं छोड़े मादर....।”
            इस पंक्ति में जो सत्य है उसमें किशोर अथवा युवा पीढ़ी का सिर्फ विद्रोह ही नहीं है। एक लड़के का पत्थर फेंकना और दूसरे भाई का देखना, अनेक यर्थाथ वर्णित करता है। एक बड़े मेले के इस अंतिम सत्य से हमारे आमने-सामने होते ही आदि सत्य प्रगट होता है जो सदा अनजान रहता था। प्रश्न यह है कि कोई पीढ़ी अपनी समवर्ती अथवा भविष्य की पीढ़ी को क्या कुछ सौंपती है? और क्या कुच सौंपना चाहिए। एक ही समय में हमारे समक्ष अनेक विकल्प मौजूद होते हैं, यह समयानुसार मनःस्थितियों का चयन है कि कोई हाथ ऊपर उठता है और कोई स्थिर-मूक मुद्रा में अपनी नियति समझता है। पूरी कहानी हमें बहुत पुरानी उक्ति का स्मरण करती है कि यह संसार एक मेला है। यह संयोग है कि कहानीकार का उपनाम ‘मुसाफ़िर’ है। 
            एक अन्य महत्त्वपूर्ण कहानी ‘ओळमौ’ (उलाहना) है। जिसमें कुछ शब्दों से कहानी जो व्यक्त करती है, उससे अधिक उसका मौन प्रभावित करता है। कहानी अपने सूक्ष्म और स्थूल संकेतों के जरिए अविस्मरणीय पाठ बन जाती है। कथा नायक-नायिका का ऐसा संयोग बनता है कि वे प्रकृति प्रदत्त स्त्री-पुरुष संबंधों से इतर धर्म और संस्कारों में बंधे जैसे त्याग का यर्थाथ प्रस्तुत करते हैं। यहां एक रात के दैहिक मिलन से अधिक मुखर है उनका नहीं मिलना। यह अधिक अर्थपूर्ण और समकालीन संदर्भों में प्रेरक भी है। एक तरफ जहां पिता और मां की अपनी चिंताएं है, तो दूसरी तरफ नई पीढ़ी के व्यस्कों के अपने तर्क और आस्थाएं है। कहानीकर कोई सीधा संदेश नहीं देता अपितु पाठ में अपने कहानीकार होने का दायित्व निभाता है।
    कहानियों में भाषा, चरित्र-चित्रण और वातावरण का जो प्रभाव पात्रों को उनके भावों और स्तारानुसार जीवंत करता है उसका एक उदाहरण ‘रुजगार’ (रोजगार) कहानी में देखा जा सकता है। हमारे संस्कारों और जीवनमूल्यों का जो वर्तमान स्वरूप हम देख रहे हैं, उनके मूल्यांकन की बात कहानीकार करता है। ये कहानियां अपने द्वंद्व और त्रासदियों द्वारा पाठकों को सजग होने और सजग रहने की दृष्टि देती है।  
            ‘एफ.आई.आर.’ कहानी संवाद-शैली की कहाणी है, जो संवादों में मौन को रचती है। संवादों का कोलाज पुलिस महकमे के साथ आज के मनुष्य और समाज की असलियत उजागर करता है। नाटकीय के मध्य संवेदनहीनता की यह कहानी है, तो किसी चोर के साहूकार बन जाने की कहानी ‘इन्हेलर’ है। इस में चोर के समक्ष एक ऐसी परिस्थिति आती है कि उसकी पूरी दुनिया ही बदल जाती है। सांस्कृतिक रंगों और संस्कारों से परिपूर्ण ‘मेळौ’ की कहानियों में कहाणी कहने-सुनाने का लोक स्वभाव मौजूद है। महत्त्वपूर्ण यह कि नए शिल्प और अपनी भाषा में ये लोक-व्यवहार का कोलाज प्रस्तुत करती हैं। निसंदेह ये कहानियां कहानीकार और राजस्थानी कहानी को गरिमा देने वाली हैं।
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पाठक की भूख भड़कती कहानियां
० पूर्ण शर्मा पूरण. नोहर (हनुमानगढ़)

    पिछले दिनों इन्हीं दिनों मैं पंजाबी कथाकार भाई जिंदर की चर्चित कहानियों का हिन्दी अनुवाद ‘ जख्म, दर्द और पाप’ पढ़ रहा था और अभी भाई राजेन्द्र शर्मा ‘मुसाफिर’ का राजस्थानी कहानी संग्रह ‘मेळौ’ की कहानियां। ऐसा कहना मेरे लिए इसलिए जरूरी था कि जिंदर की कहानियां जिस तरह बिना किसी पुख्ता अनुभव का सहारा लिए पाठकीय संवेदना की गहराई तक जा पहुंचती हैं, ठीक उसी तरह राजेन्द्र शर्मा के संग्रह ‘मेळौ’ की कहानियां भी बिना किसी तामझाम और भाषाई कारीगरी के फकत एक अनाम पर आवश्यक रसायन की बिना पर पाठक के मन की सीमा पर धीरे-से कदम रख देती हैं।
    ये सभी कहानियां अभी तक अघट और भावी अघट घटनाओं की गोधूलि में किसी प्रत्यक्ष होते प्रकाश-सी दमकती कहानियां हैं, जहां किसी अखबारी घटना की जरूरतभर नहीं है। क्योंकि कहानी जिन भीतर के कोठों में जिया करती है, उसे बाहर के कलेवर से भला क्या लेना-देना? भीतर के ये कोठे अंदर से जितने बड़े होते हैं, बाहर के दरवाजे उतने ही छोटे होते हैं। कतई बंद-बंद से। इन बंद-बंद से और कतई छोटे दरवाजों से गुजरकर भीतर की थाह लेना भला कोई हंसी-खेल है! भीतर की पीड़ा महसूसने के लिए तो खुद पीड़ा से गुजरना और पीड़ा को झेलना पड़ता है।
    संग्रह में संकलित सभी कहानियां पाठक को आश्वस्त करने वाली हैं। बानगी के लिए ‘दीवळ’ (दीमक) कहानी को ही ले लें। ‘दीवळ’ एक निराले तेवर की कहानी है। अपनी पत्नी रंजना से पीड़ित रामरतन जिस तरीके से आत्महत्या कर लेता है, वह सच जानने पर हत्या में बदल जाता है। यह हत्या छुरी से नहीं होती, बंदूक की गोली से भी नहीं होती और न ही गला दबाने से होती है। क्योंकि सही तो यही है कि देह का कत्ल होता ही नहीं है। कत्ल तो मन का होता है.......।
    संग्रह की शीर्षक कहानी ‘मेळौ’ (मेला) पढ़ने पर बेचारा पाठक देर तक ऊभ-चूभ-सा बैठा रह जाता है। पाठक भला अनजान है? सब जानता है। कहानी शुरू होते ही कहानी का एक-एक पात्र कहानीकार की निर्दिष्ट दिशा में ही बढ़ता है पर यह निर्देशन अधिक देर तक टिक नहीं पाता। पर जरा देर चलने पर ही पात्र एक-एक कर उससे छिटकते जाते हैं, और अपनी दिशा खुद तय करते जाते हैं। कहानीकार अब फकत उन्हें बराबर भागता देखता रह जाता है..... उन्हें टोक भी नहीं पाता है। ‘मेळौ’ कहानी के दोनों आवारा और मस्त किशोर यदि कहानी के अंत में शवदाह के लिए जाती भीड़ पर पीछे से पत्थर और गालियों की बौछार करने लगें तो उन्हें कौन रोक सकता है?
    मर्द-औरत के झीने-संबधों की पड़ताल करती ‘ओळमौ’ (उलाहना) कहानी भी क्या खूब है। अपने यहां तो इस तरह की बातों को धीरे-से उस ओर सरकाने की परम्परा रही है। पर यह सब इस कहानी में नहीं। औरत जो मां-बहन और पत्नी आदि सभी के लिए कुछ न कुछ होते-होते स्वयं के लिए भी कुछ होती है...। खुद के लिए यह ‘कुछ’ अलबत्ता जरा हटकर और हदकर होता है। इतना हटकर और हदकर कि शायद सामाजिक नियम-कायदों की मजबूत रस्सियों से जकड़े समाज को कतैई पसन्द न आए। समाज के बुढ़ाए फेफड़ों को भला ऐसी खुश्बाती हवा अच्छी लगे भी तो क्यों? शायद तभी तो सदियों से यों दबायी जाती रही है। पर लाख दबा-रौंदा जाए, भला खुशबू रौंदी जा सकती है?  कहीं न कहीं और किसी न किसी बहाने बाहर आएगी ही आएगी....... किसी ‘ओळमौ’ के बहाने ही सही।
    अलग-अलग एक-एक कहानी का चर्चा न कर मैं यदि यह कहूं कि इन सभी कहानियों से पाठक की भूख शांत नहीं होती, अलबत्ता जरा भड़कती ही है तो झूठ न होगा। कहानी के कहानी होने के लिए जिस चीज की सबसे अधिक जरूरत होती है वह सब खूब-सारा है इन कहानियों के पास।
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झूठे समाज की खरी अभिव्यक्ति-‘मेळौ'
० मनमीत सोनी, चूरू

आर्थर कोसलर ने अपनी पुस्तक 'योगी एंड दी कमिस्सार' में कहा है कि, "हमें एक ऐसे रंगवीक्षक यंत्र, स्पेक्ट्रस्कोप की आवश्यकता है जिससे हम जीवन को नए सिरे से देख सकें, जिसके द्वारा जीवन का कीचड़ साफ-सुथरा और स्पष्ट रूप से दिखाई पड़े, जिसे सुधार कर जीवन को इंद्रधनुषी बना सकें।"
एक लेखक वस्तुतः यही तो करता है। वह देखता है भीतर-बाहर। कभी इंगित मात्र करता है कभी साफगोई से काम लेता है। लेकिन चुप नहीं रहता है। राजेंद्र शर्मा 'मुसाफ़िर' के भीतर का लेखक भी चुप नहीं रहता है। वह जीवन, समाज और उसके प्रत्येक घटक पर अपनी पैनी दृष्टि रखता है।
अपनी कहानियों में 'मुसाफ़िर' का लेखक रेल और बस का अंतर केवल यातायात के साधन के स्तर पर ही नहीं करता है वरन संवेदना के स्तर पर भी करता है। वह अपनी कहानी 'दीवळ' में स्वयं को हीरालाल नामक चरित्र के माध्यम से जागती आँखों से देखे सपने तक में भी अकेलेपन के सीमान्त पर पाता है। तो कभी अपनी कहानी 'मेळो' में गोगाजी के मेले में जाने के लिए आतुर बच्चों की इच्छाओं को साकार न हो पाता देख अठन्नियों के भाव अर्थी निकालने वाले समाज पर पत्थर भी फिंकवाता है। कभी अपनी कहानी 'ढळता सांस' में बिना किसी लाग लपेट के नाजोगी औलादों को कोसता है। अपनी कहानी 'ओळमो' में तो वह अस्मिता के विमर्श में नया अध्याय ही जोड़ता प्रतीत होता है। इस कहानी को पढ़ते हुए आप सुरभी के क़ायल न हो जाएँ तो कहियेगा। इसी तरह 'इन्हेलर' कहानी भी भीतर तक झिंझोड़ कर रख देती है। किसी चोर के ह्रदय परिवर्तन पर लिखी पहली कहानी न होते हुए भी यह कहानी पहले की कहानियों से किंचित आगे ही जाती है। कहानीकार को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उसने एक चोर से उसकी आपबीती उगलवाकर सैनीजी और ग्रोवर जी को अपने अंतःस्थल में झाँकने पर मजबूर कर दिया।
संग्रह में कुल ग्यारह कहानियाँ हैं जिनमें अंतिम कहानी है ‘हियै चानणौ'। बहुधा यह होता है कि कोई लेखक जब अपनी सम्पूर्ण सर्जना-शक्ति से अपने आस-पास को देखता है तो उसे बहुत कम 'स्पेस' में भी एक महाख्यान की गुंजाइश दिखाई पड़ जाती है। तब पाठकों के लिए यह आश्चर्य का विषय होता है कि लेखक को यह सूझा कैसे होगा? मुझे इस कहानी को पढ़कर एक अजीब-सी सिहरन महसूस हुई। फिल्मों का शौक़ीन होने के नाते यदि कोई मुझे इसपर एक शार्ट फिल्म बनाने को कहता तो मैं कोशिश कर सकता था। कहानीकार को इस बात की दाद देनी होगी कि उसने इस विषय को इतना आसान और सीधा बना दिया। इस कहानी को पढ़ने के बाद संभवतः इसके प्रत्येक पाठक में आत्मविश्वास की एक लहर-सी उठेगी।
'मुसाफ़िर' का राजस्थानी भाषा में लिखा गया यह कहानी संग्रह उनके लेखन की ऊँचाई को इंगित करता है। यदि राजेंद्र शर्मा ‘मुसाफ़िर‘ अपनी कहानियों में सार्वजनिक दिखाई देते हैं और हर आते-जाते से सीधे मुँह बात करते हैं तो किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? श्री राजेंद्र शर्मा 'मुसाफ़िर' अपनी ही रौ के कहानीकार हैं। वे जो देखते हैं, महसूस करते हैं, उसे किंचित ज़रूरी नाटकीयता के साथ समाज के सामने रख देते हैं। यदि यह शैली श्री 'मुसाफिर' की सीमा बन जाती तो वे 'ओळमो' जैसी कहानी की रचना नहीं कर सकते थे। यह कहानी उनके प्रत्येक साहित्यिक आंदोलन से न केवल परिचित होने वरन उन आन्दोलनों में गहरे पैठे होने की भी ज़मानत देती है।
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एक मुकम्मल कहानी-संग्रह : ‘मेळौ’
० डॉ. सुरेन्द्र डी. सोनी, चूरू

राजेन्द्र शर्मा ‘मुसाफ़िर का कहानी संग्रह ‘मेळौ’ राजस्थानी कथा-साहित्य में एक सराहनीय योगदान है। आज जब चारों तरफ संस्कृति को तार-तार करने की बातें लिखी जा रही हैं तब ‘मुसाफ़िर’ संस्कृति को सहेजने और आगे बढाने वाली जमीन पर अपनी कलम चलाते हैं। आलोच्य कथा-संग्रह में समाज की सबसे छोटी इकाई ‘व्यक्ति’ से लेकर सबसे बड़ी इकाई देष और विष्व के समक्ष खड़े संकटों को पैनी नज़र से देखा गया है। इस दृष्टि से संग्रह की रुज़गार, दीवळ, मेळौ, ढळता सांस, अैफ.आई.आर., ओळमौ, इन्हेलर, सहित ग्यारह कहानियां याद रखी जाने योग्य हैं।
    ‘मुसाफ़िर’ ने अपनी कहानियों में इस बात को समझाने का सफल प्रयास किया है कि रोज़ग़ार के लिए व्यक्ति क्या-क्या करने को मजबूर हो जाता है! परन्तु लेखक अपने संस्कारों में रची-बसी इस बात को भी ध्यान में रखता है कि ‘धर्म की जड़’ सदा हरी होती है। ‘मेळौ’ कहानी में यह बताने की चेष्टा हैं कि ये दुनिया एक मेला ही है जिसमें मनुष्य अपने-अपने हिसाब से भला या बुरा रोल करता हैं। समाज में ऐसे लोग भी हैं जो ‘लाखों में एक’ कहे जा सकते हैं। दूसरी तरफ ऐसे भी, जो अपनी जुबान पर उपालम्भ लिए तत्पर रहते हैं। रचनाकार कहना चाहता है कि एक तरफ ऐसे लोग हैं जो समाज में लगी, व्यक्ति रूपी दीमक को खत्म करने की ठानते हैं कि हमेषा हवन करने से हाथ नहीं जलते। परिवार-समाज की विडम्बनाओं को देखकर रचनाकार लिखता है कि ढलती उम्र कितनी पीड़ादायी है और बुढापा काटना बेहद मुश्किल! लेखक जानता है कि देष की कानून व्यवस्था कितनी भ्रष्ट हो गई है जहां एक भला और सीधा-सादा इन्सान अपने घर हुई चोरी की रपट भी थाने में नहीं लिखवा सकता।
अपनी सभी कहानियों में लेखक इस बात की अनुभूति करवाना चाहता है कि समाज की सांस जब उखड़ने लगती है और वह हांफने लगता है तब उसे समर्पण और त्याग के ‘इन्हेलर’ की आवष्यकता पड़ती है। संग्रह की भाषा समृद्ध राजस्थानी है। कहानियों को पढते समय पाठक को राजस्थानी के नये शब्दों का ज्ञान भी होता है। जहां कहानी की मांग है वहां कहानीकार अंग्रेजी के शब्द काम में लेने से भी परहेज नहीं करता। जैसे- डेजिग्नेशन, माईक, प्रिंसिपल, राउंड, इमेज, पैकेज, फ्रैष, जूस, अंकल, ट्राई, ड्यूटी आदि शब्द। दो कहानियों के तो टाइटल ही अंग्रेजी के शब्दों में दिये गये हैं।
भाषा-शैली को देखते हुए इस संग्रह की एक भी कहानी ऐसी नहीं है जिसे एक बैठक में पूरी पढने का मन न करे। कोई भी कहानीकार ‘कहानी’ के पैमाने पर तब खरा उतरता है जब वह अपनी भाषा में एक रवानी, शैली में रोचकता और प्रस्तुतिकरण में ऐसा गुंफन रखता है कि जो संदेष वह देना चाहता है वह पाठक के दिलो-दिमाग़ में सहज रूप में उतर जाये।
इस तरह ‘मुसाफ़िर’ कहानी-लेखन के पैमाने पर पूरा खरा उतरते हैं। हां, समय के साथ कुछ और आगे बढकर, अगर वे और भी कई विषयों पर अपनी कलम चलाएं तो उनकी प्रतिभा का साहित्य-समाज को लाभ मिलेगा। ये विषय हो सकते हैं- ट्रांसजेण्डरों की स्थिति, कॉलेजों और यूनिवर्सिटियों का बिगड़ता माहौल, सोशल मीडिया का समाज पर पड़ता नकारात्मक प्रभाव, राजनीति की राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय समस्याएं आदि। किसी भी लेखक का मूल्यांकन उसकी सक्रियता के दौर में नहीं होती। लेखक का मूल्यांकन कम से कम दो-तीन पीढ़ियां गुजरने के बाद होता है।कोई लेखक अपनी अंर्तदृष्टि से ऐसे विषय चुनता है, जो दो-तीन पीढी के आगे के समाज को दर्षाये- तो उसको सम्मान मिलता है। राजेन्द्र शर्मा ‘मुसाफ़िर’ में वे सभी सम्भावनाएं मौजूद है, जो उन्हें दो-तीन पीढी के आगे का एक सक्षम और ज़रूरी लेखक बना सकता है।
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जीवन की आलोचना करती कहानियां
मोहन ‘चक्र’, चूरू
लेखक अपने समय की परिस्थितियों का समालोचक तो होता ही है अपितु वह दृष्टा, सृष्टा और यथार्थ को भोगने वाला भी होता है। वह कोई भी विधा को रचे, मगर वह अपने परिप्रेक्ष्य में जीवन को जरूर रचता है। राजेन्द्र शर्मा ‘मुसाफ़िर’ अपने पहले राजस्थानी कथा-संग्रह ‘मेळौ’ में कुछ इसी तरह जीवन की आलोचना करते हैं। वे जीवन को पुनर्निमित करते हैं तो कहीं अपनी पैनी दृष्टि से वर्तमान जीवन की विसंगतियों, विडम्बनाओं पर यथार्थपरक करारी चोट भी करते हैं।
    ‘मेळौ’ कथा-संग्रह की कुल ग्यारह कहानियां जीवन के प्रत्येक पक्ष को स्पर्श करती हैं। एक नये सत्य को उद्घाटित करती हुई पाठक को यह सोचने को मजबूर कर देती है कि उसने जो भोगा है, जो देखा है उसके दूसरे पक्ष में कितनी पीड़ा और दर्द है। पहली कहानी ‘रुज़ग़ार’ पात्रों के चेतन से अवचेतन मन का पोस्टमार्टम कर समाज के उस ट्यूमर की सर्जरी करती नजर आती है जो आसानी से दिखाई नहीं देती।
‘दीवळ’ कहानी में शारदा का यह बयान, ‘‘लुगाई आपरी पीड, झुंझळ कै आपरी भड़ास मरद रै साम्हीं प्रगटै तौ वा कळगारी हुय जावै अर जे लरड़ी दांईं गुद्दी नीची कर्यां सहण करती जावै तौ पतिवरता!....’’ नारी विमर्श पर लिखी अनगिनत कहानियों में सबसे सटीक व टू दी पॉइंट तथ्य है। शीर्षक कहानी ‘मेळौ’ में मुसाफ़िर सड़े-गले समाज के उस सत्य को उद्घाटित करने में सफल हैं जो अपने दिखावे और थोथी नैतिकता के कारण खुद अपने ही बंधन में जकड़ा हुआ है। निःसंदेह, आक्रोशित किशोर पात्र के फेंके गये पत्थर शवयात्रा में शामिल लोगों तक नहीं पहुंचे। लेकिन लड़के की उच्च वर्ग के प्रति वितृष्णा ने वो सब कुछ बयान कर दिया जो हमें अज्ञात खतरे के लिए सावचेत करता नज़र आता है। लेखक इस कहानी के आखि़र में ‘अेकलपखी घमसाण’ को सटीक अभिव्यक्ति देने में पूर्णतः सफल हुआ है। ‘ढळता सांस’ कहानी अपनी ज़िम्मेदारी से भागती उस पीढी पर व्यंग्य है जिसने थाली में परोसे मूल्यों के प्रति बेरुखी दिखाते हुए भोगवादी संस्कृति को अपनाया और आज खुद अपने ही अस्तित्व पर संकट को महसूस करते हुए, ‘न निगलते बना, न उगलते बना’ वाली स्थिति में पहुच गई है।
‘इन्हेलर’ कहानी को ‘ढळता सांस’ का दूसरा सौपान कहें तो ग़लत नहीं होगा। ‘एफ.आई.आर. कहानी पुलिस व्यवस्था की अन्यायपूर्ण व्यवस्था पर क़रारी चोट करती है। लेखक साहस के साथ उन तथ्यों कों उजागर करने में सफल हो जाता है कि यह सिस्टम आम आदमी के लिए है या आम आदमी सिस्टम का औजार! आधुनिक सोच से ओतप्रोत ‘ओळमो’ कहानी में सामान्य सी घटना को अपनी सृजन-कला के दम पर याद रखने योग्य कहानी बनाने में लेखक ने कमाल किया है।
राजेन्द्र शर्मा पेशे से अध्यापक हैं। उन्होंने सरकारी सेवा में गांवों के यथार्थ को देखा है। हो सकता है कि लोकतंत्र की विद्रूपताओं को भोगा भी है, वरना ‘धरम री जड़’ जैसी कहानी में वह घिनोना यथार्थ नहीं आ पाता जो हमें आज के समय के हर गांव की कुत्सित राजनीति के रू-ब-रू कराता है। चुनाव चाहे वह सरपंच का हो चाहे विधायक-सांसद का, सभी में धनबल-बाहुबल, धर्म-जाति की आड़ में छल-कपट का सहारा लिया जाता है जिसकी सटीक अभिव्यक्ति इस कहानी में हुई है। ‘लाखां में एक’ और ‘होम करतां हाथ कोनी बळै’ कहानियां आदर्ष और यथार्थ, नैतिक मूल्यों की गिरावट और वर्तमान की विसंगतियों को सामने रखती है।
निष्कर्षतः, राजेन्द्र शर्मा ‘मुसाफ़िर’ का ‘मेळौ’ संग्रह कहीं हमे प्रेमचंद के आदर्शवादी यथार्थ के दर्शन कराता है तो कहीं अमरकांत के पूर्णतः यथार्थवाद की ओर ले जाता है। कहीं-कहीं मनोहर श्याम जोशी जैसा राजनीतिक व्यंग्य-रचाव भी दिखाई देता है। सफल कथाओं के लिए लेखक को साधुवाद।
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राजस्थानी कहानियों में श्लाघनीय प्रयास : ‘मेळौ’
बाबूलाल शर्मा, चूरू

कहानी, ज़िन्दगी के विभिन्न पहलुओं की जटिलताओं, उलझनों आदि पर कहानीकार का निदानात्मक विचार होती है। आलोच्य कृति में ‘रुजगार‘ कहानी के माध्यम से कहानीकार यह संकेत करता है कि समाज में घोर आर्थिक विषमता है। एक तरफ अकल्पनीय सम्पन्नता और दूसरी तरफ भयंकर भुखमरी, बेरोजगारी, अभाव शोषण, उत्पीड़न की स्थितियां हैं। ऐसे में जीवन-यापन के लिए कुछ लोग मानवता से गिरकर पतनोन्मुखी कृत्य को भी रोजगार का साधन बना लें तो समाज को चिंतन-मनन करना चाहिए।
वर्तमान में अंधी आर्थिक प्रतिस्पर्धा के चलते नैतिक और मानवीय मूल्यों में गिरावट आ रही है। हमारी जीवन शैली आडम्बरयुक्त हो गई है। भौतिकता की अंधी दौड़ में कोई अपना चरित्र भी दांव पर लगाता है तो आश्चर्य नहीं! दूसरी ओर, रामरतन जैसा कहानी-पात्र आदर्श जीवन जीना चाहे तो उसे कुण्ठित जीवन जीते-जीते मृत्यु का वरण भी करना पड़े तो स्वीकार्य है। समाज के अन्य लोग ऐसे आदर्शवादी की मृत्यु के वास्तविक कारण को जानने के बाद भी संवेदनशून्य हैं और जो दोषी हैं उनके सहयोगी होते दिखाई देते हैं तो कहानीकार का मन आश्चर्य और घृणा से भर जाता है और अपने पात्र हीरालाल के माध्यम से मन की चित्कार और विद्रोह को प्रकट करता है। ‘दीवळ’ कहानी पाठक के लिए द्वंद्व छोड़ती है।
विषम असहनीय, शोषणयुक्त, उत्पीड़नयुक्त आर्थिक दशाओं में जीवनयापन करने वाले बालकों का बड़ा ही मार्मिक और मनोवैज्ञानिक यथार्थ चित्रण ‘मेळो’ कहानी में भी मिलता है। कहानीकार हमारे आस-पास आर्थिक विषमता से पीड़ित समाज व पूंजीपतियों के दिखावा-पसंद व्यवहार को उजागर करने में सफल रहा है। ‘अैफ.आई.आर.’ कहानी पुलिस की कार्यषैली पर एक कटु परन्तु यथार्थ व्यंग्य है।
एक कुंवारी युवती का रात्रि में अकेले ऐसे घर में रुकना जहां केवल एक युवक हो तो युवती जिस अंतर्द्वंद्व से गुजरती है उसका बड़ा ही सहज चित्रण ‘ओळमो’ कहानी में मिलता है। दुर्भाग्य से ही सही ऐसा संयोग हो जाये तो भी अपने आप को सभ्य, शिक्षित- विकसित समझने वाला समाज इस संयोग को निःसंकोच पचा नहीं पाता है। इस सच्चाई को कहानीकार ने बखूबी प्रकट किया है।
‘इन्हेलर’ कहानी एक चोर की आत्मकथा का रोचक अंश है। चोर भी इन्सान ही तो हैं, कभी-कभी विचित्र परिस्थितियां पतित, निर्दयी और अपराधी दिखने वाले व्यक्ति के हृदय में भी कोमल मानवीय भावों का संचार कर देती हैं। कहानी में चोरी की नीयत से घुसे व्यक्ति का हृदय परिवर्तन हो जाता है जो कहानीकार के सकारात्मक सोच का प्रतीक है। ‘धरम री जड़’ कहानी आज के राजनेताओं के कपटपूर्ण और भ्रष्ट आचरण और सभ्य, षिष्ट, ईमानदार व्यक्तियों की विवषतापूण असफलता का विश्लेषण करती है।
‘धरम री जड़’ कहानी में वर्तमान राजनीति के भ्रष्ट स्वरूप का यथार्थ व मर्मस्पर्शी वर्णन किया गया है। इसमें आज के राजनेताओं के कपटपूर्ण एवं भ्रष्ट आचरण के साथ ही ईमानदार व्यक्तियों की विवशताओं का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है। धर्म, सम्प्रदाय, जाति, क्षेत्र, भाषा आदि के संकुचित दायरों में घिर कर राजनीति दूषित हो चुकी है। इनकी अनुगूंज कहानी में सुनाई देती है।
‘लाखां में एक’ कहानी में दादा-पोते के संवाद के माध्यम से व्यक्तिगत स्वार्थ से परे सर्वजन-हित को श्रेष्ठ सिद्ध किया गया है। व्यष्टि से समष्टि का लक्ष्य श्रेयस्कर होता है, यह स्थापित करके लेखक ने कहानी के शीर्षक की सार्थकता सिद्ध की है।
कृति की सभी कहानियां लेखन की सार्थकता सिद्ध करती हैं। पुस्तक पठनीय है। राजेन्द्र मुसाफ़िर’ का यह प्रयास श्लाघनीय है।
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सुन्दर और महकता गुलदस्ता : ‘मेळौ’
० सुमन शर्मा, सरदारशहर (चूरू) 
साहित्य समाज का दर्पण होता है जिसमें समकालीन संस्कृति के साथ परम्पराओं व मान्यताओं का बिम्ब-प्रतिबिम्ब दिखाई देता है। साहित्य में भी कहानी विधा, जीवन के बहुत निकट रही है। साहित्यकार, संवेदना के उच्चतम स्तर को छूता हुआ समाज के विभिन्न पक्ष कागज पर उतारता है। इसीलिए सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन को देखना है तो साहित्य में देखा जा सकता है। राजेन्द्र शर्मा ‘मुसाफ़िर’ के ‘मेळौ’ संग्रह की कहानियों में समकालीन समाज के अनेक चित्र हुबहू दिखाई देते हैं। बहुत सी कहानियां हमें निजी जीवन में घटित हुई प्रतीत होती है। कहानियों में कथ्य व शिल्प का सुन्दर संयोजन पाठक को कहानी से बांधे रखता है। संग्रह की ग्यारह कहानियों में लेखक ने आर्थिक स्तर पर निम्न और मध्यमवर्गीय समाज का विश्लेषण करते हुए मानसिक द्वन्द्व, उपभोक्तावादी संस्कृति, बेरोजगारी, राजनीतिक पराभव आदि को केन्द्र में रख कर सजीव सृजन किया है।
    रात की तन्हाई में अनजाने स्त्री-पुरुष के बीच उठने वाली शंकाओं, द्वन्द्व, सामाजिक धारणाएं, आदर्शों की रक्षा का दायित्व.....आदि तत्वों के साथ गुंथी कहानी है- ओळमो। इस कहानी में लेखक खुद के संस्कारों को जीता हुआ नारी अस्मिता को सहेजने की कोशिश करता नज़र आता है। लेखक बाहरी दुनिया में जितना शांति से जीता है उससे कहीं ज्यादा भीतर आक्रोशित और अशांत भी है तभी तो ‘दीवळ’ कहानी में हीरालाल के चरित्र के जरिये सपने के माध्यम से अपनी बेबसी प्रकट करवाता है। परन्तु चुप तो नहीं रहता...। पुरुष वर्चस्व को तोड़ने वाली आधुनिक नारी का सूक्ष्म चित्रण इन दोनों कहानियों में मिलता है। इनमे स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व और निजी अधिकारों पर विमर्श के इस युग में नारी को पुरुष की सत्ता का डर भी सताता जाहिर होता है।
    मध्यम वर्ग के लोगों की लाचारी ओर पुलिस की कार्यप्रणाली का व्यंग्यात्मक चित्रण ‘एफ.आई.आर.’ कहानी में है। कहानी में कटु यथार्थ का चित्रण साफगोई से किया गया है। ईमानदार और बिना सिफारिशी व्यक्ति थाने के चक्कर लगाने की बजाय अपना नुकसान उठाना स्वीकार कर लेता है। आरम्भ से अंत तक कहानी केवल पात्रों के संवाद में चलती है, फिर भी पढते समय पाठक के सामने देष, काल, वातावरण और पात्र सजीव हो उठते हैं। ‘रुजगार‘ कहानी में पेसेंजर ट्रेन का इतना वास्तविक चित्रण हुआ है कि पाठक स्वयं रेलयात्रा में शामिल हो जाता है।
‘ढळता सांस’ कहानी बुढापे की पीड़ा और बुजुर्गों के अकेलेपन के लिए जिम्मेदार समाज पर करारी चोट है। किस प्रकार स्वार्थी-सन्तान अपने सपनों की उड़ान में मां-बाप को अकेला छोड़कर जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेती है, इसको महसूस करना है तो पाठकों को यह कहानी जरूर पढनी चाहिए। हमारे समाज में कितने ही ग्रोवर और सैनी जी हैं जो गांव छोड़कर शहरों में बसने को आतुर हैं। उनके लिए ‘इन्हेलर’ कहानी उपचारात्मक जवाब भी है।
मेले में जाने के लिए बच्चों में उत्साह और उल्लास होता है। उनका अपना एक अलग मायावी संसार होता है, मौजमस्ती के सपने होते हैं। जब सपनों पर कुठाराघात होता है तो किशोर मन की भी तल्ख प्रतिक्रिया होती है। मानो उनका विद्रोह समूची दिखावटी दुनिया के खिलाफ है। ‘मेळौ’ कहानी में आर्थिक विपन्नता से उपजे आक्रोश का प्रदर्शन एकबारगी चिंता में डालता है कि किशोर मन में जो आक्रोश और घृणा का बीजारोपण होता है वह आगे जाकर न जाने कौनसा रूप धारण करेगा?
सभी कहानियां लेखन की गहराई और संवेदनशीलता को इंगित करती हैं। लेखक कहीं आदर्शवादी नज़र आता तो कहीं अति यथार्थवादी। पात्रों का चरित्र चित्रण, भाषा, वातावरण सजीव हैं जिससे सारी घटनाएं सामने घटती प्रतीत होती हैं। पुस्तक ‘मेळो’ एक सुन्दर गुलदस्ता है जिसमें ग्यारह रंगों के फूल अपनी अलग-अलग महक बिखेरते हैं।
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उफनते शब्द-दरिया से पार उतारती कहानियां
० सी.एल. सांखला, कोटा
कविता कठोर पाषाण-खण्डों से बूंद-बूंद रिसती अमृतमयी निर्मल-निर्झरी है तो कहानी पिघलते हिमखण्डों से प्रवाहित प्रबल वेगमयी नदी, जो इंसानी बाग-बगीचों व खेतों को निरन्तर सिंचित करती ही रहती है। कहानी हो या कविता कोई भी रचना वस्तु-विचार एवं संवेदना की त्रिवेणी धाराओं में नहाकर ही अपना निश्चित आकार ले पाती है। कहानी के लिए तो यह त्रिवेणी-स्नान बेहद ज़रूरी है ही। तभी यथार्थ बोध के साथ सौंदर्यबोध कराने वाली कथा-सर्जना संभव है।
राजस्थानी कथाकारों में श्री राजेन्द्र शर्मा ‘मुसाफ़िर’ का नाम भले ही अभी ख्याति प्राप्त कथाकारों में न गिना जाता हो, परन्तु उनके राजस्थानी कथा-संग्रह ‘मेळौ’ से गुजरते हुए पाठक-मन को यह भरोसा तो हो ही जाता है कि कलम सधी हुई है, यह भीड़ में अथवा बियावान में भटकती नहीं! पाठक-मन को सहज ही पकड़कर उससे जुड़ने व संवाद साधने की सामर्थ्य रखती है। लोकभाषा की स्वाभाविक सम्मोहकता इन कहानियों में सहज ही झिलमिलाती सी दिखाई देती है।
स्त्री-पुरुष के निजी व सामाजिक सम्बन्धों की मनोगत सूक्ष्म पड़ताल करती एक खूबसूरत कहानी ‘ओळमो’ है। नायिका-प्रधान इस कहानी में पारस्परिक सामाजिक दायरों में पली-पोसी एक पढी-लिखी नौकरी-पेशा लड़की सरकारी कार्य से दूसरे शहर जाती है रात्रि को अपने किसी परिचित के घर ठहरती है। किन्तु उस दिन घर में न कोई स्त्री और न कोई बड़े-बूढे थे। था केवल अकेला युवा कमल! रात को एक ही घर में दोनों अलग-अलग जगह विश्राम करते हैं। नायिका के मनोमस्तिष्क में रात भर विचारों का द्वन्द्व चलता है। दोनों ओर परिस्थितिवश, निजी स्वतंत्रता की आकांक्षा के बावजूद मर्यादा को सलामत रखते हैं। सुबह विदा होते समय नायिका का उलाहना ही कहानी का मर्म व चरमोत्कर्ष बन जाता है।
स्त्री-स्वभाव से जुड़ी एक और कहानी है ‘दीवळ’। यह कहानी आमतौर पर लिखी जाने वाली नारी पक्षधरता से कुछ भिन्न है। एक तरफ कानून स्त्री के पक्ष में खड़े हैं, दूसरी तरफ कुछ ऐसी ही स्त्रियां हैं जो इन कानूनों का दुरुपयोग करते हुए अपने दोषों को ढंक लेती हैं तथा पुरुष को दोषारोपित कर देती हैं। हालांकि यह कहानी नारी-विमर्श के विरूद्ध जाती है, बदलते हुए वक्त में स्त्री के बदलते चरित्र की बानगी प्रस्तुत करती है।
सामाजिक व आर्थिक विषमता को केन्द्र में रखकर बालपात्रों के चरित्र रचकर कहानीकार राजेन्द्र शर्मा ‘मेळौ’ कहानी सृजित करते हैं। सामाजिक व आर्थिक विषमता पर चोट करना इस कहानी का मुख्य उद्देश्य है। वक्त की विडम्बनाओं, छल-छद्म व रौब-धौंस को बड़ी सहजता से पाठकों के समक्ष रखती कहानियां हैं- ‘रुज़ग़ार’, धरम री जड़’ एफ.आई.आर. आदि। ‘लाखां में एक’ कहानी आज के युवाओं में बिना बुद्धिलब्धि की परवाह किये सबके सब इंजीनियर बनने की होड़ में लगे होने की भेड़चाल को बखूब दर्शाती है। ‘इन्हेलर’ व ‘ढळता सांस’ कहानियां बुजुर्गों की जीवन-व्यथा को दर्शाती हैं। अच्छी से अच्छी ऊंची शिक्षा अपनी संतानों को दिलाने के बावजूद वृद्धावस्था में माता-पिता को उनकी सुशिक्षित संतानों के हाथों प्रताड़ित और उपेक्षित होना पड़ता है। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या वह अच्छी शिक्षा थी जो उन्होंने अपने बच्चों को दिलाई थी? 

संग्रह की अंतिम कहानी ‘हियै चानणौ’ स्कूल-स्टाफ के लंच-परिदृश्य को कथ्य का आधार बनाकर लिखी गयी है। हाई-फाई सोसायटी व ग्रामीण परिवेश के लोक-संस्कारों को लेखक ने एक साथ चित्रित करने का प्रयास किया है। कहानी में स्त्री-पुरुष के बर्ताव को भी खूबसूरती से दर्शाया गया है। ‘मेळौ’ पुस्तक में मानव-मन की सुरूचिपूर्ण व मूल्यवान कहानियां हैं। इनमें कहीं भी आदर्शवाद; यथार्थवाद पर हावी नहीं हुआ है। वस्तु, विचार व संवेदनाओं का सधा हुआ समन्वय सहज देखा जा सकता है।
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नई भावभूमि की जानदार कहानियां
० नवनीत पाण्डे, बीकानेर
युवा कहानीकार राजेंद्र शर्मा 'मुसाफिर' का राजस्थानी कहानी संग्रह उनकी कहानी 'ओळमो' के लिए लंबे समय तक विशेष रूप से स्मरण में रहेगा। क्या गज़ब कहानी है और जिस खूबसूरती से कहानीकार ने इसे अंजाम तक पहुँचाया है, वह देखते ही बनता है। स्त्रियों की दशा और उसे लेकर पुरुष मानसिकता को कहानी बहुत गहरे संदर्भों में जाकर न केवल छूती है वरन वह आदिम पुरुष और स्त्री के संबंधों का गणित भी सांकेतिक अर्थों में यहां प्रस्तुत करता है। देह से परे एक संगीत इस कहानी में अदृश्य कहीं बजता रहता है। यह देह राग से इतर एक ऐसी पूर्णाहूति है जिस तक सामान्य कहानीकार का पहुंचना असंभव है। प्रेम-राग और संस्कारों के बीच एक नई भावभूमि की तलाश है यह कहानी।
अन्य कहानियों में रुजगार, इन्हेलर, लाखां को भी रेखांकित किया जा सकता है। हमें कोई कहानी अच्छी लगती है और कोई सामन्य। कुछ कहानियां हमें जमती भी नहीं, इसका कारण अगर हम तलाश करें तो एक अच्छी अपनी नई भाव भूमि लिए हुए आती हैं, वह न केवल संबंधों परिभाषित करती है वरन हमें एक दृष्टि भी देती है। वह हमारे मन के कोनों को कहीं छू जाती है और उसका छूना हमें याद रहता है। ‘ओळमो’ कहानी इस संग्रह की महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय कहानी संभवतः इसलिए है कि वह हमारे अंतर्मन को छू लेती है। यह छूना केवल कहानी के किसी एक घटक से संभव नहीं होता। कहानी में किस घटक की कितनी मात्रा होगी यह भी कोई बता नहीं सकता। कहानी लेखन जब भीतर से होता है तो उसके घटक अपने आप व्यवस्थित होते चले जाते हैं। यहां किसी नियम अथवा शास्त्र का कोई जोर नहीं चलता। कहानीकार अपनी बात कह कर मुक्त होता है और एक मुक्कमल कहानी बनती है।
राजेंद्र शर्मा की कहानी-कला में उन्हें आगे ले जाने का काम उनकी भाषा करती है। वे बहुत जानदार भाषा शिल्पी है, जो कहानी की जान को बखूबी पहचान लेते है।शीर्षक कहानी की बात करें जिसमें मेळौ यानी मेला जितना बाहर है उतना ही भीतर है। यहां भीड़ और एकांत के संगीत की जुगलबंदी है।  यह जुगलबंदी मौत के मौके होने के भी कहानी में अपने अर्थ और संकेत हैं। मृत्यु जो कि एक अटल सत्य है उसी के घटित हो चुकने के बाद जो कुछ कहानी में घटित होता हुआ दिखाया जा रहा है वह अनेक सवाल हमारे भीतर जगाता है। हमारी संवेदनाओं को जहां बालमन की गतिविधियां और हलचल छू लेती हैं वहीं बड़ों के द्वारा कहानी में हो रहे क्रियाकलाप भी कहानी के अर्थ को विशद करते हैं। 
‘एफ आई आर’ जैसी संवाद कहानी में कहानीकार का आज के समय और संदर्भों से जुड़ी चुनौतियों की पैरवी प्रभावित करने वाली है। राजेन्द्र शर्मा के यहां उनकी कहानियों में अप्रत्यक्ष रूप से एक कहन छिपा हुआ है। यह हमारे भीतर किसी संदेश की भांति स्वत जन्म लेने वाला है। कहानी में जो कुछ मूल विषय वस्तु का कहन है वह बिना वाचाल हुए कहानीकार जैसे अंतरवस्तु में कहीं ऐसे छोड़ देता है कि कहानी पाठ के दौरान हम उसे पा जाते हैं। यह इस संग्रह और कहानीकार की अतिरिक्त और उल्लेखनीय उपलब्धि है, आशा है इसे भी राजस्थानी कहानी के विकास -अधेयता देख और पहचान सकेंगे।
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  2 टिप्‍पणियां:

  1. आदरजोग डॉ. भाटी साब अर भाई नीरजजी री टीप सूं सिरजण सारू म्हारो होसलो बध्यो है. दोनू सक्रिय अर विद्वान पारखी साहित्यकारां रो हियै तणो आभार.

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    1. भाई राजेन्द्र जी, घणो घणो आभार। एक टिप्प्णी भाई श्री पूर्ण शर्मा पूरण री फेर जोड़ दी है। दस टिप्पणियां एक किताब माथै एकठ करण री योजना है। सैयोग सारू फेर आभार।

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राजस्थानी कहानी का वर्तमान ० डॉ. नीरज दइया

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