शनिवार, 10 सितंबर 2016

डॉ. सत्यनारायण सोनी का राजस्थानी कहानी संग्रह “धान-कथावां’’

धान-कथावां (राजस्थानी कहानी संग्रह)  कहानीकार- सत्यनारायण सोनी / प्रकाशक- बोधि प्रकाशन, एफ-77, सेक्‍टर-9,  रोड नं. 11,करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर- 302006 / संस्करण- 2010  / पृष्ठ- 80  / मूल्य- 25/-
डॉ. सत्यनारायण सोनी
जन्म - 10 मार्च 1969 परलीका (हनुमानगढ़) राजस्थान
प्रमुख कृतियां- घमसाण, धान-कथावां (राजस्थानी कहानी संग्रह), राजस्थानी उपन्यास साहित्य : विविध आयाम (आलोचना), हिन्दी में ए क कविता-संग्रह और बाल-साहित्य की तीन पुस्तकें।
संपादन- राजस्थानी कथा केन्द्रित तिमाही पत्रिका 'कथेसर', राजेराम रा दूहा।
पुरस्कार-सम्मान- कहानी संग्रह 'घमसाण' पर मारवाड़ी सम्मेलन-मुम्बई का घनश्याम दास सराफ सर्वोत्तम राजस्थानी पुरस्कार-1996, ज्ञान भारती-कोटा का गौरीशंकर 'कमलेश' स्मृति पुरस्कार-1997 और राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर का पैली पोथी पुरस्कार-1997। राजस्थान एसोसिएशन ऑफ नॉर्थ अमेरिका (राना) कैलिफोर्निया की ओर से राजस्थानी भाषा मान्यता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के लिए पद्मश्री कन्हैयालाल सेठिया समृति प्रथम अंतरराष्ट्रीय भाषा सेवा सम्मान-2012, जोधपुर राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, जोधपुर की ओर से अभिनन्दन-2012। वर्ष 2002 से 2007 तक साहित्य अकादेमी-नई दिल्ली के राजस्थानी परामर्श मंडल में भागीदारी। दैनिक भास्कर, श्रीगंगानगर संस्करण के लिए दैनिक कॉलम “आपणी भाषा आपणी बात” का लेखन-संयोजन। कई कहानियां अन्य भारतीय भाषाओं में भी अनूदित-प्रकाशित।
संप्रति : राजस्थान शिक्षा सेवा के अन्तर्गत राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, परलीका (हनुमानगढ़) में प्राध्यापक-हिन्दी पद पर सेवारत। संपर्क : परलीका (हनुमानगढ़) 335504
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स्मृति को झिंझोड़ती कहानियां
० डॉ. अर्जुन देव चारण, जोधपुर
आधुनिक युग में इंसानी जीवन ज्यों-ज्यों जटिल होने लगा त्यों-त्यों उसका असर इस युग के साहित्य में प्रकट होने लगा। कविता के क्षेत्र में यह बदलाव थोड़ा पहले आ गया था, परन्तु कहानी के क्षेत्र में इसका असर अपेक्षाकृत धीमे-धीमे आया है। कहानी मूल रूप से तो ‘कहन’ पर टिकी हुई विधा है और राजस्थानी साहित्य में ‘बातों’ के निमित्त यह कहन का भाव समाज के हृदय बसा हुआ है। यहां का लोककथा साहित्य अधिक समृद्ध है। राजस्थानी के आधुनिक कहानीकार को लोककथात्मक स्वरूप से बाहर निकलने में बहुत मशक्कत करनी पड़ी। अभी यह ‘कहन’ का भाव कहानी के केन्द्र में बना हुआ है। पिछले पन्द्रह-बीस बरस राजस्थानी कहानी के क्षेत्र में अधिक महत्वपूर्ण रहे हैं। अब यह ‘कहन’ वक्त में हस्तक्षेप करने लग गया है, अब यह ‘कहन’ उतना सीधा-सरल नहीं रहा। पहले की कहानी में काल का इतना हस्तक्षेप नहीं था। इस तरह कहा जा सकता है कि अब कहानी अपना खोल बदलने लग गई है। 
         बदलाव की यह धारा इन पिछले पन्द्रह-बीस बरसों से अपनी धीमी चाल से चल रही थी, पर अब राजस्थानी का नया कहानीकार इस धीमी चाल को गति देने की सोचता दिख रहा है। ऐसा ही एक कहानीकार है सत्यनारायण सोनी। सत्यनारायण के इस कहानी-संग्रह ‘धान कथावां’ में डायरी, संस्मरण और आत्मकथ्य जैसी कथेतर विधाओं के मार्ग आपस में मिलते दिखाई देते हैं। यह प्रवेश शुभ है। क्योंकि यह कहानी का हिस्सा बन उसे पुष्ट करता दिखता है। इस संग्रह की कहानियां पाठक को मौजूदा समाज में पसरी हुई सामाजिक विसंगतियों की पहचान तो कराती ही हैं, पर उसके साथ ही वे इस उत्तर आधुनिक युग में मानव और मानवता के निर्बल पड़ते जाने को भी बिना किसी अन्य तामझाम के प्रस्तुत करती हैं। सामाजिक रिश्तों को निभाने में उलझा हुआ मनुष्य का ‘होना’ भौतिकता के काले प्रकाश में किस कद्र जूझ रहा है, इसके कई चित्र इन कहानियों में प्रकट होते हैं। सत्यनारायण की कहानियां मनुष्य की बेबसी और लाचारी से उपजते सघन संवेदन को अत्यंत ठंडे तरीके से अपने पाठक के समक्ष रखती हैं। कहानी की यह ठंडी निर्ममता पाठक के कलेजे आहिस्ता-आहिस्ता उतरती है, परन्तु फिर वहां स्थाई वास कर लेती है और जब कभी वह अपने आस-पास उस तरह की स्थितियों को देखता है तब वह कलेजे घुसी हुई ठंडक उसे पसीने से तरबतर कर देती है। 
         ये कहानियां कई जगह अपने अबोलेपन के कारण एक भेद-भरी दुनिया रचने लगती हैं। उस अबोले भेद को खोलने के प्रयास में इसका पाठक एक साथ कई अर्थ छवियों का प्रकटाव होते हुए देखता है। पाठक की स्मृति को झिंझोड़ती ये कहानियां राजस्थानी कहानी की यात्रा को निश्चय ही आगे बढ़ाने वाली है।
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राजस्थानी कहाणी का बदलता मिजाज
० डाॅ. मदन गोपाल लढ़ा, महाजन (बीकानेर)
‘धान कथावां’ चर्चित कथाकार सत्यनारायण सोनी की कहानियों का दूसरा संग्रह है, जो बोधि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। अपनी प्रथम पुस्तक ‘घमसाण’ (1995) से राजस्थानी कहानी के आंगन विशिष्ट स्थान बनाने वाले सोनी अपना निजी मुहावरा रचते हैं। जहां कहानी की कोई संभावना नहीं दिखती, वहां से बेहतरीन कहानी निकाल लेने का हुनर सोनी को मानो वरदान रूप हासिल है। कथ्यगत नवीनता और शिल्पगत मौलिकता के बल पर सोनी ने कथा विधा में निराली पहचान बनाई है और यह दूसरा संग्रह इस पहचान को पुख्ता करता दिखता है। 
         विषयगत नवीनता की दृष्टि से ‘धान कथावां’ इस विधा की महत्वपूर्ण पुस्तक मानी जाएगी। क्योंकि इसमें अब तक के कई अछूते कथानकों पर सोनी की सशक्त कहानियां शामिल हैं। आस-पड़ोस के साधारण दिखते दृश्यों और जन-जीवन की छोटी-मोटी घटनाओं को कथाकार इस दक्षता से व्यक्त करता है कि अंत तक पहुंचते-पहुंचते कहानी पाठक के लिए एकदम नया अनुभव बन जाती है। सोनी की कहानियों में सामाजिक विसंगतियों संग इंसानों के बदलते चेहरों की सूक्ष्म पड़ताल की गई है। इन कथाओं में राजस्थानी परिवेश खासकर उत्तरी अंचल मुंह बोलता दिखता है। घर में पूजा के थान में लगी हुई एक फोटो को लेकर लिखी हुई पुस्तक की प्रथम कहानी ‘आ फोटू अठै कियां’ इस पुस्तक की अनूठी रचना है, जो लेखक की निजी जिंदगी की कई बातों को इस ढंग से आपस में जोड़ती है कि यह कहानी अपनी पूर्णता में कौमी एकता और भाईचारे की सबल पहचान बन जाती है। साम्प्रदायिक सद्भाव को लेकर बिना किसी नारेबाजी के यह कहानी कट्टर और संकीर्ण सोच को तो उजागर करती ही है, इंसानियत की उदार मानसिकता को भी मजबूती से सामने लाती है। कथानायक के मित्र के घर सरनाम गायक मोहम्मद रफी की फोटो देखकर एक आदमी सम्प्रदाय विशेष के लिए अपमानजनक शब्द प्रयुक्त करते हुए अंगुली उठाता है तो वहीं कथानायक की पत्नी अपने घर पूजा के थानों में हनुमानजी और दुर्गा की फोटुओं बीच चांद-तारे का चित्र और ईद मुबारक लिखा फोटो रखकर इंसानियत का मान बढ़ाती है। 
         ‘छाती’ कहानी की मीरां अपनी बेटी राणती से उसके बाप के निधन की बात को छुपाती है। सवा बरस तक वह बिटिया को बहलाए रखती है, पर दीवाली के मोकै बिटिया हठ पकड़ लेती है और घड़ी-घड़ी ‘बापू कद आसी?’ की रट लगाती रहती है। परेशान होकर मीरा राणती के एक चपत लगा देती है और रोते हुए बता देती है- ‘बेटा, म्हैं ई हूं तेरी जो कुछ हूं। म्हैं ई तेरी मां, म्हैं ई तेरो बापू, भाई-बैण.....सो कीं म्हैं ई हूं.......।’(पृ.29) इधर राणती भी मां को गलबंही डाल छाती से लिपट जाती है और दूसरी ओर कहानी की आर्द्र संवेदना पाठक के हृदय उतर जाती है। 
          ‘समंदर’ कहानी के सुरेन्द्र का ग्यारह वर्षीय पुत्र पांच साल पूर्व लापता हुआ। इस पीड़ को अंतस में लिए ही वह मुस्कुराता है और कथानायक के मित्र रामेश्वर की कहानी सुनकर दाद देता है। सुरेन्द्र का मासूम सवाल ‘पता नहीं क्यूं, कभी-कभी मुझे लगता है कि मेरा बेटा मुझे मिल जाएगा। एक न एक दिन तो मिल ही जाएगा ना? (पृ.25) कथानायक के मुख पर सवालिया निशान लगाता है, वहीं पाठक के अंतस के समंदर में भी तूफान ला देता है। 
        डायरी शैली में लिखी ‘अळोच’ कहानी भी बालक के गुम होने की मार्मिक दास्तान है। अखबार की खबर से परलीका से गुम हुआ बालक तो मिल जाता है, पर हनुमानगढ़ जंक्शन रेलवे स्टेशन पर सदैव के लिए अपने बेटे को गंवा गमा चुकी महिला के आंसू कैसे थमें। ‘छींकी’ कहानी छोटी पर नारी मनस्थिति और बाल-मनोविज्ञान की अच्छी कहानी है। इस कहानी में कलावती के बहाने हम औरत जात की आकांक्षाओं और अवरोधों की पड़ताल कर सकते हैं। बानगी- ‘कलावती एकर-सी खुद पतंग बण ज्यावै। बा ई उडणो चावै आभै मांय। उडारी भरणी चावै। सोचै, कोई बीं नै उडावै। कोई छींकी देवै। बा उड ज्यावै आं भीतां सूं पार।’ (पृ.57) दूसरी ओर पांच बरस की बालिका ‘सुमना’ मां से हवाई-जहाज मांगती है- पतंग लूटने के लिए। ‘एक और मुकामो’ कहानी में प्रसिद्ध कथाकार रामकुमार ओझा की दबंग नारी पात्र ‘मुकामो’ के उल्लेख के साथ उसके जोड़ की महिला का सबल चरित्र सामने आता है। संग्रह की बोतलां, चिबखाण, जलम दिन जैसी कहानियां भी सशक्त बन पड़ी हैं।
          सत्यनारायण सोनी की कहाणियां की खामचाई लम्बी साधना का फल ही माना जा सकता है। इन कहानियों में एक पक्ति भी अनावश्यक नहीं लगती। कई स्थलों पर तो यूं भी लगता है कि कथाकार को कहानी शुरू करने से ज्यादा खत्म करने की जल्दी रहती है। आज की कहानी में पहले की भांति कथातत्व की अधिक जरूरत नहीं रही। अब पात्रों के मन के भीतर के द्वंद्व और परिवेश के विश्वस्त चित्रण में ही कहाणी की सफलता मानी जाती है। इसके बावजूद मेरे विचार से कविता में ज्यों कवितापन जरूरी है, त्यों कहानी में कथारस होना भी लाजिमी है। 
          शिल्प के स्तर पर सत्यनारायण सोनी ने अनूठे प्रयोग किए हैं। उनकी अधिकतर कहानियां आत्मकथ्य के रूप में हैं। कई कहानियों में डायरी, संस्मरण और रेखाचित्र जैसी विधाओं के चिह्न और सधी हुई भाषा और शिल्प इन कहानियों को विशिष्ट बनाते हैं।
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कथा-साहित्य की समृद्धि का परिचयक : धान कथावां
० डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी, झालावाड़
         डॉक्टर सत्यनारायण सोनी की राजस्थानी भाषा में प्रकाशित कहानी संग्रह 'धान-कथावां'  में 18 कहानियां हैं। इस संग्रह में सत्यनारायण जी ने अपने आस-पास के उन छोटे-छोटे बिंदुओं और मानवीय संवेदनाओं के ताने -बाने को अपनी लेखनी से इस तरह रचा है कि पाठक को यही महसूस होता है कि ये सब घटनाएं उसके खुद के जीवन की हैं, और इन कहानियों को वो अपने-आप से जोड़ लेता है। पाठक को जब किसी की लेखनी अपनी जीवन कूची लगने लगे तो यह लेखकीय क्षमता का सीधा-सा प्रमाण है। लेखक ने अपने इस कहानी संग्रह को बेहद धैर्य और लम्बे अनुभव के बाद पाठकों को नज़र किया है। इन कहानियों का रचनाकारल 1997 से 2008 तक फैला है।
         पूरे पंद्रह साल के इंतज़ार और लेखकीय संशोधन के बाद 1997 की चार कहानियों को इसमें जगह मिली है। परलीका ग्राम, सरकारी सेवा, पारिवारिक अहसास और मूल्य, जीवन की आपा-धापी में कुछ पीछे छूटने का मलाल और सबसे खास समाज की मनस्थिति को बेहतरीन तरीके से इसमें विश्लेषित किया गया है। इस संग्रह की कहानियां 'आ फोटू अठै कियां', 'हर-हीलो', 'जलम-दिन', 'चिबखाण' आदि विशेषकर पाठक को इस बात से बखूबी अवगत करवा देती हैं कि सोनी जी का सबसे बड़ा सामर्थ्य है कि वे अपने चारों तरफ से उन घटनाओं को भी संवेदनशील हृदय से समझ सकते हैं जिन पर हमारा या तो ध्यान ही नहीं जाता और या फिर हम उन्हें शब्दों में बाँध पाने की योग्यता नहीं रखते हैं।
              पहली कहानी 'आ फोटू अठै कियां ' को भारतीय भाषाओँ में अनूदित कहानियों के बीच राजस्थानी की प्रतिनिधि कहानी के रूप में रखा जा सकता है। इस में कौमी एकता को विश्लेषित तरीके का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत हुआ है। उल्लेखनीय है कि इस कहानी का हिंदी अनुवाद मदनगोपाल लढा और गुजराती संजय बी. सोलंकी ने किया है। समग्रतः यह राजस्थानी कहानी संग्रह राजस्थानी कथा-साहित्य की समृद्धि का परिचयक है।
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लेखकीय कौशल की झलक 
० पृथ्वी परिहार, नई दिल्ली
रोपता हूं
धान- पनीरी
इनसे
कभी तो उगेंगी
धान कथाएं।
       पनीरी-पौध। वर्ष 2010 की शुरुआत ऐसी ही कुछ उम्‍मीद जगाने वाली पंक्तियों से हुई। इससे बेहतर पठन में क्‍या हो सकता है कि राजस्थानी में कहानी आंदोलन की जमीन परलीका से हरावल कहानीकार सोनी का कहानी संग्रह लंबे इंतजार के बाद आया। साहित्‍य-गांव परलीका के मास्‍टर साब यानी सत्‍यनारायण सोनी की नयी पोथी ‘धान-कथावां’ (राजस्‍थानी) इसी उम्‍मीद में पौध रोपी गईं हैं कि कभी तो उनसे कथाएं उगेंगी। और इस किताब को पौध के रूप में ही लिया जाएगा, क्‍योंकि इसमें उनके लेखकीय कौशल की झलक मिलती है।
       बोधि प्रकाशन ने एक बार फिर साधुवाद लायक काम किया है। मात्र 25 रुपये में किताब जिसमें यात्रा संस्‍मरण, कहानियां जैसी विधाओं की रचनाएं हैं। उनकी रचनाओं की खास बात कि यह भी गांव और उनकी तरह सीधी साधी-सरल हैं। सहज हैं। बहुद हद तक कोई लाग-लपेट दुराव नहीं। वे अपने लेखन में बड़ी-बड़ी बातें नहीं बांधते, बस छोटी-छोटी बातों से बड़े, गहरे संकेत देते हैं। एक बैठक में पढने लायक किताब। जिसमें जीवनानुभवों और संस्‍मरणों  में गूं थी छोटी-छोटी घटनाओं को कहानियों के रूप में पिरोया गया है।
        प्रेमचंद गांधी ने कहानीकार सोनी के बारे में लिखा है- “उनकी कहानियां आसपास के ग्रामीण परिवेश में फैली विसं‍गतियों और विद्रूपताओं को बहुत खूबसूरती के साथ बयान ही नहीं करती, बल्कि पाठक को झिंझोड़ देती है।”
         डॉ. अर्जुनदेव चारण का कहना है कि सत्‍यनारायण सोनी की कहानियां कई जगह अपनी चुप्‍पी के कारण भेद भरी दुनिया रचती हैं और इसी चुप्‍पी को तोड़ने के कवायद पाठक को एक नये संसार में ले जाती है। उनके लेखन की विशेषता सहजता-सरलता है।
        सत्‍यनारायण सोनी के लेखन की यह पनीरी या पौध है, फसल अभी आनी शेष है। वे राजस्‍थानी के सबसे प्रतिभावान, ऊर्जावान लेखकों में से एक हैं, इसलिए उनसे इससे कहीं बेहतर और अधिक की उम्‍मीद बेमानी नहीं है।
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संवेदना के स्तर पर बहुत बड़ी कहानियां
रामस्वरूप किसान, परलीका (हनुमानगढ़)
        कहानीकार की महारत मात्र सामाजिक विकृतियों की परिगणना या उनका सपाट रूप दिखाने में नहीं है। असल कामयाबी तो विकृतियों का वह विश्लेषण है जो जीवनभर पाठक को झकझोरता रहे। यह विश्लेषण ही कहानी की जान है। इसी से ही कहानी टकसाली बनती है। इसे ही हम कहानी का तजुर्बा, कहानी की गौरव, कहानी का गुर कह सकते हैं।
        कहानीकार वह चेजारा है जो चीजों, स्थितियों और संदर्भों को अत्यंत चतुराई से काट-छांट कर उन्हें तरतीब से लगाकर कहानी का महल बनाता है। ‘घमसाण’ के पश्चात कहाणी संग्रह ‘धान-कथावां’ में सत्यनारायण सोनी राजस्थानी कहानी जगत में एक ऐसे ही चेजारे के रूप में आए हैं। आकार में छोटी दिखने वाली इस संग्रह की कहानियां संवेदना के स्तर पर बहुत बड़ी हैं। मौलिकता की दृष्टि से देखें तो इन कहानियों में छुपे हुए और छूटे हुए को रचा गया है। जहां रचनाकार को कहानी की गुंजाइश ही नहीं दिखती, वहीं सोनी एक जोरदार और अनूठी कहानी रचते हैं। एक रचनाकार के लिए यह बहुत बड़ी बात है। क्योंकि राजस्थानी में एक तरफ जहां अच्छे-अच्छे कहानीकार आज भी विषय को पकड़ कर निबंध की तर्ज पर कहानी लिखते हैं, वहीं कहानी के मामले में सोनी की समझ को दाद देनी जरूरी है। यह लेखक किसी घटना पर कहानी नहीं लिख कर उस घटना के सबसे संवेदनशील बिंदु को कहानी के रूप में रचता है। इन कहानियों में वर्णन नहीं हो कर हालातों के सूक्ष्म विश्लेषण से पात्रों का चेहरा दिखाया गया है। कहानियां पात्रों की क्रियाशीलता से आगे बढ़ती हैं और अपना अप्रत्याशित अंत हासिल करती हैं। यह कहानी का पहला गुण और पहली शर्त होती है। इस संग्रह की कई कहानियों में डायरी शैली का बेहतरीन और राजस्थानी कहानी के मामले में एकदम नया प्रयोग हुआ है।
        आ फोटू अठै कियां, समंदर, हर-हीलो, जलम-दिन, होड, अळोच, चिबखाण, छींकी आदि सशक्त कहानियों को चर्चा की दरकार है। ‘आ फोटू अठै कियां’ फकत राजस्थानी ही नहीं, समस्त भारतीय भाषाओं की श्रेष्ठ कहानियों की कतार में आने का मादा रखती है। कौमी एकता और भाईचारे को अद्भुत ढंग से दर्शाती यह राजस्थानी की पहली कहानी है।
        मैं बेझिझक कह सकता हूं कि सत्यनारायण सोनी के इस संग्रह का स्वाद पाठकों को अवश्य खींचेगा।
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कलम की कारीगरी : धान कथावां 
० देवकिशन राजपुरोहित, चंपाखेड़ी (नागौर)

       समीक्षित कृति 'धान कथावां' राजस्थानी भाषा के ख्यातनाम कहानीकार सत्यनारायण सोनी की एक और नवीन कृति है। सत्यनारायण सोनी कहानी विधा में अनवरत लिख रहे हैं। यों परलीका स्वयं अपने आप में राजस्थानी रचनाकारों की 'काशी' है और अधिकतर राजस्थानी रचनाकारों की जन्मस्थली होने का इस गांव को गौरव प्राप्त है। 'धान कथावां' 18 कहानियों का संकलन है। 'बोतलां' शीर्षक कहानी समाज पर करारा व्यंग्य है। घर में आए अ​तिथियों की सेवा में पूरी आठ बोतलें खुलीं, जबकि स्वयं के घर में चाय के कप भी साबुत नहीं। उसकी पत्नी प्रसन्न होकर खाली बोतलों के बदले कप खरीदने की योजना बना रही है। 'आ फोटू अठै कियां' कहानी हिन्दु-मुस्लिम एकता पर आधारित है, वहीं 'समंदर' कहानी मार्मिकता का एक सुंदर चित्रण है। 'जलम दिन' में साहित्यकार अपने जन्मदिन को कितनी प्रसन्नता से मनाना चाहता है, किंतु गृह कलह में वह जन्मदिन कैसे मना, दृष्टव्य है- 'यूं कैय सकूं कै म्हारो अठाईसवों जलम दिन अंधारै मांय डूबण लागरयो है।' मगर कहानी के अंत में अगले दिन के प्रभातकाल का ​जो चित्रण है, उसमें कुशल गृहिणी की रागात्मकता कहानी को अनूठा बना देती है- 'जोड़ायत बुहारा-झाड़ी करै। बारै नीमड़ी अर आंगण में मंडेरी ऊपर चिड़कल्यां चिंचाट करै। अर बां री टेर में टेर मिलांवती-सी बा परभाती रा टप्पा गुणगुणावै। म्हारी निजरां मिठाई रै लिफाफै जाय टंगै। कीड़ी लागरी है। जमीन सूं लेय'र लिफाफै तांईं काळी लकीर! कीड़ी मिठाई रा कण ले-लेय'र पाछी आवै। अेकर-सी म्हनै लागै जाणै अै कीड़ी म्हनै आज उणतीसवों साल लागण री बधाई देवै। भळै सोचूं अर हाँसूं आपरी बावळ पर, बावळा, कीड़ी ई कदे कीं नै बधाई दी है आज तांईं! जोड़ायत बुहारा-झाड़ी रै काम सूं फारिग होय'र चाय री पतीली चढावै चूल्है पर। पाणी रो लोटो भर'र म्हानै पकड़ावै मूंडो धोवण सारू अर अखबार म्हारै मूंडै साम्हीं मै'ल देवै। भळै बा घणै हेत सूं टाबरां नै जगावै। टाबर जाग ज्यावै अंगाड़ी तोड़ता। बा खूंटी सूं लिफाफो उतारै अर कीडिय़ां नै खरी-खोटी सुणावै। मिठाई थाळी में मुंधावै अर फूंक मार-मार'र कीड़ी अळगी करै। पछै प्लेटां में जचा-जचा'र म्हारै साम्हीं धरै। चाय छाण'र कपां में घालै अर बरफी रो अेक टुकड़ो आपरै मूंडै में घालती कैवै, हूंऽऽ, है तो बाळणजोगी सुवाद। पण हैं ओऽ! ईं तंगी में थानै ओ खरचो करण री कांईं आवड़ी?'
       छुआछूत जैसे रोग पर 'हरहीलो' कहानी बड़ी शिक्षाप्रद बन पड़ी है। वहीं कहानी 'एक और मुकामो' में तो चलती बस से लगे कीचड़ के छींटों पर ड्राइवर से झगड़ा और सवारियां चुप्प। आखिर एक महिला को ही आगे आकर सत्यता का पक्ष लेना पड़ा। सपने के बहाने 'मौत' का वर्णन, 'छोटी सी बात' में बात द्वारा बेटे का सामान उठाते हुए उसे बस-अड्डे पहुंचाना आदि।
       सभी कहानियां सुपाठ्य, सरस और शुद्ध राजस्थानी मानक रूप में हैं, जिनमें यथा स्थान मुहावरे, कहावतें भी सटीक हैं। प्रत्येक कहानी अपने आप में पूर्ण और शिक्षाप्रद है।
       कुल मिलाकर कहानी संग्रह की कहानियां स्वयं कहानीकार की जीवनी के अंश तो हैं ही, संस्मरणत्मक भी हैं। कलम के कारीगर सत्यनारायण सोनी की लगन और निष्ठा तथा लोकजीवन की गहरी समझ का ही परिणाम है कि इन कहानियों में स्वत: ही रीति-रिवाज, वार-त्योहार और परम्पराएं भी समाहित हो गई हैं।
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युगांतरकारी कहाणी संग्रह : धान कथावां
डॉ. मदन सैनी,
बीकानेर 
‘धान कथावां’ नई पीढ़ी के कहानीकारों में अग्रगण्य कहानीकार सत्यनारायण सोनी का ‘घमसाण’ के बाद सर्वाधिक चर्चित राजस्थानी कहानी संग्रह है। इस संग्रह में कुल अठारह कहानियां संकलित हैं। भाव-बोध के स्तर पर प्रायः सभी कहानियों में नयापन है और राजस्थानी मुहावरे को नया मोड़ देने में ये कहानियां सक्षम हैं। संग्रह की पहली कहानी ‘आ फोटू अठै कियां’ में सांप्रदायिक सौहार्द्र के मर्म को उजागर किया गया है। आज भी आम आदमी के मन में धर्म या मजहब को लेकर ग्रंथी नहीं है, हमारे आध्यात्मिक एवं मानवीय संस्कारों को सबल रूप में रेखांकित करती यह एक यादगार कहानी है।
    ‘हर-हीलो’ कहानी में परंपरावादी और आधुनिक संस्कारों के द्वंद्व को बड़ी खूबसूरती से उजागर किया है। रूढ़ संस्कारों एवं रूढ़ मानसिकता पर यह कहानी चोट ही नहीं करती, अपितु, प्रगतिशील सोच को दिशा भी देती है। राजनीतिक स्वार्थपरता और अवसरवादिता को उजागर करने की दृष्टि से ‘बोतलां’ कहानी भी अपना प्रभाव छोड़ती है, वहीं ‘समंदर’ में मानवीय संवेदना का मार्मिक चित्रण हुआ है। देश में विडंबनाजन्य अराजकता का माहौल है, उसे यह कहानी अपने मौन क्रंदन में ही व्यक्त कर देती है। ठीक इसी कथानक का स्मरण दिलाने वाली कहानी ‘अळोच’ भी उल्लेखनीय है। इस कहानी में भी एक लड़का खो जाता है। ‘समंदर’ में जहां खोए लड़के की तलाश हेतु मीडिया का सहारा लेने पर भी खोया बच्चा नहीं मिल पाता, वहां ‘अळोच’ का खोया बच्चा मीडिया के सहारे पुनः घर लौट आता है। ये कहानियां पाठक को सोचने पर विवश कर देती हैं कि ऐसी स्थितियां उत्पन्न ही क्यों होती हैं? क्यों नहीं कोई कारगर कदम उठाए जाते? ‘छाती’ कहानी की नायिका मीरां विधवा है और अपनी पुत्री ‘राणती’ को भ्रम में रखती है कि उसके पिता दीवाली पर लौटेंगे, लेकिन दीवाली पर पुत्री बार-बार पिता के लौटने के बारे में पूछती है, तो उसके सब्र का बांध टूट जाता है और वह अबोध बच्ची को छाती से लगाकर फूटफूट कर रोने लगती है। यहां बाल-मनोविज्ञान का सूक्ष्म अंकन हुआ है, ठीक इसी प्रकार ‘छोटी-सी बात’ कहानी में प्रौढ़-मनोविज्ञान का यथार्थ सामने आता है कि कोई व्यक्ति कैसे अपनी झेंप मिटाने के लिए सुंदर-सुंदर तर्क गढ़ लेता है।
    ‘मरद’ कहानी के नायक के दाढ़ी-मूंछें नहीं होने पर पत्नी द्वारा कहे गए शब्द ‘बाई बरगो सफाचट’ उसे भीतर तक झकझोर देते हैं और वह स्त्री-चरित्र को लेकर आत्मविस्मृत हो उठता है। लेकिन जब पत्नी बताती है कि ओम की बहू ने ये शब्द कहे, तो मेरे मन में आया कि उसे सबक सिखाऊं, पर लोक-व्यवहार के कारण चुप रह जाना पड़ा। तो कथा-नायक के मनोभावों में पुनः उतार-चढ़ाव आने लगता है।
    ‘छींकी’ कहानी में भी पाठकीय संवेदना बाल-मनोविज्ञान से जुड़ती चली जाती है। पतंगों के बहाने घर के बंधन में बंधी कथा-नायिक का मन भी करता है कि वह भी ऊपर उड़ान भरे। उसके बच्चे भी पतंगें उड़ाना चाहते हैं और बच्ची का यह कहना है कि एक जहाज दिला दो, ताकि कटी पतंगें लूटने में मदद मिले। बालसुलभ सत्य को उजागर करने वाली कहानी है। ‘चिबखाण’ कहानी के पात्र तो किसी गांव, मौहल्ले में मिल जाएंगे। समाज-मनोविज्ञान के अध्येता जानते हैं कि बाल-मन और प्रौढ़-मन में जब प्रतिस्पर्द्धात्मक आत्मीय रिश्ता बनने लगता है, तो उसका एक अलग ही आनंद होता है। ‘जेनरेशन-गेप’ का यह द्वंद्व यदि अनायास ही अवरुद्ध हो उठता है, तो मन अशांत हो उठता है और इसी तथ्य को इस कहानी के माध्यम से सफलतापूर्वक चित्रित किया गया है। ‘जलम दिन’ कहानी में जहां मध्यमवर्गीय घर-गृहस्थी के यथार्थ जीवन-बिंबों को उजागर किया गया है, वहीं ‘छेकड़ली सांस’ में खून के रिश्तों में आए अंतराल की व्यथा को रेखांकित किया गया है। ‘नाजक’ कहानी में पड़ोसी से स्पर्द्धा का स्वाभाविक चित्रण हुआ है, तो साथ ही जीवों के प्रति संवेदनात्मक पीड़ा भी इसमें परिलक्षित होती है।
    अन्य कहानियों में ‘अेक और मुकामो’ भी यादगार कहानी है, जो एक वृद्धा की निडरता और साफगोई से सभी को सकते में डाल देती है। मुहावरेदार भाषा-शैली, संवाद-सौष्ठव तथा मानवमन की सूक्ष्म संवेदनाओं के अनूठे बिंबों का अंकन इस संग्रह की पठनीयता में चार चांद लगा देता है। राजस्थानी कथा-साहित्य में यह संग्रह युगांतरकारी कहा जा सकता है।

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धान-कथावां : एक दृष्टि
० श्यामसुंदर भारती, जोधपुर
   

     कहानी संग्रह ‘धान कथावां’ का ज़िक्र इसलिए भी करना चाहता हूं, कि इस संग्रह की एकाधिक कहानियां पाठक को अपनी ओर बरबस आकर्षित करती हैं। इसकी एक वजह तो है पात्र-चरित्रों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण, जो प्रायः एक दुष्कर कार्य है, लेकिन कथाकार ने इसे बखूबी अंजाम दिया है, और अपनी लेखनी से पात्रों को जीवन्त किया है। ‘चिबखाण’ का ताऊ पत्थरों की आवाज़ सुन कर चिढ़ रहा है, बच्चों के चिबल्लेपन से अपना आपा खो रहा है, वही उस दैनिक चुहल के अभाव में  बेचैन भी हो रहा है। यह मानव अन्तर्मन की प्रवृत्ति का सजीव नहीं, लाइव प्रसारण है।
    कहानी ‘घरबीती-परबीती’ आज के दैनन्दिन जीवन का यथार्थ है। असल में आज का आदमी इतने टुकड़ों में बंटा है कि वह सब जगह है, और संपूर्ण रूप में कहीं भी नहीं है। मनोविज्ञान में यह ध्यान की खंडित अवस्था है, जो अन्ततः मानव व्यक्तित्व और उसकी एफीसिएंसी को खंडित करती है। ‘हर-हीलो’ एक प्रतीकात्मक कहानी है, जो पात्र चपरासी की मारफत उस थोथे जातीय-दंभ को हमारे सामने लाती है, जिसने इतिहास के किसी काल-खंड में अपनी अति के कारण न केवल आदमी-आदमी में बंटवारा किया, बल्कि देश को कमज़ोर और परतंत्र भी बनाया। लेखक ने संभवतः हल्का सा इशारा किया है कि स्थिति में बहुत बदलाव आज भी नहीं आया है।
    ‘मरद’ कहानी दरअस्ल स्त्री-पुरुष संबंध, और खासकर स्त्री के प्रति पुरुष की सोच, उसकी मानसिकता को लेकर लिखी गई है। लेखक ने यह बताया है कि पुरुष अपनी पत्नी के मुंह से केवल और केवल वही बात, वही भाषा सुनना पसंद करता है, जो उसके अहं को तुष्ट कर सके। यहां तक कि वह किसी बात को पूरा जाने बिना ही, उसके प्रति अपनी धारणा बना कर कुंठित हो जाता है। ‘छेकड़ली सांस’ मानव मन के पश्चात की कहानी है। मनुष्य की सब से बड़ी कमज़ोरी यह है कि उसका अपने ही मन पर बस नहीं है। जीवन में की गई गलती पर अंत में केवल पछतावा ही तो किया जा सकता है। ‘नाजक’ का पात्र एक ऐसा चरित्र है, गुस्सा जिसकी नाक पर रहता है। बिना तथ्य जाने वह लोगों के गले पड़ जाता है। कभी किसी के साथ उसकी बनी नहीं। लेकिन जिसका स्वभाव झरे, कोई उसका क्या करे? समाज में ऐसे पात्रों की कौन कमी है।
    संग्रह का सबसे सबल इसका कहानियों का भाषा-पक्ष है। किसी निर्झर की तरह कलकल बहती राजस्थानी भाषा का ऐसा प्रवाह शायद कम लेखकों के पास है। कस्बाई और शहरी भाषा के प्रभाव से ग्रसित हुए बिना लेखक ने जिन ठेठ शब्दों, और यथा समय उपयुक्त मुहावरों का सटीक प्रयोग किया है, वह प्रायः दुर्लभ है।
    गद्य लेखकीय परख का निकष है। अपेक्षाकृत कविता में सपाट बयानी ही नहीं, वह भी चला दिया जाता है, जो अनमेल प्रतीकों-बिंबों की ओट में छुप जाता है। लेकिन कहानी में सब कुछ साफ-साफ होता है। लेखक उसमें अनर्गल कुछ भी नहीं परोस सकता। इस दृष्टि से ‘धान-कथावां’ हमें हर तरह आश्वस्त करती है। 

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कहानी के परंपरागत ‘फार्म’ को तोड़ते हुए
० बुलाकी शर्मा, बीकानेर

    ‘धान कथावां’ में संग्रहित कहानियां अपनी विशेष शैली, शिल्प, कथ्य एवं कहनपन के आधार पर चैलेंजिंग इस अर्थ में है कि ये कहानियां डॉ. सत्यनारायण सोनी की पूर्ववर्ती कहानियों की तुलना में आत्ममंथन और आत्मविवेचन की परिचायक है। बेहतर लिखने के प्रति गंभीर कहानीकार सोनी ने कहानी के परंपरागत ‘फार्म’ को तोड़ते हुए डायरी, संस्मरण, रिपोर्ताज आदि विधाओं में कहानियां लिखी हैं। इन कहानियों में रामस्वरूप किसान, रामेश्वर गोदारा, विनोद स्वामी आदि कहानीकार पात्रों के रूप में हमारे सम्मुख उपस्थित हैं। संस्मरण विधा और विधाओं के ‘फार्मेट’ की जानकारी के बाद भी यदि कोई कहानीकार कहानी के बंधे बंधाए फोर्मेट में न रहकर ऐसा चैलेंज लेता है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए।
    विभिन्न विधाओं का यह कहानी के शिल्प में समायोजन है जिससे पाठक कहानी के मर्म तक पहुंच जाते हैं। कहानीकार सोनी में अंतर्मन में झांकने की सामर्थ्य है। वे छोटी-छोटी घटनाओं के सहारे तानाबाना बुनकर पाठक को गहरे तक विचलित कर देते हैं। ‘आ फोटू अठै कियां’ कहानी में कहानीकार रामस्वरूप किसान के घर किशोर कुमार और मो. रफी का फोटो देखकर विशेष वैचारिक घेरे में उलझे एक व्यक्ति का ऐसा सवाल हमें जहां व्यथित करता है, वहीं हसन के फोन की कॉरल ट्यून ‘हरे राम... हरे कृष्णा....’ आश्वसत करती है कि जाति, धर्म, मजहब से ऊपर आत्मीयता है, मानवता है। आत्मीय और रक्त संबंधों में दरार स्वार्थवृत्ति डलवाती है। ‘छेकड़ली सांस’ का नायक अपनी छेकड़ली सांस में अपने भाई मोहने को याद करते हुए अफसोसा करता है कि दो बीघा जमीन के लोभ में भाइयों के बीच संवाद समाप्त हो गया। वहीं, एक मां की ममता अपने पड़ोसिन के बेटे के गुम हो जाने पर उसे इतना व्यथित कर देती है जैसे कि उसी का बेटा गुम हो गया है।
    ‘अळोच’ कहानी में ऐसी ही मां के ममत्व से हम साक्षात करते हैं। ‘समंदर’ कहानी के सुरेन्द्र गुंसाई का ग्यारह वर्ष का बेटा पांच साल पहले कहीं गुम हो गया फिर भी इस दर्द को अंदर छुपाए वे दूसरों की खुशियों को साझा करते हैं। ऐसे पिता की अंतर्वेदना को कहानीकार ने उसी के मुंह से इन शब्दों में व्यक्त कराया है- ‘इतने-से तो हाथ थे, कैसे काम करता होगा साहब?... मर जाता तो संतोष हो जाता, मगर अब दिल को कैसे तसल्ली दें साहब।’
    10 मार्च 1977 को अपने जन्म दिवस को सेलिब्रेट करने कहानीकार सोनी उधारी की बरफी लेकर घर पहुंचे किंतु घर में किसी को उनका जन्मदिन याद नहीं, तब सेलिब्रेट उनकी पत्नी इस उलाहने में करती है- ‘ई तंगी में थांनै ओ खरचो करण री कांई आवड़ी।’ रात को देर तक जगने की ‘बीमारी’ पर नाराजगी जताते हुए वह कहतीं हैं- ‘आधी रात हुगी, आपनै तो जक पड़ै कोनी, औरां नै ई कोनी पड़न द्यै। देखां जद हाथ में किताबड़ी दीखै। जाणै आ ई है आं गै स्सो कीं।’ डायरी शैली में लिखी ‘जलम-दिन’ कहानी में सिर्फ आर्थिक तंगहाली में जूझते एक लेखक-शिक्षक परिवार की मनःस्थिति का ही चित्रण नहीं है, वरन इस सच्चाई से भी दो-चार करवाया गया है कि परिजन ही क्यों, अर्द्धांगिनी भी लेखक के लेखनकर्म को सकारात्मक भाव से नहीं लेती। आत्म बल एवं सृजनात्मक सरोकार ही एक लेखक को लेखन-पठन के लिए प्रेरित करता रहता है। ‘बोतलां’ संस्मराणात्मक शैली की कहानी में समाजिक स्थापनाओं में आर्थिक पक्ष का महत्त्व उजागर किया है। कहानीकार सोनी की कहानियों के चरित्र हमारे आस-पास के हैं। ये सभी चरित्र लंबे समय तक हमारी स्मृतियों में बसे रहते हैं।
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परलीका कहानी के सूत्रधार : सत्यनारायण सोनी
नीरज दइया, बीकानेर     
      चर्चित कहानीकार सत्यनायरण सोनी परलीका कहानी के सूत्रधार इस अर्थ में है कि उन्हें राजस्थानी के प्रख्यात कहानीकार रामस्वरूप किसान अपना गुरु मानते हैं, और वे पूरी परलीका टीम के संवाहक-संवर्धक रहे हैं। मुझे स्मरण आता है कि वे वर्षों पहले किसी कार्यक्रम के सिलसिले में बीकानेर आए थे, तब दो-तीन अपने मित्र लेखकों से मिलवाया, प्रकारांतर में जिनके सामूहिक प्रयासों से ‘परलीका कहानी आंदोलन’ जैसा परिदृश्य प्रकट हुआ। वर्तमान में राजस्थानी कहानी पत्रिका ‘कथेसर’ में सोनी की भूमिका अहम है। वे वर्षों से अपने मित्रों के सृजन को प्रकाशित-प्रचारित करने-करवाने में निश्छलता से लगे हैं, और आज भी वे सक्रिय हैं। संभवतः उनके व्यक्तिगत स्वभाव और जीवन को दूसरे कहानी संग्रह ‘धान-कथावां’ में प्रमुखता से देखा-समझा जा सकता है। यहां यह विगत स्मरण अकारण नहीं है। हम देखते हैं कि ‘घमसाण’ (1995) के पंद्रह वर्षों बाद ‘धान-कथावां’ (2010) का प्रकाशन हुआ है और उसे भी प्रकाशित हुए छह वर्ष बीत चुके हैं। कहना होगा कि डॉ. सत्यनारायण सोनी ने कम कहानियां लिखी हैं और छोटी-छोटी मार्मिक कहानियां लिखी है। यहां ‘कहानियां लिखी है’ पद के स्थान पर यदि लिखा जाए कि उनका जीवन ही कहानियां के बीच रहा है तो अतिशयोक्ति नहीं होगा।
       सत्यनारायण सोनी इन कहानियों में जैसे अपने ही जीवन को पुर्नजीवित होता प्रस्तुत करते हैं। कहानियों में यह उनका सृजित जीवन जैसे फिर-फिर उनका एक समय और स्थिति विशेष में किसी नाटक की भांति स्वयं के विगत समय को सजीव करना हैं। ‘धान-कथावां’ संग्रह में पहली कहानी ‘आ फोटू अठै कियां’  और आखिरी कहानी ‘एक और मुकामो’ में कहानीकार रामस्वरूप किसान को कथा-पात्र के रूप में प्रस्तुत कर जैसे कहानीकार सोनी अपनी कहानियों के आगाज और अंजाम किसानजी को जोड़ देते हैं। वे मुकामो के माध्यम से अपने संभाग के प्रख्यात कहानीकार रामकुमार ओझा का स्मरण कराते हैं। संग्रह की कहानियों में उनके कथामय जीवन की अभिव्यक्ति मिलती है। ‘हर-हीलो’ जैसी कहानियों के अंत में पात्रों की मनःस्थितियां सशक्त ढंग से चित्रित हुई हैं कि उनका स्मरण एक पाठ में हमारे भीतर बस जाता है।
       यहां यह चर्चा आवश्यक है कि राजस्थानी में ‘कहानी’ के लिए ‘कथा’ शब्द को पद के रूप में प्रयुक्त करना अधुनिक संदर्भों में मुझे व्यक्तिशः असंगत जान पड़ता है। क्योंकि इस नाम में जहां व्रत-कथाओं की अनुगूंज है वहीं यह शब्द कहानी और उपन्यास दोनों के संयुक्त आभा मंडल को अभिव्यक्त करता है। ऐसे में संग्रह के नामकरण में बेशक समर्पण पृष्ठ पर ‘तोपूं छूं / सबद-पनीरी / इण पतियारै- / कदै तो निपजैली / धान-कथावां...’ कहानीकार ने लिखा हो, मुझे संकलित कहानियों के आधार पर यह असंगत जान पड़ता है। ऐसा इसलिए भी है कि कहानीकार सत्यनारायण सोनी कहानियों की भाषा और शिल्प के दृष्टिकोण से अपनी पीढ़ी के अन्य कहानीकारों की तुलना में बेहद सजगता से कार्य कर रहे हैं। भाषा और संवादों की सूक्ष्मता स्थितों के चित्रण में इन कहानियों का प्राण है।
       सत्यनारायण सोनी की कहानी कला में बहुत छोटे-छोटे तार्किक संवाद और मर्म को छूने वाली अनेक स्थितियां प्रसंगों के रूप में प्रस्तुत होती हैं। कहानियों में वर्णित स्थितियां कभी उनकी आत्मकथा-अंश तो कभी किसी संस्मरण के सुखद अहसास में इनकी प्रमाणिकता को प्रस्तुत करती हैं। कहानियों में डायरी विधा के प्रयोग के साथ ही रचनाकाल को भी दे दिया गया है। यहां वे एक शिक्षक के रूप में वे राजस्थानी संस्कारों से पोषित करते ऐसे चरित्र के रूप में अपनी कहानियों में उभर कर सामने आते हैं कि अतिशयोक्ति से लगने लगते हैं। कहानी ‘बोतलां’ में देशकाल की सीमाओं में गति करते पात्रों के बीच कहानीकार अपनी पारिवारिक स्थितियों के मध्य एक लेखक के अभावों को प्रस्तुत करता है। ‘समंदर’, ‘अळोच’ आदि संग्रह की अनेक कहानियों में उनका और कहानी के नरेटर का चरित्र बहुधा आदर्श चरित्र के रूप में जहां हमें प्रभावित करता है, वहीं वर्तमान में बदलते समय को पीढ़ियों के अंतराल से देखा जाना इन कहानियों की सीमा है। इन सब के उपरांत ये सभी अगर प्रभावशाली कहानियां अपने जीवन-प्रसंगों में जहां शिक्षा और किसी पाठ को एक धारा में अभिव्यक्त करते हुए कहानीकार के हिसाब-किताब को प्रस्तुत करती है, तो एक उम्मीद दर्शाती है कि कहानीकार बहुत सामान्य स्थितियों में छोटी-छोटी कहानियां ढूंढ़ निकालने की सीमा का त्याग कर कुछ लंबी कहानियां लिखे तो निश्चय ही उनकी और राजस्थानी कहानी की अविस्मरणीय उपलब्धि होगी।
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