मंगलवार, 13 सितंबर 2016

ओम पुरोहित ‘कागद’ का राजस्थानी निबंध संग्रह “सुरंगी संस्कृति” 8

पीडीएफ : सुरंगी संस्कृति (निबंध संग्रह)
पुस्तक : सुरंगी संस्कृति / विधा : निबंध / निबंधकार : ओम पुरोहित ‘कागद’ संस्करण : 2016, प्रथम / पृष्ठ : 96, मूल्य : 150/- प्रकाशक : ऋचा (इंडिया) पब्लिशर्स, बिस्सों का चौक, बीकानेर- 334005 / Download Book
ओम पुरोहित ‘कागद’ (जन्म: 05 जुलाई 1957 ; निधन: 12 अगस्त 2016)
प्रकाशित पुस्‍तकें- अंतस री बळत (1988), कुचरणी (1992), सबद गळगळा (1994), बात तो ही (2002), कुचरण्यां (2002), पंचलडी (2010), आंख भर चितराम (2010) भोत अंधारो है (2016) सभी राजस्थानी कविता-संग्रह। मीठे बोलो की शब्द परी (1986), धूप क्यों छेड़ती है (1986), आदमी नहीं है (1995), थिरकती है तृष्णा (1995), काग़ज़ पर सूरज (2016) सभी हिन्दी कविता-संग्रह।
पुरस्कार और सम्‍मान:- राजस्थान साहित्य अकादमी का ‘आदमी नहीं है’ पर ‘सुधीन्द्र पुरस्कार’, राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर की ओर से ‘बात तो ही’ पर काव्य विधा का गणेशी लाल व्यास ‘उस्ताद’ पुरस्कार, भारतीय कला साहित्य परिषद, भादरा का कवि गोपी कृष्ण ‘दादा’ राजस्थानी पुरस्कार, जिला प्रशासन, हनुमानगढ़ की ओर से कई बार सम्मानित, सरस्वती साहित्यिक संस्था (परलीका) की ओर सम्मानित।  रचनाओं के लिए संपर्क : अंकिता पुरोहित

पुस्तक के ब्लर्ब का अनुवाद :
भाषा, साहित्य और संस्कृति की त्रिवेणी
० डॉ. नीरज दइया, बीकानेर   
प्रख्यात राजस्थानी कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ का दूसरा निबंध संग्रह है ‘सुरंगी संस्कृति’। इस से पूर्व ‘मायड़ भाषा : राजस्थानी’ नामक कृति चर्चित रही है। भाषा-विमर्श के बाद यह संस्कृति-विमर्श कवि कागद के सशक्त सोच को दर्शाता है। भाषा, साहित्य और संस्कृति की त्रिवेणी से समाज का यह पोषण है। इन तीनों का अंतर्संबंध है। जब कोई कवि कविता से गद्य की तरफ आता है तो कई विशेषताओं के साथ आता है। कहा जाता है- ‘गद्यं कवीणां निकषं वदन्ति’, कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ इस कसौटी पर सर्वथा प्रमाणित इसलिए कहे जाएंगे कि संवेदना से परिपूर्ण इन निबंधों की रचना खास मकसद से हुई है। लोग आज जब भाषा, साहित्य और संस्कृति को भूलते जा रहे हैं, ऐसे समय में ऐसे कार्य का महत्त्व कुछ अधिक बढ़ जाता है। यहां यह कहना होगा कि राजस्थानी में साहित्य के अंतर्गत विविध विधाओं में सृजन हुआ है, और निरंतर हो रहा है, परंतु भाषा-संस्कृति का खाना अभी बहुत काम की उम्मीद लगाए है। संस्कृति-विमर्श की बेहद कम पुस्तकों के बीच यह पुस्तक अपना अलग-अलहदा स्थान बनायेगी।
    ‘सुरंगी संस्कृति’ कृति के पीछे यह एक संयोग है कि राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी की मासिक पत्रिका ‘जागती जोत’ के संपादक रहते हुए निबंधकार कागद ने कई संपादकीय लिखे, जिन में कई सामयिक मुद्दों पर विमर्श है। राजस्थानी भाषा, साहित्य और संस्कृति की पैरवी में उस समय लिखे गए संपादकीय असल में अर्थवान दृष्टि देने वाले लघु निबंध थे। मासिक पत्रिका प्रति माह प्रकाशित होती और पुरानी पड़ जाती है। पुस्तक में उन्हें शामिल कर ओम पुरोहित ‘कागद’ ने अपने पाठकों के बहाने जो आवश्यक बातें राजस्थानी समाज से की हैं, वे यहां निबंधों के पाठ में अंतर्निहित है। यहां यह भी कहना होगा कि समय सापेक्ष संपादक के रूप में प्रस्तुत चिंताएं और विमर्श की अर्थपूर्ण टिप्पणियां लेखकीय सजगता का प्रमाण है। समकालीन साहित्य और समाज के इर्द-गिर्द फैली अनेक चिंतनीय समस्याओं पर यह विमर्श है, जो इन समस्याओं से हमारे रू-ब-रू होने से ही संभव है।
    ‘सुरंगी संस्कृति’ कृति के पीछे दूसरा संयोग रहा कि इस पुस्तक में कई निबंध वे हैं जिन्हें ‘दैनिक भास्कर’ के लिए लिखा गया। अखबार के कॉलम में अलग-अलग विषयों पर लिखे गए छोटे-छोटे आलेख यहां निबंध रूप समाहित देख सकते हैं। असल में ये लेखक के विचार-बीज हैं, जो सारगर्भित रूप में हमारे जाने-अनजाने विषयों के बारे में संकेत करते हैं। राजस्थानी संस्कृति और लोक साहित्य से जुड़ी अनेक बातें यहां नए पाठ में देखने को मिलती है।
    ‘सरंगी संस्कृति’ पुस्तक उन लोगों के लिए एक जबाब है, जो अक्सर सवाल करते हैं- संस्कृति का अभिप्राय क्या है? मनुष्य-जीवन में हमने सभ्यता विकास से भौतिक विकास किया। संस्कृति विकास से मानसिक विकास के इस दौर में हम आ पहुंचे हैं। हमारा खान-पान, बोली-भाषा, देवी-देवता, लोक मान्यताएं और रीति-रिवाज सभी सांस्कृतिक रंगों का पोषण करते हैं। साहित्य, संगीत, कला, धर्म-दर्शन, ज्ञान-विज्ञान, शिल्पकला आदि संस्कृति के उज्ज्वल पक्ष माने जाते हैं। प्रत्येक देश की अपनी-अपनी संस्कृति होती है। सार रूप कहें तो मनुष्य जीवन की पहचान ही संस्कृति से ही होती है और ओम पुरोहित ‘कागद’ री यह कृति हमारी इसी पहचान को पुखता कर विकसित करती है।
    ‘सुरंगी संस्कृति’ संग्रह के सभी निबंध देखने में चाहे किसी कविता या लघुकथा जैसे छोटे-छोटे लगते हों, परंतु ये सभी अपनी बात कहने में परिपूर्ण और पर्याप्त हैं। यह कहना कोई नवीन तथ्य नहीं होगा कि इन निबंधों में लेखक ने काव्यात्मक-भाषा का प्रयोग किया है। लेखक कवि है और भाषा-प्रयोग, वर्तनी के प्रति सजग है। छोटी-छोटी पंक्तियों में धैयपूर्वक विषय पर काव्यात्मकता के साथ आगे बढ़ना लेखकीय कौशल है। इस कृति के मूर्त होने से पूर्व यदि हम लेखकीय जीवन का जायजा लें तो पता चलेगा कि राजस्थान के सुदूर जिलों के गांवों-अंचलों में पहुंच कर लेखक वर्षों लोकजीवन के अध्येता रहे हैं। ठेठ ग्रामीण जीवन और ग्रामीणों में प्रचलित संस्कारों और रीति-रिवाजों की पुखता और पक्की जाणकारी से इस कृति के विवरण प्रामाणिक बन पड़े हैं।
    ‘सुरंगी संस्कृति’ संग्रह में संस्कृति की बहुत सारी भंगिमाएं विमर्श और चर्चा के रूप में समाहित है, जिन्हें आज की दौड़ती-भागती जिंदगी में हमने भूला दिया है। यह भी संभव है कि कुछ बातों और दृष्टिकोणों से हमारे विचार भिन्न हों। कई विषयों और अवधारणाओं को लेकर समाज में असमंजस और विरोधाभास की बातें रहा करती हैं। विमर्श का गहरे अर्थों में अभिप्राय किसी विषय के प्रति इस प्रकार की चर्चा का आगाज भी होता है, अस्तु यह पुस्तक की सफलता कही जाएगी। हमारे ध्यान से परे छूटते कई संग्रहणीय उदाहरण यहां देखकर हम हर्षित और गर्वित होते हैं। अंत में यदि एक पंक्ति में कहना हो तो- हमारे सांस्कृतिक-सामाजिक मूल्यों, रीति-रिवाजों, त्यौहारों, परंपराओं और संस्कारों का निबंधों के रूप में यश्स्वी संरक्षण हुआ है।
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संस्कृति-रक्षा के लिए सचेत करती पुस्तक
० दीनदयाल शर्मा, हनुमानगढ़

ओम पुरोहित ‘कागद’ का नाम किसी परिचय को मोहताज नहीं है। आप हिन्दी और राजस्थानी के ख्यातनाम कवि हैं, लेकिन साहित्य की अन्य विधाओं पर भी आपने कलम चलाई है। यथा कहानी, निबंध, नाटक और बाल साहित्य। हाल ही में आपकी राजस्थानी निबंध संग्रह कृति ‘सुरंगी संस्कृति’ प्रकाशित हुई है, जिसमें 34 निबंध संग्रहीत हैं। निबंध की शुरुआत में आपने मायड़ भाषा राजस्थानी की मान्यता को लेकर हम सबके सामने सवाल खड़ा किया है कि भाषा जिन्दा रहेगी तो हमारी संस्कृति जीवित रहेगी और भाषा तभी जीवित रहेगी जबकि सरकार उसे मान्यता दे। कागद ने मायड़ भाषा राजस्थानी को मान्यता न मिलने का मूल कारण राजस्थान के बाहरी लोगों को बताया है, जो अधिक तादाद में हैं और इसकी मान्यता में अवरोध पैदा करते हैं। चूंकि लोकतंत्र में बहुमत को ही महत्त्व दिया जाता है।
    कागद जी ने अपने निबंधों में मायड़ भाषा राजस्थानी, राजस्थानी साहित्य की विविधता में कमी और खत्म हो रही संस्कृति की चिंता करते हुए सवाल खड़ा किया है। उनका कहना है कि केवल राजस्थानी ही नहीं बल्कि राष्ट्रभाषा हिन्दी भी दम तोड़ती नज़र आ रही है। देश में देशी-विदेशी चैनल, कान्वेंट स्कूल, वोट की राजनीति, पश्चिमी संस्कृति के अंधभक्त देशी लोग संस्कृति को खत्म करने में लगे हुए हैं।
    इसके अलावा कृति ‘सुरंगी संस्कृति’ में राजस्थान के तीज त्योहार गणगौर, आखातीज, सीतळा अष्टमी, आखाबीज, रक्षा बंधन, वसंत पंचमी और नवरात्रा आदि को लेकर सटीक उदाहरणों सहित बहुत ही सरल ढंग से प्रस्तुत किए हैं। श्री कागद ने  निबंध संग्रह में अनेक अनछुए पहलू भी बहुत ही रोचक ढंग से परोसे हैं। जिनमें वीर बहुटी, अजब-गजब सवाल आदि प्रमुख है।
    ओम पुरोहित ‘कागद’ ने सभी निबंध भले ही छोटे कलेवर में प्रस्तुत किए हैं लेकिन ये निबंध में अपने आप में बेजोड़ हैं। आपने अपने इन निबंधों के माध्यम से हमें बहुत बड़े सांस्कृतिक संकट की ओर इशारा करते हुए सचेत भी किया है कि यदि हम अब भी नहीं संभले तो हमारी भाषा, साहित्य और संस्कृति सभी अंधेरे की गर्त में गुम हो जाएंगे। फिर इनके बिना हमारा भी कोई अस्तित्व नहीं रहेगा। हमारे अस्तित्व हो बचाने के लिए जरूरी है कि हम अपनी संस्कृति को बचाएं।
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सुरंगी संस्कृति के संवाहक कागद जी
डॉ. गोपाल राजगोपाल, उदयपुर

ओम पुरोहित 'कागद' राजस्थानी के वरिष्ठ साहित्यकार होने के साथ एक प्रखर इन्सान भी थे। उनके नाम के साथ 'थे' लिखना अथवा उच्चारित करना बहुत ही मुश्किल कार्य है। उनकी उम्र अधिक नहीं थी। इतनी सी कम उम्र में वे विपुल साहित्य रच गये और राजस्थान तथा राजस्थानी की अकूत सेवा कर गए जिसका वर्णन आने वाला समय करेगा।
    'सुरंगी-संस्कृति' में चौंतीस निबंध हैं। राजस्थान की संस्कृति को उजागर करते लेख उनकी इस पीड़ा को भी दर्शाते हैं कि राजस्थानी भाषा को वह स्थान नहीं मिला जिसकी वह हकदार रही है। सबसे अधिक बोलियां (तिहत्तर) यदि किसी भाषा में है तो वह राजस्थानी ही है। इतने विस्तृत क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा उपेक्षित रहे, यह उन्हें स्वीकार नहीं था। अपने विचारों व लेखन से वे यही प्रयास करते रहे कि इस भाषा को राजकीय मान्यता प्राप्त हो। पुस्तक के प्रारंभिक लेखों में गहराई से इस दर्द को व्याख्यायित किया गया है। राजस्थानी शब्द कोश विश्व का सबसे समृद्ध कोश है, जिसमें एक-एक शब्द के अनगिनत अर्थ बताये गये हैं।
    कागद जी के मन में यह टीस भी रही है कि दिनोंदिन राजस्थानी भाषा के शब्दों का लोप होता जा रहा है। वे वार्तालाप एवं लेखन से दूर होते जा रहे हैं। 'ण' का स्थान 'न' और 'ळ' का स्थान 'ल' लेता जा रहा है। वे कहते हैं बोलियां तो मनके की तरह हैं, और भाषा माला की तरह। भाषा के उन्नयन में बोलियों का योगदान ही प्रमुख होता है। बोलियों के मूल स्वरूप को जीवित रखा जाये तो भाषा स्वतः ही अपने मुकाम पर काबिज हो जायेगी।
    भाषा के साथ संस्कृति का प्रवाह निरन्तर होता रहता है। कागद जी राजस्थान के सभी तीज-त्योहारों का विस्तार से वर्णन करते हैं, यहां के लोकगीतों में बसी मिठास का रसास्वादन कराते हैं। वे यहां के साहित्यकारों को नहीं भूलते जिन्होंने भाषा के मूल रूप को अक्षुण्ण रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। इन साहित्यकारों में कन्हैयालाल सेठिया, सूर्य मल्ल मीसण, धोकळ सिंह चरला, चन्द्र सिंह बिरकाळी आदि प्रमुख हैं।
    ऐसा नहीं है कि वे नवाचार नहीं चाहते। वे चाहते हैं कि राजस्थान का समग्र विकास हो। कृषि में हरित-क्रान्ति को कण-कण तक पहुंचाना चाहते हैं, वहीं नई तकनीकी-क्रान्ति को हृदय में बसाना चाहते हैं। वे सभी नई चीजें चाहते हैं किन्तु अपनी मायड़ भाषा में। वे लिखते हैं- कागद लिख-लिख मैं थकी, नीं आया भरतार।/ थारे कैयां आवसी, बादळ दे समचार।। यहां 'भरतार' शब्द का आशय राजस्थानी की मान्यता से है, ऐसा मेरा मानना है। यहां के निवासियों को 'बादळ' की उपमा देकर चाहना व्यक्त की गई है कि 'बादळ' चाहेगा तो भरतार अवश्यमेव आयेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है।
    यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि सुरंगी संस्कृति जो राजस्थान की विलक्षणता रही है, वह पुस्तकाकार में भी अपनी पहचान कायम रखेगी। कृति से 'सुरंगी-संस्कृति' का जन-जन में अधिक प्रचार प्रसार होगा। यह सुरंगी संस्कृति पूरे राजस्थान में बसी रहे, राजस्थान इससे सजता रहे और यह हमारी पहचान अमिट रहे।
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कागद के ब्रह्म-लोक का लोक-रंग
० मोहन थानवी, बीकानेर
    
राजस्थानी भाषा, साहित्य, कला-संस्कृति के क्षेत्र में वरिष्ठ साहित्यकार ओम पुरोहित ‘कागद’ राजस्थानी भाषा के विद्यार्थियों के मार्गदर्शक के रूप में सदैव हमारे बीच याद किए जाते रहेंगे। उनकी कृतियों में राजस्थानी भाषा की खुशबू पाठकों को मंत्र-मुग्ध करती है। ‘सुरंगी संस्कृति’ निबंध संग्रह ऐसी ही कृति है, जिसमें कागद के लोक-संस्कृति-संरक्षण के प्रति संरक्षण का भाव तो प्रकट होता ही है, इसके लिए भावी पीढ़ी से उनकी अपेक्षाएं भी परिलक्षित होती है। ओम पुरोहित ‘कागद’ राजस्थानी ही नहीं वरन् पंजाबी, गुजराती, सिंधी आदि सभी प्रादेशिक भाषाओं के विकास के प्रति सजग रहे, संवेदनशील रहे। संयोग की बात है कि कागद ऐसे परिवार के सदस्य रहे जहां भाषा, साहित्य, कला के संवर्धन के लिए जुट जाने की शिक्षा घुट्टी में पिलाई जाती है। जहां शब्द को ब्रह्म की तरह पूजा जाता है। ‘सुरंगी संस्कृति’ में एक ओर जहां लोक-रंग समाहित हैं, वहीं लोक प्रचलन से दूर होते जा रहे वे शब्द भी खिले हुए हैं जिनका वजूद बनाए रखने की अपील कागद जी युवा पीढ़ी से जीवन पर्यंत करते रहे।
    ‘सुरंगी संस्कृति’ कृति की विशेषता में केवल एक मुख्य बिंदु को यहां साझा करता हूं  और मेरा मानना है कि इस एक बिंदु पर ही मंथन करेंगे तो अनेक घटक हमारे मन में आते चले जाएंगे। अप-संस्कृति का खतरनाक पसराव विषय इस पुस्तक की केंद्रीय चिंता और भाव-भूमि कही जा सकती है। ओम पुरोहित ‘कागद’ कृति में इसी शीर्षक से ब्रह्म-लोक, अर्थात शब्द संसार के लोकरंगों के धूमिल होते स्वरूप पर चिंता जताते हैं, कारण गिनाते हैं, सुधार की आशा व्यक्त करते हैं और न केवल सुझाव देते हैं वरन् शब्द-ब्रह्म लोक और लोक रंग के प्रति लापरवाही बरतने व इस लोक की अनदेखी करने की प्रवृत्ति वाले लोगों की भरसक भर्त्सना करते हुए राजस्थानी भाषा के विकास में जुट जाने का आह्वान भी करते हैं। यहीं पर कागद का लोक संस्कृति के प्रति लगाव प्रकट होकर पाठकों के सम्मुख आ जाता है।
    इस कृति में राजस्थान की रंगारंग लोक जीवन शैली, आम बोलचाल के शब्द, कहावतों, मुहावरों सहित वे तमाम जीवन के चित्र पुस्तक में देखने को मिलते हैं, जो राजस्थानी संस्कृति को समाहित करती ऐसी अन्यान्य रचनाकारों की कृतियों में हम पढ़ सकते हैं लेकिन विषयों को विभाजित कर जिस लोक रुचि की शैली में कागद जी ने इसे प्रस्तुत किया है, ऐसी शैली विद्यार्थियों को इस कृति के प्रत्येक पाठ को स्मृति में रखने की प्रेरणा देती है।
    राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता के लिए ओम पुरोहित ‘कागद’ ने पुरोधा बन कर अथक परिश्रम किया और इस कृति में भी इस यक्ष प्रश्न को रखा है - ‘मानता बिना अबोला’। इसके साथ ही कागद ने ‘कवि भूंगर नै रंग’ के माध्यम से कवि भूंगर की लोक रंग में रंगी छवि उकेरी है, कवि भूंगर काव्य के परंपरागत रचाव से हटकर अपनी बात कहते थे।
    ‘सावण री डोकरी’ के बारे में तो ओम पुरोहित ‘कागद’ ने सोशल मीडिया पर भी चर्चा चलाई थी, जिसमें बहुत से साथियों के साथ मैं भी शामिल हुआ था। लेकिन ‘सुरंगी संस्कृति’ कृति में कागद ने सावन की डोकरी के राजस्थानी रूप के अलावा देश-विदेश में प्रचलित स्वरूपों को भी सामने रखा है। ऐसी ही विशेषताओं के कारण ओम पुरोहित ‘कागद’ की यह कृति ‘सुरंगी संस्कृति’, इस विषय पर लिखी अन्यान्य कृतियों से इतर अपना खास स्थान बनाती है।
    इस निबंध संग्रह को शिक्षा विभाग द्वारा पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाना राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के विद्यार्थियों के लिए हितकर होगा। अप-संस्कृति के बढ़ते दौर में इस कृति का प्रत्येक पुस्तकालय, वाचनालय में होना भी आज की आवश्यकता है। जरूरत आज इस बात की है कि इस प्रकार की कृतियों का अधिकाधिक प्रचार-प्रसार होना चाहिए, यह समय रहते समाज को सजग करने की दिशा में कागद जी का अवदान ही नहीं अविस्मरणीय कदम है, वे कवि के साथ ही भाषा और संस्कृति के विमर्शकार के रूप में पहचाने जाएंगे।
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भाषा, साहित्य और संस्कृति का सुन्दर समन्वय
० डॉ. महेन्द्र मील, सीकर
   
       राजस्थानी के वरिष्ठ रचनाकार ओम पुरोहित ‘कागद’ का स्मरण आते ही हृदय गळगळा हो जाता है। अब उनका सृजन ही हमारे सम्मुख है। राजस्थानी भाषा, साहित्य और संस्कृति के समर्थ पैरोकार स्व. ओम पुरोहित ‘कागद’ की सद्य-प्रकाशित पुस्तक ‘सुरंगी संस्कृति’ संस्कृति-विमर्श का सुन्दर स्वरूप हमारे सम्मुख प्रस्तुत करती है। ‘सुरंगी संस्कृति’ में सुरंगी का अर्थ है सुन्दर रंगों वाली और संस्कृति का अर्थ है संस्कारित करने वाली जीवन जीने की रीति। पुस्तक में सम्मिलित समस्त निबंध ऐसे विचार बीज हैं,  सांस्कृतिक सूत्र हैं जिनके माध्यम से रचनाकार पाठकों में श्रेष्ठ संस्कारों का संचार करते हैं।
         पुस्तक में 24 निबंध संग्रहीत हैं। इनमें से कुछ निबंध ‘जागती जोत’ के सम्पादकीय हैं तो कुछ समाचार पत्रों के स्तम्भ आलेख। अधिकांश निबंध विविध पत्र-पत्रिकाओं में पूर्व में प्रकाशित हो चुके हैं। पुस्तक के प्रारम्भ में राजस्थानी भाषा से जुड़े विविध मुद्दों पर तर्क संगत विचार करते हुए राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता की पुरजोर पैरवी की गई है। यहाँ राजस्थानी भाषा से जुड़े कई प्रश्न हैं तो उनके प्रत्युत्तर भी हैं।
        आज के भूमंडलीकरण के दौर में लेखक अपनी भाषा और संस्कृति को बचाने का आह्वान करता है। आगे साहित्य और संस्कृति पर विचारात्मक निबंध हैं जिन में अपसंस्कृति के वर्तमान दौर में लेखकीय चिन्ताओं के साथ साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्कारों के परिष्कार का पुरजोर समर्थन है। यहाँ चिंतन की सांगोपांग पगडंडियों पर चलने की जरूरत महसूस की गई है। अभी आता है पुस्तक का प्रमुख भाग जिस में राजस्थानी लोक-संस्कृति का विविध आयामी सुरंगा स्वरूप साकार हुआ है।
        राजस्थान की संस्कृति तीज-त्योंहारों की संस्कृति है। यहाँ त्योंहारों-उत्सवों की एक ऐसी अटूट शृंखला है जो अपनी लोक-संस्कृति का सांगोपांग स्वरूप प्रस्तुत करती है। यहाँ नवरात्रि में पूजित नव देवियाँ साकार हैं तो लोक देवी स्यावड़ माता सदैव सहायता के लिए उपस्थित रहती हैं। होली की लूर-गैर, गणगौर पूजा, बसंत पंचमी, रक्षा बंधन, लौहड़ी, अक्षय तृतीया जैसे लोकोत्सव हमारी लोक-संस्कृति को अक्षय रखने में समर्थ हैं। मरुधर की महिमा निराली है। चौमासा (वर्षा-ऋतु) तो मरु भूमि का एक ऐसा महोत्सव है जिसमें इस मिट्टी का कण-कण आह्लादित हो जाता है। इसी तरह के लोक-संस्कृति के रंगों के साथ कवि भूंगर के ‘घेसले’ इस रंग को सवाया करते हैं। संस्कृति का फलक बहुत विस्तार लिए होता है। संस्कृति के सभी पक्षों का समावेश यहाँ हुआ है, यह तो नहीं कह सकते। लेकिन यह स्पष्ट है कि जितना हुआ है सांगोपांग हुआ है, सार रूप में हुआ है।
        इस पुस्तक में राजस्थानी भाषा और संस्कृति के ऐसे सूत्र उपलब्ध हैं जो अन्यत्र दुर्लभ हैं। इस संग्रह के निबंध अपने विषय के गंभीर और चिंतनशील रूप-स्वरूप केबल पर अपना अलग ही बिम्ब प्रकट करते हैं। राजस्थानी की आत्मा इस में समाई हुई है। प्रामाणिक जानकारी और मौलिक विचारों से रचनाकार का ज्ञान और अनुभव साम्प्रत होता है। छोटे-छोटे काव्यात्मक वाक्य और भाषा की कसावट इन निबंधों के प्रभाव को द्विगुणित कर देते हैं। राजस्थानी की संस्कृति के लोकस्वरूप को समझने में ये निबंध सहायक हैं। इन निबंधों में अपनी लोक-संस्कृति की सनातन दृष्टि के साथ आज के परिवेश में सांस्कृतिक विचलन के प्रति चिंता प्रकट की गई है। आज के दौर में अपनी भाषा, साहित्य और संस्कृति लोगों द्वारा उदासीनता का दंश झेल रही है ऐसे में इस पुस्तक का महत्त्व और भी बढ़ जाता है।
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भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के व्यापक सरोकारों का पुष्पहार
० राजू सारसर ‘राज’, किशनपुरा (दिखनादा) हनुमानगढ़

      ‘सुरंगी संस्कृति’, राजस्थानी-हिन्दी भाषा एवं साहित्य के मर्मज्ञ मनीषी ओम पुरोहित 'कागद' का दूसरा निबंध संग्रह है। इनका प्रथम निबंध संग्रह ‘मायड़ भासा राजस्थानी’ भाषा-विमर्श को लेकर सामने आया, जिसकी साहित्य-जगत के साथ-साथ पाठक-वृंद में भी खूब चर्चा हुई और बहुत बड़े स्तर पर स्वागत किया गया।
      ओम पुरोहित ‘कागद’ मूलतः कवि रहे हैं तो उनकी काव्यात्मक भाषा का प्रभाव उनके निबंधों में परिलक्षित होना स्वाभाविक ही नहीं अवश्यंभावी है, सुरंगी संस्कृति निबंध संग्रह में भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है और निबंधों की इस काव्यात्मक भाषा-शैली ने उनके निबंधों के आनन्द को द्विगुणित भी कर दिया है। गद्य में भी पद्य की आनन्दानुभूति।
       सद्य प्रकाशित निबंध संग्रह का शीषर्क भले ही ‘सुरंगी संस्कृति’ है परन्तु संग्रह इससे भी वृहद स्तर का है, जो ना केवल सांस्कृतिक-विमर्श की बात करता है बल्कि भाषा, कला, साहित्य, समाज आदि के समस्त पहलुओं को अपने में समेटे है। यह एक ऐसा गुलदस्ता है जिसमें सभी तरह के पुष्प और सुगन्ध समाहित है।
       संग्रह को पढ़ते हुए निबंधकार के गहन अध्ययन-अनुशीलन, व्यापक अनुभव, चिन्तन की गहराई और सोच के विशाल धरातल से साक्षात्कार होता है। निबंध संग्रह की भाषा में सहजता, सरलता व बोधगम्यता का विशेष गुण देखा जा सकता है। ऐसी भाषा पाठक को स्वयं जोड़ लेती है, यह निबंधकार के अद्वितीय रचना-कौशल से संभव हो सका है।
        संख्या में 34 छोटे-छोटे किंतु सार-गर्भित निबंधो के इस संग्रह के प्रथम निबंध से ही भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के क्षरण की जो पीड़ निबंधकार ने भोगी है, वह प्रकट होने लगती है। राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता का दर्द तो है। साथ ही उसके विकास एवं आधुनिकता के नाम पर किए जा रहे खिलवाड़ से पनपी खिन्नता भी प्रकाश में आती है। भाषा, साहित्य एवं संस्कृति पर विभिन्न स्तरों पर उठे सवालों के जबाव बहुत ही तार्किक देते हुए निबंधकार ने स्पष्ट किया है कि क्यों राजस्थानीं भाषा, साहित्य एवं संस्कृति विश्व में सिरमोर मानी जाती है, प्रश्न चाहे भाषा की एकता का हो या फिर संस्कृति के स्वरूप सभी में विशद अध्ययन और अनुभव देखा जा सकता है।

       यहाँ के मेलों-ठलों लोक देवी-देवताओं, मान्यताओं, परम्पराओं, त्याग-तप और बलिदान की भावनाओं, गीत-गालियों, इतिहास, रीति-रिवाजों, खानपान, पहनावे, रहन-सहन, जीवटता, चौपाल की हथाइयों, लोक आख्यानों, गहने-गांठों के साथ ही राजस्थानी स्त्री-पुरूषों के प्रेममय त्याग या अदम्य साहस, अटूट धैर्य जैसे गुण आदि की खूब चर्चा निबंध संग्रह में विस्तारपूर्वक हुई है। सामाजिक-सांस्कृतिक-आध्यात्मिक-पौराणिक और वैज्ञानिक महत्व को स्पष्ट करते हुए निबंधकार ने व्यापक और विशाल केनवास में लोकजीवन का बहुत सुस्पष्ट चित्र प्रस्तुत किया है।
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राजस्थान और राजस्थानी का सांगोपांग वर्णन
० डॉ. कृष्णकुमार ‘आशु’, श्रीगंगानगर

    राजस्थान रंग-बिरंगी संस्कृति का प्रतीक है। यहां की परम्पराएं, रीति-रिवाज, पर्व-त्यौहार और यहां के स्थानीय देवी-देवताओं की लोक कथाओं में इतने रंग हैं कि यहां कदम-कदम पर एक अलग ही छटा नजर आती है। परंतु दुर्भाग्य यह है कि राजस्थानी संस्कृति को उजागर करने वाले साहित्य पर बहुत कम लोगों ने काम किया। लिहाजा देश-विदेश के लोग इसकी गहराई को ज्यादा नहीं जान पाए। परंतु जिन साहित्यकारों ने भले कम ही सही, राजस्थानी संस्कृति पर कलम चलाई है, उससे उन्हें और राजस्थानी संस्कृति दोनों को लाभ हुआ है।
    पुस्तक से लेखक ओम पुरोहित ‘कागद’ के विराट व्यक्तित्व का पता चलता है। यह भी अहसास होता है कि राजस्थानी संस्कृति से उन्हें कितना लगाव था और वे इससे कितनी गहराई से जुड़े हुए थे।
आलोच्य पुस्तक में कागद ने छोटे-छोटे कुल चौंतीस राजस्थानी निबंध संगृहीत किए हैं। ये निबंध जहां राजस्थानी भाषा की विशेषता बताते हुए इसे अब तक मान्यता नहीं मिलने की पीड़ा जताते हैं, वहीं राजस्थानी संस्कृति में जीवन के चित्र भी उकेरते हैं। तेजी से फैलते पाश्चात्य संस्कृति के खतरों से आगाह करते हैं तो धार्मिक आस्थाओं से जोड़ते हुए यहां के लोकपर्वों की महत्ता भी बताते हैं।
    ओम पुरोहित कागद की लेखनी की यह विशेषता है कि वे सरस और सरल  शब्दावली का उपयोग करते हुए आम पाठक से उसी की भाषा में संवाद करते हैं। यही कारण है कि संग्रह के पहले पांच निबंध राजस्थानी भाषा पर केंद्रीत हैं। इनमें कागद बताते हैं कि राजस्थानी भाषा कितनी प्राचीन और समृद्ध हैं। यहां की बोलियां इसकी कमजोरी नहीं, अपितु ताकत हैं। ‘संस्कृति में जीवण रा चित्तराम’ राजस्थानी संस्कृति के विविध रंगों को साक्षात् पाठकों के समक्ष सजीव कर देता है।
    इस समय देश में पश्चिमी बयार चल रही है। राजस्थान भी इससे अछूता नहीं है। इस अपसंस्कृति का शिकार होकर राजस्थान के पंजाब की राह पर चलने और भारत के आस्ट्रेलिया होने के खतरों से सचेत करते कागद पंजाब अथवा आस्ट्रेलिया को बुरा नही बताते। वे तो समय रहते अपनी संस्कृति को बचाने, उसके संरक्षण और संवद्र्धन की बात कहते हैं।
    समाज, साहित्य और संस्कार की बात करने वाले कागद राजस्थानी लेखकों से भी भाईचारे को बढ़ावा देने वाले, समाजहित की बात करने वाले लेखन को प्रोत्साहित करने का आग्रह करते हैं। सनातन और अधुनातन युग में अंतर की विवेचना करते हुए वे आज के मनुष्य को दृष्टि आधुनिक रखने के साथ सनातन मूल्यों को बनाए रखने की सलाह भी देते हैं।
    पुस्तक में धार्मिक रीति-रिवाजों और लोक पर्वों को लेकर महत्वपूर्ण काम हुआ है। कागद ‘सदा भवानी दाहिनी’ निबंध में आदि शक्ति की महिमा का वर्णन करते हैं तो वहीं प्रदेश के देवी मंदिरों की जानकारी भी देते हैं। नवरात्रों में होने वाली नौ देवियों की पूजा का विस्तृत विवरण पुस्तक में पाठकों को खुद उसकी भाषा में मिल जाता है। देवों के देव महादेव अर्थात भोले शंकर की बात हो अथवा राजस्थान की लोकदेवी स्यावड़ माता, गणगौर पूजा हो अथवा पंजाब के रास्ते उत्तर-पश्चिम राजस्थान के घर-घर में पूजी जाने वाली लोहड़ी माई, सबको ध्याते हुए कागद इनकी पूरी गाथा अत्यंत संक्षेप में पाठक के समक्ष रखते हैं तो लगता है, जैसे गागर में सागर भर दिया गया हो।
    होली से पूर्व होने वाली धमाल, होली पर गैर रमने की बात, वसंत पंचमी का मदमाता पर्व, बरसाती मौसम के चार महीने यानी चौमासे के पर्व, आखातीज और भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का त्योहार रक्षा बंधन। कागद ने इन सभी का सांगोपांग वर्णन किया है। पुस्तक की विशेषता है कि यह प्रारंभ से अंत तक पाठक को बांधे रखने में सफल रहती है। यह लेखक की कलम में विराजित प्रसाद गुण के कारण संभव हो पाया है। आवरण राजस्थानी लोकसंस्कृति का प्रतीक होकर प्रभावित करता है। पुस्तक आम आदमी के दिल और घर में जगह बनाएगी, यह मेरा विश्वास है।
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राजस्थानी का स्वाभिमान जगाने वाली कृति 
० हरीश बी. शर्मा, बीकानेर
     अपनी संस्कृति से विमुख हो रही पीढ़ी के लिए ‘सुरंगी-संस्कृति’  को एक ऐसा ग्रंथ कहा जा सकता है जो किसी भी हताश-निराश राजस्थानी मन के स्वाभिमान को जगा सकता है। निबंधकार स्व. ओम पुरोहित कागद ने इस में राजस्थान के नीति-ज्ञान-विज्ञान, धर्म-अध्यात्म-दर्शन, खेती-व्यापार-रोजगार, समाज-रिश्ते-परिवार, रीत-लोकाचार-परंपरा आदि के संबंध में इतनी जानकारियां जुटाई हैं कि एकबारगी ऐसा लगता है कि हमारी पुरातन सभ्यता का कोई सानी ही नहीं है और ठीक इसी वक्त एक सवाल कौंधता है कि आखिर क्या कारण है हमारी राजस्थानी भाषा, साहित्य और संस्कृति के विलोपन के कारण हम ही बनते नजर आ रहे है?  यह निबंध संग्रह निबंधकार के व्यापक अनुभव का फलक प्रमाण है। यहां जीव-विज्ञान से लोकसाहित्य तक की यात्रा करते हुए ‘सावण री डोकरी : बूढ़ी माई’ जैसे लोक संदर्भ हैं। इन निबंधों की सजीव भाषा और पाठ का जादू है कि हमारे सामने बारिश के दिनों में मखमली ममोलिये आ जाते हैं तो दूसरी तरफ खेजड़ी को बचाने की भी वकालत करते कुछ चित्र-स्थितियां-संदर्भ उपस्थित होते हैं।
    यह जानकर हैरत तो होगी कि प्रतियोगी-परीक्षाओं में पूछे जाने वाले अनेक मानसिक योग्यता के प्रश्नों से भी अधिक कठिन प्रश्नों को पूछने का प्रचलन लोक व्यवहार के हंसी-ठट्ठों में मिलता है। उदाहरण के लिए- चलते ही पूछ लिया जाता कि बताइये एक घर में जंवाई आए। रात को सोने का वक्त आया तो एक खाट कम पड़ गई। स्थिति यह एक खाट पर दो-दो जंवाइयों को सुला दिया जाए तो एक खाट ज्यादा हो और अलग-अलग खाट दी जाए तो एक जंवाई ज्यादा,  बताइए वहां कितनी खाटें थी?
    दूसरा उदाहरण- एक सौदागर की पत्नी को हार पसंद नहीं आया, उसने गुस्से में उसे फेंक दिया। अब देखिए कि आधे मोती हार में अटक गए। पंद्रह सेज पर। गोद में गिर गए चालीस। पल्ले में सवायै रहे। तीसरा हिस्सा जमीन पर गिरा। हिस्सा नौ का पता नहीं चला। बताइये कितने मोती थे?
    प्रमुख सवाल यह है कि अगर हम हमारी संस्कृति से दूर होते रहे तो हमारी सांस्कृतिक जड़े और ऐसी विविधता पूर्ण धरोहर का क्या होगा? पहले जब रियासत काल में शिक्षण का माध्यम राजस्थानी थी, तब भाषा और संस्कृति सुरक्षित थी, आज यह सब बीतता जा रहा है और प्रकारांतर से हमारे बीच में दूसरे-दूसरे रास्तों से अपसंस्कृति फैलती जा रही है।
    संग्रह के चौतीस निबंधों में बहुत संक्षेप में ऐसी अनेक छोटी-छोटी जानकारियों को अनुपन खजाना के रूप में सहेजा गया है कि इसका प्रत्येक अध्याय स्वतंत्र-शोध की गुंजाइश रखता है। हमारी विशाल संस्कृति और भाषा के समृद्ध भंडार में ऐसी अनेक बातें हैं जिनकी जानकारी हमी होनी चाहिए।
    संग्रह में राजस्थान के देवी मंदिरों की जानकारी है तो कृषि कार्य की देवी के रूप में स्यावड़ माता का जिक्र भी है। डाभ से स्यावड़ माता को बनाना और फिर उसे धान की ढिगली में रख देना और फिर धान निकालने की एक पूरी प्रक्रिया का हवाला देते हुए निबंधकार ने गहन अध्ययन और अनुभव के साथ लोक का अभिन्न घटक होने का परिचय दिया है। हमारी लुप्त होती ऐसी अनेक लोक-परंपराओं का यह अध्याय है। इसके अध्यायों में हमारी संस्कृति के पन्ने जैसे-जैसे खुलते हैं, लगता है कि बहुत कुछ जानने से हम रह गए थे जो इस निबंध संग्रह से मिला है।
    वस्तुत: ‘सुरंगी संस्कृति’ एक ऐसा सोपान है, जिसे हर राजस्थानी को पाना चाहिए। इसे पढऩे का बाद यह समझ आ जाएगा कि हमारी इस धरा के लिए महाकवि सेठिया जी ने यह क्यों कहा- “इण पर देव रमण नै आवै, इण रो जस नर-नारी गावै, आ तो सुरगां नै सरमावै...धरती धोरां री।”
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सांस्कृतिक धरोहर को संभालना और सहेजना
० मनोज पुरोहित ‘अनंत’, हनुमानगढ़

    आज के युग में संस्कृति और संस्कार से विमुख और कटती युवा-पीढ़ी के लिए ‘सुरंगी संस्कृति’ का पाठ अनिवार्य है। राजस्थान के रीति-रिवाज, तीज-त्योहार, परंपराएं-संस्कार और इन सब के बीच हमारी राजस्थानी मातृ-भाषा। जो हमें अपनों से जोड़ती है। कब, कैसे और क्यों की जरूरत समझाती है। बदलते समय में इन सबको कैसे बचाए रखना है। इसका सूक्षम और विस्तृत आगार है निबंध संग्रह-  ‘सुरंगी संस्कृति’।
    कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ के छोटे-छोटे निबंध अपने आप में बड़ी-बड़ी कहानियां कहते हैं। वास्तव में यह निबंध संस्कृति और संस्कार से कट रही युवा पीढ़ी को देखकर लिखी गई पीड़ाओं का दस्तावेज है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है संग्रह के आरंभ में राजस्थानी भाषा की मान्यता को लेकर व्यक्त की गई चिंताएं। हम हमारी भाषा के लिए जूझ रहे हैँ। भाषा को बचाने के लिए बोलियों की माला को स्वीकारना होगा। प्रत्येक निबंध संस्कृति को जानने के लिए पाठकों को उकसाता है और सतर्क रहने की बात भी कहता है। विशेषतः युवा पीढ़ी को।
    आज की युवा पीढ़ी नहीं जानती ‘बूढ़ी माई’ कौन है? आखा-बीज? नाली-बेल्ट क्या है? आदि-आदि। इस पुस्तक के हर निबंध में पठनीयता है। संग्रह में नवरात्र पर लिखे गए नौ देवियों के रूप दैनिक भास्कर समाचार पत्र में लगातार नौ दिन तक प्रकाशित हो चुके हैं। जो आज के समय में बेहद प्रासंगिक है। इसके अलावा हर त्योहार को मनाने का एक सलीका। किस जगह कौनसा गीत गाया जाए? समाज और परिवार में रिश्तों का क्या मूल्य है? जैसे, अनेक ऐसे विषय हैं जो हर वर्ग के लिए रुचिकर और उपयोगी हैं। कागद के लेखन में खास बात ये है कि ये सारे आलेख छोटी-छोटी बातों-प्रसंगों से निकलकर आए हैं, जिनकी चर्चा हर घर में होती है। ऐसे में राजस्थानी उत्सवों की महक घर-घर तक पहुंचेगी। इस सांस्कृति धरोहर को लेखन में संजोने का कारण लेखका ग्रामीन जन-जीवन से जुड़ाव रहा है। हमारे गांव जहां संस्कृति बसती है। उत्सव मनाए जाते हैं। लोक गीत गाए जाते हैं। स्वागत प्रकृति करती है।
    इस निबंध-संग्रह का मूल अभिप्राय यह है कि आधुनिकता अपनी जगह सही है, लेकिन हम अपने संस्कार और संस्कृति को नहीं भूलें। जिस जगह पैदा हुए, पले-बड़े हुए। उस घर-परिवार-आंगन और जमीन को कभी नहीं बिसराएं। सरल-सहज और साधारण भाषा में इन निबंधों का लिखा जाना निबंधकार के सही और सार्थक सकारात्क सोच को प्रकट करता है कि आने वाली पीढ़ियां जब ऐसे अनेक सवाल पूछेगी तो कोई निरुत्तर नहीं हो। ओम पुरोहित ‘कागद’ ने यह संग्रह अपनी बेटियों के नाम समर्पित किया है। संभवतः स्त्री पक्ष द्वार ही हमारी इस सांस्कृतिक धरोहर को न केवल संभाला-सहेजा जाना है बल्कि इसका पग-पग प्रसार कर आने वाले पीढ़ियों को भी सौंपा जाना है।
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