शनिवार, 1 अक्तूबर 2016

राजेन्द्र जोशी का राजस्थानी कहानी संग्रह : “अगाड़ी”

अगाड़ी / राजस्थानी कहानी संग्रह / राजेन्द्र जोशी / संस्करण : 2015 / पृष्ठ : 96 / मूल्य : 200/-
प्रकाशक : ऋचा (इण्डिया) पब्लिशर्स, बीकानेर / आवरण : कुंवर रवीन्द्र
राजेन्द्र जोशी
जन्म : 29 जुलाई 1962 बीकानेर (राजस्थान) शिक्षा : एम.ए., बी.एड.
हिन्दी और राजस्थानी भाषा की विविध विधाओं में दो दशक से निरंतर सृजनरत।
राजस्थानी में प्रथम कहानी संग्रह ‘अगाड़ी’ से चर्चित। हिंदी में तीन मौलिक कविता संग्रह- ‘सब के साथ मिल जाएगा’, ‘मौन से बतकही’, ‘एक रात धूप में’ और एक अनुवाद की किताब ‘उतरा है आकाश’ साहित्य अकादेमी से प्रकाशित। बाल साहित्य और साक्षरता के अंतर्गत भी विशेष कार्य-योगदान।
मुक्ति संस्था द्वारा अनेक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक एवं सांस्कृति कार्यक्रमों का आयोजन तथा राजस्थानी भाषा के हिमायती।
सम्प्रति - साक्षरता एवं सतत शिक्षा विभाग में सहायक परियोजना अधिकारी (वरिष्ठ)
संपर्क : तपसी भवन, नत्थूसर बास, बीकानेर- 334004
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पुस्तक के ब्लर्ब का अनुवाद : 
समय के साथ ‘आइटेंडी’ बनाती स्त्रियां
० बलाकी शर्मा, बीकानेर
     ‘अगाड़ी’ की कहानियों से राजेन्द्र जोशी की पहचान स्त्री-मन का सच्चा चित्रण करने वाले कहानीकार के रूप में होगी। इन कहानियों में आज की स्त्री की कई-कई छवियां मिलती है, जिसमें खूबियां-खामियां दर्शाती ये अपनी पहचान-अस्मिता संभालती-संवारती आधुनिक होती दिखाई देती हैं। यहां पुरुष-मन से स्त्री-चरित्रों को देखना-परखना और रचना उल्लेखनीय इसलिए माना जाएगा कि इन में स्त्रियां समय के साथ अपनी निजी और अलग ‘आइटेंटी’ बनाती हुई देखी जा सकती है।
    ‘अनाम रिस्तै’ की सुधा, जो विधवा होते हुए भी सुधीर के साथ बिना विवाह के ‘लिव इन’ के रूप में रहने को गलत नहीं मानती। ‘अबै माफी नीं’ की राधा और उस की मां अफसर की बदसलूकी के सामने खड़े होते हैं, तो ‘रिखपाल’ कहानी की इंदिरा को जब पता चलता हि कि उसका पति देशद्रोही है तब वह उसका चेहरा तक देखना नहीं चाहती। यहां स्त्री पात्रों के अलग-अलग रंग-रूप दिखाई देते हैं। ‘अगाड़ी’ में उम्मेद की मां बिना दहेज के विवाह के लिए अंततः तैयार होती है, तब लगता है कि यहां परंपरा का विकास के बहाने यहां जीवन का ढंग भी निकाला जा सकता है।
    ‘अगाड़ी’ की कहानियों में नए और पुराने की सावधानी के साथ आधुनिक होना देखा जा सकता है। इन स्त्रियों में वर्तमान का सत्य कि ये नया दृष्टिकोण देने वाली नहीं होकर भी परंपरागत सोच के लोभ-लालच में उलझी अगाड़ी या कि बराबर आने में कुछ देर करती हुई भी दिखाई देती हैं। इसी प्रकार की खास खासियतों से राजेन्द्र जोशी का यह रचना-संसार जमीन और अंतस से जुड़ा हुआ लगता है।
     अलग-अलग कथ्यों को लेकर आज के बदलते समय को गहराई से उकेरती ‘अगाड़ी’ की कहानियां पढ़ते हुए लगता है कि एक सशक्त कलम से रची हुई अंतस में रची-बसी उम्दा कहानियां है और पाठक लंबे समय तक इन के प्रभाव से मुक्ति नहीं हो सकेंगे। राजेन्द्र जोशी को बहुत बहुत बधाई।
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नारी मन का ‘नरीमन पाईन्ट’ 
० मोहन आलोक, श्रीगंगानगर
    भाषा जैसे अपने अतीत के कैर-कांटों को बुहार कर वर्तमान की सीढ़ियां चढ़ती हैं, तो आधुनिकता-परंपरा और परंपरा-आधुनिकता जुगलबंदी करती है। अभिव्यक्ति का तल्ख मिजाज साधना के क्षेत्र इंगित कर परंपरा-आधुनिकता और आधुनिकता-परंपारा के नए रिश्तों की पहचान कराती है। भाषा के इसी नए मुहावरे रची-बसी है राजेन्द्र जोशी की कहानियां, कि आधी दुनिया, दुनिया दाखल होते हुए और नारी-मन कलम के ‘नरीमन पाईन्ट’ पर पहुंच कर उन्मुक्त सा महसूस करता है।
    उदाहरण के लिए राजेन्द्र जोशी की ‘अगाड़ी’ संग्रह मे ‘अनाम रिस्तां’ कहानी पाठक को अपने भाषाई मिठास से रू-ब-रू कराती है। इसे कहाणीकार का भाषा और भाव का सहज समन्वय ही कहा जाएगा कि समाज को ‘सेह’ की सूल सरीखी लगने वाला- ‘लिव इन रिलेशनशिप’ की समस्या समाज के सामने सिर ऊंचा कर ‘सरड-सरड’ निकल जाती है, और कोई नाक में सलवट नहीं डालता। ऐसे लेखक ने आपनी अगाड़ी कहानी का अंत भी एक नए और मखमली से मिठास के साथ किया है। कथा-पात्र उम्मेद की मां, जहां दहेज की प्रचंड साख चंडी बन जानी चाहिए थी, वहीं वह आपनी ही विगत पीढी, आपनी सास को ठंडे छींटें देने हेतु तैयार हो जाती है। जोशी की अभिव्यंजना दृष्टि का ही यह कमाल है, दूसरा कोई कहानीकार होता तो दूल्हे की मां और पिता के केस खिंचवाने की नोबत तक कहानी को ले जाता। जोशी जी की लगभग सभी कहानियां नारी मन की खोज-खबर में रत है। यहां युगों से थमी हुई ‘थीमें’ नए रूपों में प्रस्तुत हुई है।
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टकसाळी बीकानेरी बोली का उम्दा प्रयोग 
० डॉ. आईदान सिंह भाटी, जोधपुर
     ‘अगाड़ी’ कहानी-संग्रह की कहानियों में विचारधारा और समाजिक दृष्टिकोण तो बेहतरीन है, जैसे कि स्त्री-चेतना, भोपा-डफरी का विरोध, बुजुर्ग-समस्याएं, जात-पांत, अमीरी-गरीबी, ऊंच-नीच, प्रेम-प्रीत इत्यादि। लेखक की सहानुभूति भी सार्थक-पख लिए हुए है। वर्तमान का दृष्टिकोण भी इन कहानियों में है जैसे कि– ‘लिव इन रिलेशनशिप’। पर यह दृष्टिकोण समाज के लिए बेहतर है या ताज्य, इस पर लेखक ने कोई राय नहीं दी है। ‘समाज की परवाह मत करो’ जैसे बातें जरूर आई है। यह व्यक्तिवादी दृष्टिकोण है।
      मध्यम-वर्गी मनुष्यता की और कस्बाई मानसिकता की इन कहानियों में पाठकों को बांध कर साथ ले जाने की क्षमता है। भाषा के लिहाज से राजेंद्र जोशी ने टकसाली बीकानेरी बोली का उम्दा प्रयोग किया है। जैसे कि ‘धोरी’ शब्द और ‘सौ बरस पूगणौ’ जैसे मुहावरे। एक बात जो मुझे कथा-शिल्प के विषय में अखरी, वह यह कि इन कहानियों में उपन्यास कहीं-कहीं झलकता है। किसी एक केंद्रीय विचार पर यह कहानियां नहीं रची गई है। समय और काल का यह विस्तार इन कहानियों को कमजोर करता है। पर यह कहानीकार का प्रथम कहानी संग्रह है इसलिए ऐसी बातें होती है।  राजेंद्र जोशी की हूंस और हौसले को बधाई देता हूं।
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‘अगाड़ी’ की कहानियां भी हैं अगाड़ी 
० मनोहर सिंह राठौड़, जोधपुर
    कवि-कहानीकार राजेन्द्र जोशी एक संवेदनशील साहित्यकार हैं। वे अपनी महती सामाजिक सेवाएं प्रदान करते हुए समाज के अनेक अभावग्रस्त, शोषित-पीड़ित लोगों से रू-ब-रू हुए हैं। नारी का शोषण हर वर्ग, प्रत्येक स्थिति और हरेक समय में होता रहा हैं। जोशी ने इस विषय को केन्द्र में रख कर अपनी कृति ‘अगाड़ी’ में नारी की व्यथाओं की कुछ कथाएं प्रस्तुत की है।
    ‘अगाड़ी’ में कुल 11 कहानियां 96 पृष्ठों में समायी हुई हैं। एक-एक पृष्ठ में नारी मन की परत-दर-परत उस के भीतर के दर्द को विषय में प्रस्तुत किया गया है।
कहानीकार का काम समाज की समस्याएं प्रस्तुत करना और उनका समाधान सुझाना नहीं है। लेकिन कहानी में अपने समय की प्रस्तुति आ ही जाती है। इस संग्रह की सभी कहानियों का ताना-बाना आधी दुनिया को लेकर या उनकी समस्याओं को उजागर करते हुए बुना है। नौकरानियों के साथ उनके मालिकों की गिद्ध-दृष्टि के अत्याचार उजागर करते हुए उस नारी को सबला के रूप में प्रस्तुत किया गया है। नारी कमजोर नही है,सशक्त है।
    दहेज के लिए अनावश्यक रूप से टपकती लार को शांत करने के लिए युवा वर्ग को आगे आने की बात कह कर और लड़के के पिता द्वारा इस झूठी शान के लिए चली आ रही कुरीति का समाधान, संग्रह की शीर्षक कहानी अगाड़ी में ढूढ़ा गया है। इस कुरीति के चलते बेमेल विवाह या गृहस्थी में तनाव बिखराव होते हैं।
    मर्द-औरत के आपसी रिश्तों, प्रेम के बंधन में जात-पांत, धन-दौलत समाजिक स्थिति से उबरने और उच्च भाव की ओर अग्रसर होने के संकेत इनकी कहानियों में मिलते हैं। आज हमारे देश में भी वृद्धों को साथ रखने की एक प्रमुख समस्या के रूप में तथाकथित आधुनिक जीवन शैली में गहराई से समझा जाने लगा हैं। जो पति आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त हो जाता है उसें राजस्थानी नारी नफरत के साथ तुरंत त्याग देती हैं। अपना सारा जीवन कष्टों में बिताने वाली माँ, जिसने अपनी संतान को पालपोष कर बड़ा किया, वही संतान उस से दूर छिटक जाती है। इस प्रकार के अनेक द्वन्द्व इन कहानियों में उभर कर सामने आए हैं।
    कविहृदय जोशी ने नारी मन की सरसता, अपनत्व, त्याग, सेवाभाव, समर्पण को मार्मिकता से प्रस्तुत किया है, साथ में उस नारी को कठोर परिस्थितियों से जूझने, मजबूती से समस्या का मुकाबला करने और अपना हक प्राप्त करने में सक्षम बतलाया हैं। प्रतीकों, बिंबों से बात को स्पष्ट किया हैं। आधुनिक जीवन की समस्याओं तथा पारंपरिक राजस्थानी जीवन की समस्याओं को सुलझते हुए कहानियों में देख सकते हैं। आधुनिक सोच के साथ-साथ राजस्थानी जीवन-मूल्यों को सजगता से जीने वाले कहानीकार की लेखनी से नारी मन को टटोलती कहानियों का यह संग्रह निश्चित रूप से पाठकों को झकझोरने के साथ ही सोचने के लिए बाध्य करेगा।
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नारी-मन की गहरी पड़ताल : अगाड़ी 
० माधव नागदा, राजसमंद
   ‘अगाड़ी’ कवि-कथाकार राजेन्द्र जोशी का प्रथम कहानी संग्रह है। आज राजस्थानी कहानी का परिदृश्य बेहद उम्दा है। नए और युवा कहानीकारों ने कथ्य और भाषा में ठेठ मुहावरा रचते हुए उल्लेखनीय कहानियां लिखी हैं। जिस प्रकार हिन्दी में विचारधारा के सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर मनुष्य जीवन की कहानियां लिखने वाली युवा और मझली पीढ़ी सक्रिय है कमोबेश राजस्थानी में भी यही बात देखी जा सकती है।
   राजेन्द्र जोशी ‘अगाड़ी’ संग्रह की लगभग सभी कहानियों में नारी-मन की थाह लेते हैं। राजेन्द्र प्रगतीशील रचनाकार है। वे चाहते हैं कि नारी को समाज में मान-सम्मान मिले, वह अपने जीवन के फैसले स्वयं करें और उन फैसलों का घर-परिवार आदर करे। ‘अनाम रिस्तो’ की विधवा सुधा अपने स्वर्गीय पति विजयसिंह के प्रगाढ़ दोस्त सुधीर से प्रेम करने लगती है। बेटी शिखा भी सुधीरजी से खूब अपनत्व रखती है। सुधीर सुधा से विवाह कर इस रिस्ते को सामाजिक मान्यता देना चाहता है। परंतु सुधा को यह डर है कि शिखा बेटी सुधीर को अंकल के रूप में तो स्वीकार कर लिया है किंतु पापा की जगह कभी स्वीकार नहीं करेगी। सुधा तय करती है कि बिना शादी किए ही साथ रहेगी। सुधीर सुधा की मंशा का आदर करते हुए इस निर्णय पर अपनी मोहर लगा देता है। राजस्थानी कहानी के परिदृश्य में सुधा का ‘लिव इन रिलेशन’ में रहने का फैसला कोई साधारण फैसला नहीं है। जिस समाज को विधवा का हंसना-बोलना मंजूर नहीं है वहा प्रेम करना और किसी पराये मर्द के साथ रहना खतरे से खाली नहीं है। सुधा अपने प्रेम के लिए बेटी की भावनाओं का ध्यान रखते हुए यह खतरा मोल लेती है। इस कारण यह कहानी अपने समय से बहुत अगाड़ी है।
   ‘अबै माफी नी’ में राधा की माँ एक बार ठोकर खा कर संभल जाती है। स्वर्गीय पति मोवन का अफसर उसे अपनी कुटिलता की शिकार बना देता है। पर जब वही अफसर बेटी राधा को भी फसाने की चाल चलता है तो वहीं दुर्गा बन जाती है। वह न केवल अफसर के सामने जूझारू होकर आती है वरन थाने में रपट लिखवाने का फैसला भी लेती है।
   रूढ़िभंजकता का एक श्रेष्ठ उदाहरण ‘अगाड़ी’ कहानी में मिलता है। हम जानते हैं कि दहेज प्रथा कोढ़ में खाज जैसे है। विडम्बना यह है कि जिस प्रथा को औरतों को सर्वाधिक झेलना पड़ता है वही औरतें इस कुप्रथा का सर्वाधिक समर्थन करती हैं। सुमेर के बेटे उम्मेद का विवाह तय हुआ। उम्मेद की माँ दहेज के सपने देखने लगी। इधर दोनों पिता-पुत्र ने तय किया कि वे दहेज के नाम पर एक पैसा नहीं लेंगे। जब यह बात सुमेर की पत्नी के संज्ञान में आती है तो वह इसका विरोध करती है। उसकी मान्यता है कि दहेज तो घर की प्रतिष्ठा का प्रश्न है। पर अपने पति-पुत्र के समक्ष उसकी एक नहीं चलती। वे समझाते हैं कि दहेज एक कुरीति है, गलत प्रथा है। अंततः वह भी दहेज नहीं लेने को सहमत हो जाती है और इसीलिए अपनी सास को मनाने का बीड़ा उठाती है। इन कहानियों में नारी मन की सहजता एवं प्रमाणिकता के साथ गहरी पड़ताल हुई है। राजेन्द्र आस पास के ऐसे पात्र चुनते हैं कि जिन पर हमारी नजर तो रोज जाती है किंतु उनके अंतस में भीतर झांकने की हम हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं। इन कहानियों में वह हिम्मत और दृष्टि सहज भाषा में संप्रेषणीयता के साथ नजर आती है।
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युग-संदर्भों को स्वीकारने की पक्षधरता 
० डॉ. नीरज दइया, बीकानेर
    राजस्थानी कहानी विकास-यात्रा में बीकानेर के कहानीकारों का विशेष स्थान रहा है। मुरलीधर व्यास ‘राजस्थानी’ से राजेन्द्र जोशी तक की यात्रा में अनेक पड़ाव देखे जा सकते हैं। राजस्थानी कहाणी को गरिमा देने वाले कहाणीकारों में बीकानेर के श्रीलाल नथमल जोशी, यादवेंद्र शर्मा ‘चन्द्र’, अन्नाराम ‘सुदामा’, मूलचंद ‘प्राणेश’, सांवर दइया, भंवर लाल ‘भ्रमर’, बुलाकी शर्मा, श्रीलाल जोशी, मदन सैनी, मधु आचार्य ‘आशावादी’, नवनीत पाण्डे आदि के नाम उल्लेखनीय है। इस परंपरा में राजेन्द्र जोशी आपने प्रथम कहानी संग्रह ‘अगाड़ी’ द्वारा इस विकास-यात्रा में शामिल हुए हैं।
        संग्रह का नामकरण पहली कहानी ‘अगाड़ी’ पर हुआ है, कहानी की प्रथम पंक्ति है- “अबै कित्ता’क दिनां री बात है मा’जी देवउठणी इग्यारस सूं मौरत तो निकळणो ई है।” पंक्ति अभिप्राय लिए है कि आधुनिक कहे जाने वाले समाज में संस्कारों और संस्कृति में लिप्त सामाजिक-व्यवस्था गतिशीलता के उपरांत भी काफी मुद्दों पर ठहरी हुई है। समग्र कहानी की बात करें तो यह दहेज पर लिखी सामान्य-सी कहानी प्रतीत होगी, किंतु कहाणीकार राजेन्द्र जोशी की कहानी-कला की विशेषता है कि वे नए होते हुए भी पाठ में सहज संवादों और मनस्थितियों को प्रस्तुत करते हुए रोचकता के साथ प्रभाव और अभिप्राय गढ़ते हैं। दहेज नहीं लेने का स्वर यहां बेहद शांत ढंग से पाठ में गूंथा गया है, जो किसी उपदेश की भांति नहीं वरन अव्यक्त के रूप में उभरता है। च्यार पात्रों में सिमटी इस कहानी में एक अतिरिक्त पात्र कपिल की मां को मान सकते हैं। किंतु मुख्य पात्र हैं- पिता-पुत्र और सास-बहू। सुमेर अपने पुत्र के विवाह में बिना दहेज का रहस्य पुत्र के अतिरिक्त सभी से गोपनीय रखता है। असल में चार पात्रों द्वारा यहां तीन पीढियों का अंतर्द्वद्व उजागर हुआ है वहीं ये पात्र अपनी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। नई पीढ़ी के नवीन सोच में बाधक पुरानी पीढ़ी से मध्यस्ता के लिए यहां बीच की पीढ़ी को दर्शाना कहानीकार का सकारात्मक सोच है। कहानियों की अभिव्यंजना में उनके कहन का स्वर मिलता है जो कहानी में कहने-सुनाने का स्वर है। यहां राजस्थानी लोककथाओं का सहज स्मरण होता है।
    राजेन्द्र जोशी की अबै माफी नीं, ममता आदि कुछ कहानियां कतिपय संयोग के स्वरों को साधती है। वहीं इन कहानियों में स्त्री-संधर्ष की अनेक छवियों को सूक्ष्मता से उकेरा गया है। स्त्री अपनी अस्मिता संभालती-संवारती यहां नए सरोकारों के साथ उपस्थित हुई है। कहानी ‘अनाम रिस्तो’ की सुधा के लिव इन रिलेशन से राजस्थानी कहानी में नवीन सूत्रपात होता है, तो ‘ममता’ कहानी अपनी जड़ों और जमीन की तलाश में विवाह-संबंधों में नए सोच का चित्रण है। चर्चित कहानीकार बुलाकी शर्मा के शब्दों में- “अगाड़ी की कहानियों से राजेन्द्र जोशी की पहचान स्त्री-मन के सच्चे-चितेरे के रूप में होगी।”
    समग्र रूप से कहें तो संग्रह की कहानियों का केंद्रीय स्वर अगाड़ी (अग्रिम) होना और अगाड़ी रहना इस रूप में माना जा सकता है कि कहानियों के पात्र प्राचीनता को छोड़कर युग-संदर्भों के साथ नवनीताओं को स्वीकारने के पक्षधर बनकर आधुनिकता को सहजता से अंगीकार करते अपनी विशिष्टता के रूप में रेखांकित किए गए हैं।
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महिलाओं को सर्वोच्च रखने की सोच का परिचायक ‘अगाड़ी’ 
० नदीम अहमद ‘नदीम’, बीकानेर
    कवि-कथाकार के रूप में श्री राजेन्द्र जोशी हिन्दी और राजस्थानी भाषाओं में समान रूप से सृजनरत है। समीक्ष्य कृति ‘अगाड़ी’ राजस्थानी में रचित राजेन्द्र जोशी की कहानियों का संग्रह है।
    ‘अगाड़ी’ इस रूप में भी अति महत्वपूर्ण है कि तमाम कथाओं में नारी पात्र को केन्द्रीय भूमिका के इर्द-गिर्द रखा है। स्त्रीमन को मनोवैज्ञानिक स्तर पर समझना और थाह लेना बेहद दुरूह काम है। इसे राजेन्द्र जोशी ने रचनात्मक ज़िम्मेदारी के रूप में ग्रहण किया है।
    ‘अबै माफी नी’ कहानी में औरत के दो रूपों का चित्रण मिलता है। एक रूप में जहां भोली भाली औरत स्वयं के साथ हुए शोषण को चुपचाप सहन कर जाती है लेकिन जब स्वयं की बेटी के साथ शोषण की कहानी दोहराने की परिस्थिति बनती है तो वही हिरनी सी औरत शेरनी के रूप में नज़र आती है और व्यभिचारी अफसर औरत के बग़ावती तेवर के समक्ष मिमियाता दिखता है। ये परिदृश्य पाठक को सुकून देता है।
      राजेन्द्र जोशी ने अपनी कहानियों के पात्र अवाम में से ही तलाशें है, अतः भाषायी सरलता-सहजता कहानियों की विशेषता है। इन कहानियों की नायिकाओं को समर्थ, आत्मनिर्णय की अधिकारी तथा पूर्ण आत्मविश्वास के साथ अपने अधिकारों के लिए दृढ़ता के साथ खड़ी होने वाली दर्शाकर कहानीकार ने जहां वास्तविक रूप से महिला सशक्तिकरण को कहानियों में जीवंत किया है, वहीं महिलाओं के जुनून और ज़िद को भी अमली जामा पहनाते हुए सार्थक संदेश दिया है। कहानियों के संदर्भ में इसलिए भी मुनासिब लगता है कहानियों का सर्वाधिक उज्ज्वल-पक्ष इसकी सकारात्मकता है।
    ‘रिखपाल’ की कथा-नायिका को जब मालूम चलता है कि उसका पति देशद्रोही है तो वह अपने सामाजिक परिवेश पर वतन को तरज़ीह देती है। वह देशद्रोही को देखना तक गवारा नहीं करती। कथाकार ने यहां एक साथ दो कार्य किए हैं। कथा-पात्रों के जज़्बातों को गहरी अर्थवता के साथ प्रस्तुत किया गया है।
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सामाजिक धरातल की सशक्त कहानियां
० मदन गोपाल लढ़ा, महाजन (बीकानेर)

        राजस्थानी लोक-साहित्य में बात की समृद्ध परम्परा रही है, जिसमें बात कहने वाले के साथ सुनकर हुंकारा भरने वालों की भी सक्रिय भूमिका रहती थी। निश्चय ही आज की कहानी रूप-रंग में नितांत अलग व निजीपन लिए है तथा उस पर पाश्चात्य साहित्य की ’शोर्ट स्टोर” का प्रभाव रहा है। इसके बावजूद यह प्रामाणिक तथ्य है कि राजस्थानी कहानी का बिरवा बात की उर्वर भूमि पर फला-फूला है। आज भी कहानीकार अपनी परम्परा से जुड़कर प्राण-ऊर्जा हासिल करते हैं।
        ’अगाड़ी’ राजेन्द्र जोशी का पहला कहानी संग्रह है जिसमें कथारस की सघन मौजूदगी बातपोशी के उपादानों की याद दिलाती नजर आती है। मरुभौम खासकर बीकानेर अंचल का परिवेश इन कहानियों में बोलता-बतियाता है। कहना न होगा, परिवेश का विश्वसनीय अंकन इन कहानियों को ऐसी धार सौंपता है जिससे पहले पाठ में ये पाठक के अनुभव जगत का हिस्सा बन जाती है। विषय वस्तु की बात करें तो सामाजिक धरातल के विविध चित्र व हमारे आस-पास मौजूद चरित्र कहानीकार की कलम से जीवंत हो उठे हैं। यही वजह है कि ये कहानियां न केवल पठनीय बन पड़ी हैं बल्कि सशक्त कथ्य के कारण छाप भी छोड़ती हैं।
       शीर्षक कहानी ‘अगाड़ी’ बदलाव की बयार को सतर्कता से अंवेरती है। उम्मेद की माँ के मन में अपने बेटे की शादी में खूब सारा दहेज पाने की आकांक्षा है मगर पति व पुत्र की दृढ़ इच्छा शक्ति के सामने उसकी चल नहीं पाती। वह सदियों से चली आ रही रूढ़िवादी सोच के दायरे से बाहर निकलकर समय के साथ कदमताल के लिए तैयार हो जाती है। परम्परागत राजस्थानी समाज में यह बदलाव मामूली बात नहीं है जिसकी पहचान व अंकन कहानीकार की बड़ी सफलता मानी जा सकती है।
       ‘अबै माफी नीं’ कहानी बिना किसी नारे के स्त्री विमर्श को प्रबलता से मुखरित करती है। इसका कथ्य तो नया नहीं है मगर प्रस्तुति प्रभावी है। कहानी में राधा की माँ अपने साथ वर्षों पहले हुए अनाचार को याद करके अपनी बेटी को वैसी ही जोर-जबर्दस्ती से बचाने के लिए उठ खड़ी होती है। औरत जात के जगने का भाव राधा की माँ के इस कथन में स्पष्ट रूप् से महसूस किया जा सकता है। ‘इसै राखसां री ठौड़ जेळ ई है। जिको लुगाई साथे दगो करै, उणरी आबरू लूटणी चावै, बीं नैं कदेई माफ कोनी करूं।’
       ‘ममता’ कहानी में कई उतार-चढ़ाव हैं। अमेरिका में मोटी पगार पाने वाला एक अफसर-पुत्र देश में लड़की तलाषने आता है तो अपने परिचित परिवार में घरेलू काम करने वाली ममता को उनकी बेटी मानते हुए उसकी पाक-कला पर मोहित हो जाता है व सात फेरों के बंधन में बंधने को तैयार हो जाता है। इस बीच उसे पता चलता है कि ममता उनकी बेटी नहीं, काम करने पाली बाई है तो झटके से खड़ा हो जाता है। यह कहानी भारतीय समाज में विदेशी मुल्कों के प्रति ग्लैमर के भाव, महिलाओं की पाक-कला में निपुणता को अनिवार्य मानने की मनोवृत्ति और मेहनतकश तबके के कामों के प्रति अभिजात्य वर्ग में निरादर के भाव की परतें खेलती हैं। कहानी की बुणगट में नाटकीयता हावी होने से सहजता बाधित हो गई है मगर धारदार संवाद सम्प्रेषण को कमजोर नहीं पड़ने देता। किताब में शामिल अनाम रिस्तो, पिछतावो, अेकली आदि समय व समाज की जाने-अनजाने सच को सामने लाने वाली कहानियां हैं जो आम पाठक को अंगुली थामकर अपने साथ लेकर चल पड़ती है। उम्मीद की जा सकती है कि जोशी जी की आने वाली कहानियां विषयगत विविधता से राजस्थानी कहानी का फलक चौड़ा करने में समर्थ होंगी।
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कामना और संभावनाओं की कहानियां
० प्रेमचंद गांधी, जयपुर
       समाज के यथार्थ को देखकर प्रत्येलक लेखक के यहां भविष्यर के समाज की एक संकल्प्ना समय के साथ निर्मित होती होती रहती है, जो रचनाओं में व्यंक्तप होती हैं। राजेंद्र जोशी के पहले राजस्था नी कहानी संग्रह ‘अगाड़ी’ की कहानियां असल में इसी लेखकीय संकल्पंना की कहानियां हैं। इन कहानियों को पढ़ते हुए लगता है कि क्यां पारंपरिक किस्मै के राजस्था नी समाज में यह संभव है, लेकिन तुरंत ही विचार करने पर लगता है कि यदि ऐसा हो जाए तो कितना अच्छा या कि बुरा हो सकता है। अच्छेह की कामना के साथ बुरे के ख़तरे को ताड़ लेना लेखक की यथार्थवादी दृष्टि का एक ऐसा पक्ष है, जो सजग-सचेत रचनाकार को भविष्यक की रचनाओं के लिए और समर्थ बनाता है। संग्रह में कुल ग्यातरह कहानियां हैं, जिनमें राजस्थासन के शहरी-कस्बांई और देहाती मध्ययवर्गीय परिवारों के जिंदा किरदार अपनी तमाम नियतियों और हालात से निरंतर संघर्ष करते हैं।
पारंपरिक राजस्थातनी परिवारों की मध्येवर्गीय त्रासदियां यूं तो पूरे भारतीय समाज को ही प्रतिबिंबित करती हैं, किंतु इन कहानियों में वे इस अर्थ में अलग हैं कि इनमें अभी भी उस साहस की कमी है, जो पारंपरिक मूल्योंं और आस्थांओं से निरंतर संघर्ष के बाद पैदा होता है। जैसे संग्रह की शीर्षक ‘अगाड़ी’ कहानी को ही लिया जाए तो अभी भी लगता है कि दहेज की समस्याअ से पारंपरिक राजस्थाानी महिला का चित्तद पूरी तरह मुक्ते नहीं हुआ है। लेकिन कहानी में लेखक ने इस मानसिकता को बदलने का जो प्रयास किया है, वह नए जमाने की आमद की घोषणा है, फिर भले ही उसके लिए बहुत ही साधारण किस्मह की परिस्थिति को लेखक ने पैदा किया हो। इन कहानियों में अधिकांश कहानियां स्त्री को केंद्र में रखती हैं, इसलिए यहां महिलाओं की कामनाओं, भावनाओं और आगे बढ़ने के उनके साहसिक प्रयासों को इनमें सहज ही देखा जा सकता है। लेखक ने किंचित साहस के साथ कुछ ऐसे स्त्रीह चरित्रों को रचा है जो पारंपरिक राजस्थांनी समाज में कम देखे जाते हैं, जिसका प्रमाण हमें ‘अबै माफी ना’ की मां और ‘अनाम रिस्तों ’ की सुधा में मिलता है, जहां मां अपने और अपनी बेटी के यौन शोषण के विरुद्ध पुलिस थाने जाने का साहस दिखाती है, और दूसरी ओर विधवा सुधा लिव इन में रहने का मार्ग चुनती है। इसी तरह ‘पिछतावो’ की सास है, जो बहू की पुत्र कामना को ढोंगी बाबाओं से बचाने में रहती है, जबकि बहू उसी मार्ग से अपनी कोख भरने की कामना में ठगी जाती है।
       इन कहानियों में यथार्थ के विभिन्नम धरातल हैं, जो आजादी के इतने बरस गुजर जाने के बाद भी हमारे सामाजिक जीवन की क्रूर सचाइयों को बयान करते हैं। इनमें विशेष रूप से हमारे परिवारों में बुजुर्गों की जो हालत है, वह अत्यंंत चिंताजनक है। संग्रह में ऐसी दो कहानियां हैं, जिनमें बुजुर्गों की त्रासद स्थितियों का वर्णन है। ‘न्या रो घर’ की बहू और बेटा मिलकर किस तरह अपने ससुर-पिता को वृद्धाश्रम पहुंचा देते हैं, यह हमारे समय की भयावह त्रासदी है। इसी प्रकार ‘अेकली’ की नायिका अपने बलबूते बेटे को डॉक्ट र बना देती है, लेकिन विवाह के पश्चाात बेटा-बहू उसे अपने साथ नहीं रख सकते। ‘अणसैंधो मारग’ कुछ अलग तरह की कहानी है जो आज के समय में संभव नहीं लगती, क्योंाकि राजस्थालन में बरसों से गांव या बिरादरी से बहिष्कृलत करने की परंपरा समाप्तो हो चुकी है, हालांकि एक समय में यह खूब प्रचलन में रही है। फिर भी अगर यह कहानी में किसी वास्तेविक घटना से प्रेरित होकर आई है तो यह बेहद अफसोस की बात है कि आज भी सामाजिक बहिष्कारर की कुप्रथा कहीं-कहीं चलन में है।
        समग्रता में देखें तो इन कहानियों में आदर्श, परंपराएं और नए जमाने का कटु यथार्थ है जो पात्रों के पारस्प्रिक संवाद और जीवन मूल्योंस को लेकर नई सोच को व्यतक्तत करता है। इसी तरह के विचारों को लेकर ‘बडेरां री सीख’ कहानी है, जिसमें तीन पीढि़यों का मानसिक द्वंद्व और संघर्ष है, जिसमें एक तरफ तो जीवन में आगे बढ़ने को लेकर नई पीढ़ी की स्व प्निल इच्छांएं हैं, उनके माता-पिता की कामनाएं हैं और एक तरफ बुजुर्गों की पीढ़ी है जो गांव से पलायन कर शहरी दौड़ में शामिल नहीं होना चाहती, बल्कि उनके यहां विस्था पन और पलायन के बाद असफल हुए लोगों के किस्सेउ हैं और रास्ताथ भी आगे बढ़ने का ही है। यह इस संग्रह की कहानियों की विशेष बात है कि सभी जगह बुजुर्गों की पीढ़ी नौजवान पीढ़ी के स्वइप्नोंक और आकांक्षाओं को फलते देखना चाहती है और ऐसे प्रयास करती है, जिससे नए समय और समाज का सपना साकार हो सके। जैसी कि आम धारण विद्यमान है कि पुरानी पीढ़ी प्राय: पुराने पारंपरिक मूल्योंस को ही तरजीह देती है, वैसा इस संग्रह की कहानियों में नहीं है। एक प्रकार से देखा जाए तो नई पीढ़ी जहां कुछ-कुछ पुरातनपंथी या कि भटकाव वाली है, वहीं पुरानी पीढ़ी नए विचारों के साथ चलने वाली है। हालांकि कई बार ऐसा लगता है कि लेखक ने नए समाज के मूल्योंक को स्वीैकार करने वाली बुजुर्ग पीढ़ी का सायास चित्रण किया है, किंतु जैसा कि पहले कहा गया है, ये कहानियां लेखकीय कामनाओं की कहानियां हैं, इसलिए ही नहीं, बल्कि इसलिए भी यह स्वी कार्य है कि समय के साथ हमारी पुरानी पीढ़ी भी नए जीवनमूल्योंस को आत्मकसात करती जा रही है।
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आज के सच को टटोलती कहानियां
० आकाश मिड्ढा, जोधपुर
       मरुभूमि राजस्थान में साहित्य , संस्कृति और कला के क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान रखने में निश्चय ही बीकानेर शहर अग्रणीय है जहाँ साहित्य में राजस्थानी और हिंदी दोनों भाषाओँ में समग्र रूप से कविता और कहानी लिखने वाले रचनाकार अपनी शैली और विविधता के कारण प्रख्यात हैं विशेषकर कहा जाना चाहिए राजस्थानी कहानी यात्रा में बीकानेर का विशेष योगदान है जहाँ अन्नाराम सुदामा , मुरलीधर व्यास , सांवर दइया, श्रीलाल जोशी , यादवेंद्र शर्मा चंद्र भंवर लाल भ्र्मर , मालचंद तिवाड़ी सरीखे नाम उल्लेखनीय हैं इसी धरती से कहानी की यात्रा को आगे बढ़ाते हुए श्री राजेंद्र जोशी का नाम सामने आता है जो लंबे समय से हिंदी कविताओं के माध्यम से अपनी एक अमिट छाप छोड़ते आयें हैं।
         राजस्थानी कहानी यात्रा में यह देखना महत्वपूर्ण है की राजस्थानी कहानी की शुरुवात में लोककथाओं का मायाजाल रहा जिसके सामने आधुनिक कहानी की परम्परा को पल्लवित और पोषित कर सामने लाने में अन्नाराम सुदामा का नाम उल्लेखनीय रहा है। आज के इस उतर आधुनिक काल में राजेंद्र जोशी का कहानी संग्रह अगाड़ी आज के समय की बात करते हुए समाज के विभिन्न पहलुओं और वर्गों की चिंताओं और उनके जीवन को बिम्बो के माध्यम से उभारकर अनेक दृष्टान्त प्रस्तुत करता है जिसमे केंद्र बिंदु में है आधी आबादी कहानियों में स्त्री को किसी भी रूप में पुरुषों से काम नहीं आँका गया हैI
      आमतौर पर कहा जाता है कि कहानी में बड़े ही व्यवस्थित तरीके से उसमे कुछ शिल्प देते हुए पात्रों और कथानक को गढ़ा जाता है जो पाठक को रुचिकर लगे परन्तु राजेंद्र जोशी जी के कहानियों में कहीं भी ऐसा कोई सायास प्रयास नहीं दिखई पडता पात्र सहज रूप से अपनी बात कहते हुए दिखाई देते हैं जो कहानी को जीवंत बना देते हैं ई कहानी लिखते समय कहानीकार के लिए सबसे बड़ा जोखिम भी यही होता है कि कथानक और पात्रों को समेटते हुए कहीं कहानी की तारतम्यता कहीं खो ना जाये परन्तु जोशी जी कहानियों में इस प्रकार का कोई भी विरोधाभास नहीं दिखाई देता और कहानियों में पात्रों को इस तरह से रखा गया है मानो पात्र स्वयं आज के समय के अनुरूप कहानी में अपनी बात कहने का प्रयास किया है मैं समझता हूँ यह किसी भी कहानीकार की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हैI
         बात कहानी संग्रह अगाड़ी की कहानियों के बारे में बात करें तो शीर्षक के रूप में अगाड़ी जो सही मायने में इस समय में आगे रहने की सीख देती है जहाँ कहानीकार ने परमपराओं के महत्व की बात भी की है पर बिना किसी उपदेश के जैसे की अगाड़ी कहानी की शुरूवाट में देवउठनी ग्यारस और साथी कहानी में समाज में एक- दूसरे से प्रतिस्पर्ध्स के कारण दहेज़ प्रथा को मानने वाली उम्मेद की माँ जो बाद में अपने पति और बेटे की सोच का समर्थन करती है और दहेज़ को नकारते हुए नई सोच के साथ बढ़ने को तैयार है कहानी के मूल में एक और बात गौर करने लायक है वो है कि एक पिता अपने पुत्र के साथ उसके निर्णय में मित्र की तरह साथ खड़ा है और अपनी पत्नी को बहुत सहज ढंग से समझाते हुए आगे बढ़ने की बात कहते हैं|
        “अबै माफी नीं“ कहानी विधवा को लेकर समाज की कुलषित मानसिकता और मनुष्य के रूप में उपस्थित भेड़ियों के खिलाफ एक माँ और बेटी के उनके विरुद्ध खड़े होने की कहानी है जो स्त्री को सबल और अन्याय के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा देती है जिसमे माँ ने अब ये दृढ निश्चय कर लिया है कि वो अपनी बेटी के साथ नहीं होने देगी जो वर्षों पहले उसके साथ घटित हुआ कहानी ये दर्शाती है कि समाज में कैसे लोग पद और रुतबे पर रहकर जानवरों से भी बदतर हैं और स्त्री देह को हमेशा नोच खाने को तैयार हैं इस सन्दर्भ में अबै माफी नीं अत्याचार के विरुद्ध आगे आने की कहानी है वो अब सोचती है कि समाज कि चिंता करते हुए उसने बहुत माफ़ कर दिया अब वो अपनी बेटी के लिए कदम उठायेगीI
        “अनाम रिस्तो” कहानी बिलकुल आज के दौर की कहानी है जो यह दर्शाती है कि किस प्रकार हमारे समाज में दोहरे मापदंड हैं जहाँ पुरुष विधुर हो जाए तो उससे स्वतंत्रता है कि फिर से नए सिरे से सोचने के लिए वो किसी दूसरी स्त्री से विवाह करे या सम्बन्ध रखे उस पर कोई उंगली नहीँ उठाता पर एक स्त्री के लिए यह आजादी नहीं इस कहानी में एक विधवा स्त्री सुधा के पति की असमायिक मृत्यु के बाद अपनी चार साल की बेटी के साथ आगे बढ़ने की कहानी हैI कैसे वो शिक्षित होकर अपने पति के ऑफिस में नौकरी शुरू करती है और किस तरह से सुधीर उसका और उसकी बेटी का ख्याल रखता है जिससे प्रेम के अस्तित्व का अहसास भी होता है परन्तु सुधीर उसके और सुधा के सम्बन्ध पर कहता है कि सामाजिक पट्टे के लिए विवाह जरुरी है लेकिन सुधा आजाद ख्याल की और आज के ज़माने की स्त्री है वो कहती है किसी भी सम्बन्ध को कायम रखने के लिए प्रेम सबसे जरुरी तत्व है , फेरे लेना जरुरी नहीं है इसलिए वो लिविंग रिलेशन में ही रहना चाहती है निश्चय ही यह कहानी संग्रह राजस्थानी कथा साहित्य स्त्री को आगे लाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता दिखाई देता हैI
संग्रह की सभी 11 कहानियों में अलग विषयों के चुनाव के साथ नारी को प्रमुखता देते हुए आज के सच की बात की गयी हैI राजेंद्र जोशी जी का यह कहानी संग्रह राजस्थानी भाषा की समृद्धता से परिपूर्ण है और पाठक को लंबे समय तक प्रभवित करने में सक्षम हैI
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बदलते जमाने की नायिकाएं
० मंगत बादल, रायसिंह नगर
        ‘अगाड़ी’ में राजेन्द्र जोशी की 11 कहानियां कथ्य और संवेदना के स्तर पर पाठक को प्रभावित करती हैं। भरतीय समाज ‘पुरुष प्रधान’ है। औरत का दर्जा दोयम है पर इन कहानियों को पढ़ते हुए लगा कि जमाना तेजी से बदलता जा रहा है। नये जमाने में औरत की लगातार बदलती सोच को देखते हुए मर्द को अब सोचने के लिए मजबूर होना होगा। ये कहानियां पाठकों को समाज की किसी न किसी समस्या से रू-ब-रू कराती हैं। अगाड़ी कहानी में दहेज की समस्या को ले कर घर में तनाव पैदा हो जाता है। घर का मुखिया बेटे में दहेज नहीं लेना चाहता पर वह सभी का सम्मान रखते हुए अपनी बात मनवा लेता है।
       ‘अबै माफी नीं’ में राधा की मां राधा के अफसर को सजा दिलाने की निर्णय लेती है जो राधा की इज्जत लूटना चाहता है। वह मौन रहकर सहन करने के पक्ष में नहीं है। तथाकथित ऊंचे समाज के लोग जो ज्यादा दिखावा करते हैं, कहानी ‘ममता’ उन लोगों के बखिया उधेड़ती है। गावों में आज भी जात-पांत, औसर-मौसर आदि को लेकर जिस प्रकार भले आदमी पिसते हैं, उनका यर्थाथ चित्रण ‘अणसैंधो मरग’ में है। ‘अनाम रिस्तो’ की सुधा. सुधीर के साथ बिना विवाह के रहने लगती है। वह समाज का मुकाबला करती है और अपने इस अनाम रिस्तै से उसे कोई शर्म-संकोच नहीं बल्कि गुमान है।
इन कहानियों में नए समाज की औरत अब करवट बदल कर जाग्रत होती देखी जा सकती है और सभी गली-सड़ी रूढ़ियों-परंपराओं को तोड़ने के लिए संघर्षरत है। इन कहानियों में बदलते समाज का नक्शा देखा जा सकता है। अंत में कहानीकार बुलाकी शर्मा के कथन से सहमती व्यक्त करते हुए कहना चाहता हूं “अगाड़ी की कहानियों से राजेन्द्र जोशी की पहचान स्त्री-मन का सच्चा चित्रण करने वाले कहानीकार के रूप में होगी। इन कहानियों में आज की स्त्री की कई-कई छवियां मिलती है, जिसमें खूबियां-खामियां दर्शाती ये अपनी पहचान-अस्मिता संभालती-संवारती आधुनिक होती दिखाई देती हैं।”
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  2 टिप्‍पणियां:

काम जारी......

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संपादक : डॉ. नीरज दइया

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