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शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2016

पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ का कहानी संग्रह : ‘‘ मेटहु तात जनक परितापा’’ 02

मेटहु तात जनक परितापा (राजस्थानी कहानी संग्रह) पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ संस्करण : 2012 / पृष्ठ : 112 / मूल्य : 80 रुपये / प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, एफ-77, सेक्टर- 9, रोड नं. 11, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर 
पूर्ण शर्मा ‘पूरण’
जन्म : 01 जुलाई, 1966 रामगढ़ (हनुमानगढ़)
नई पीढ़ी के सर्वाधिक चर्चित कहानीकार। कविता-कहानी और अनुवाद के साथ विविध विधाओं में लेखन। दो राजस्थानी कहानी संग्रह प्रकाशित- ‘डौळ उडीकती माटी’ और ‘मेटहु तात जनक परितापा’। आपकी कहानियों के मारठी-अनुवाद दो संग्रह- ‘अेक सुपना चा अंत’ और ‘विखुरेलेले आकाश’ प्रकाशित हैं। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के उपन्यास का आपने राजस्थानी अनुवाद ‘गोरा’ किया जो साहित्य अकादेमी नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित एवं ‘साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार’ से सम्मानित है।
संपर्क : प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, रामगढ़- 335504 (नोहर) हनुमानगढ़
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पुस्तक के ब्लर्ब का अनुवाद :
जीवन की तलाश में संघर्षशील पात्रों की कहानियां 
० श्याम जांगिड़, चिड़ावा (झुंझुनू)
    इन दिनों राजस्थानी कहानी के क्षेत्र में अग्रिम पंक्ति के जिन कहानीकारों ने उसे आधुनिक और असरदार बनाने का बीड़ा उठा रखा है, उनमें पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ का नाम बड़े उत्साह से लिया जाता है। ‘पूरण’ ने कहानी में अपना आना एक लम्बी तैयारी के साथ किया है। इनका पहला कहानी संग्रह इसी बात का साक्षी है। इस कहानी संग्रह की साहित्यिक जगत में खूब चर्चा रही है।
    ‘पूरण’ की भाषा जरा हटकर है, जो अपनी तरलता और सहजता के दम पाठक को बांधे रखती है। अपनी कहानी में अनुकूल भाषआ को ढूंढ़ लाना ही इन्हें औरों से अलग करता है। नित-नए शिल्पगत प्रयोग और उस पर भी कथारस को बनाए रख पाना, कोई इनसे सीखे। राजस्थानी कहानी को अन्य भारतीय भाषाओं की कहानी से जरा कदम आगे बनाए रखना इनकी कोशिस रही है। इसी कोशिस का परिणाम है संग्रह में आयी इनकी कहानी ‘सिमेंट की लड़की’। यह एक प्रतीकात्मक कहानी है, जो पात्रों की मनःस्थिति को प्रतीकों के माध्यम से उभारती है। संग्रह की शीर्षक कहानी ‘मेटहु तात जनक परितापा’ भी इनके इसी प्रयोगात्मक तेवर को दर्शाती है।
    कहानीकार का यह दूसरा कहानी-संग्रह अपने भीतर कई बेजोड़ कहानियां समेट लाया है। ‘बाग चिड़िया और स्वप्न’, ‘आईना झूठ बोलता है’, ‘जोगन’, ‘मेटहु तात जनक परितापा’, ‘फिर वहीं जीना’, ‘सिमेंट की लड़की’, ‘मोर तूने खूब गाया’, ‘मैं जीना चाहता हूं’, आदि कहानियां खूबसूरत रचनाएं हैं। निश्चय ही ये रचनाएं राजस्थानी कहानी में अपना एक निश्चित स्थान पा सकेंगी।
    पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ के पात्र अपनी ही परिस्थितियों में उलझे पर संघर्षशील हैं। कहानीकार अपने यहां कथानक ही ऐसा उठाते हैं जहां विद्रोह की गुंजाइश न के बराबर रह जाती है। मतलब यह कि ऐसी परिस्थितियां जहां मन चहुं ओर से घिर जाता है। ऐसी स्थिति में कहानी के भीतर किसी कोने से रिस आयी संवेदनाओं का दर्द पाठक को बींध-बींध देता है। ‘जोगन’ कहानी इसका उदाहरण है। ‘जोगन’ की नायिका कैसे और किससे विद्रोह करे? एक-एक कर अपने सामने आती मुश्किलें उसके समूचे वजूद को ही लील जाती हैं। ठीक इसी तरह ‘मेटहु तात जनक परितापा’ एक ऐसे बेबस और बेचारे बाप की कहानी है, जो अपने प्रत्यक्ष दीखती बदनामी को भी आखिरकार अपना हित मान लेने को मजबूर है। माने यह कि इनके सभी पात्र अपनी अंतिम सांस तक जीवन की तलाश में संघर्षशील हैं।
    मुझे पूरा विश्वास है कि ‘पूरण’ का यह कहानी संग्रह पाठकों को भाएगा, साथ ही साहित्यिक जगत में भी सराहना पाएगा।
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राजस्थानी कहानी के भविष्य के प्रति आश्वस्त करती कहानियां
० डॉ.मंगत बादल,रायसिंह नगर
      नई पीढ़ी के कहानीकारों में पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ एक जाना-पहचाना नाम है। ‘मेटहु तात जनक परितापा’ कहानी संग्रह इसका साक्ष्य है। इस संग्रह में उनकी पन्द्रह कहानियाँ हैं, जो अलग-अलग विषयों और भावभूमि पर रचित हैं। ‘बनवारी नै कुण मारियो’ एक मनोवैज्ञानिक कहानी है। अपनी परम्पराओं और रूढ़ियों को मानने वाला बनवारी एक छोटी-सी बात से इतना आहत हो जाता है कि अन्त में वह अपनी जीवन लीला ही समाप्त कर लेता है।‘बाग चिड़ी अर सपनो’ कहानी समाज में निरन्तर बढ़ती गुंडागर्दी को लेकर है। गुंडा तत्त्व लड़कियों को सरेआम छेड़ते हैं, उन पर तेजाब तक फेंक देते हैं लेकिन समाज में कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं होती।
‘आरसी झूठ बोलै’ कहानी में भारतीय नौकरशाही का पर्दाफास किया गया है कि देश में आँकड़ों की खेती किस प्रकार की जाती है? ‘कीं तो बाकी है’ कहानी इस बात की ओर संकेत करती है कि साम्प्रदायिक विद्वेष की जड़ों को कहीं न कहीं आर्थिक असमानता भी सिंचित करती है। ‘कर्फ्यू’ चाहे छोटा सा शब्द है किन्तु इसकी मार झेलने वाले जानते हैं कि यह कितना खतरनाक है। प्रतिदिन निरन्तर बढ़ती हुई असहिष्णुता जब साम्प्रदायिक दंगे का रूप धारण कर लेती है तो सामाजिक ढांचे को अस्त-व्यस्त कर देती है।
      ‘मेटहु तात जनक परितापा’ कहानी मातृविहीन पुत्री के विवाह योग्य होने पर होने पर बाप की चिन्ताओं को लेकर है। जाति-पाँति,समाज के रीति-रिवाजों और शास्त्रों को मानने वाले पंडित जी को जब बेटी की समीज की जेब में प्रेम-पत्र मिलता है तो वे एक तरह से आश्वस्त हो जाते हैं कि उनकी बेटी जो भी निर्णय लेगी वह ठीक होगा। ‘गोरू काको’ कहानी बतलाती है कि प्रत्येक व्यक्ति की पसन्द और प्रतिभा अलग-अलग होती है। सब को एक साथ हाँकना अत्याचार ही है। गोरू जैसे समाजसेवी और परोपकारी व्यक्ति को जब कोई विपरीत दिशा में हाँकना चाहेगा तो क्या परिणाम निकलेगा?‘तास री गट्टी’ एक मनोवैज्ञानिक कहानी है जब कि ‘जोगन’ औरत की पीड़ा और विवशता की कहानी है। इन्दरो का पति जब घर छोड़कर संन्यासी बन जाता है तो उसे घर की चारदीवारी के भीतर जो कुछ सहन करना पड़ता है वास्तव में वह उसे एक योगिनी ही बना देता है। यह एक अत्यन्त मार्मिक कहानी है। सांयत झील, फेर बठै ई जीणो,खिंडतो आभौ आदि प्रत्येक कहानी किसी न किसी सामाजिक समस्या का बड़ी सिद्दत से चित्रण करती है।
       ऊपर से छोटी और सामान्य दिखलाई पड़ने वाली घटनाएं कितनी मार्मिक हैं, इन कहानियों में चित्रित है। कहानियों की भाषा पाठक को अपनी रौ में बहा ले जानेमें सक्षम है। कहानियों की भाषा यथार्थ की परतें उधेड़ती हुई हमारी संवेदनाओं को झकझोरती हैं। लेखक ने इन कहानियों में शिल्प के नये प्रयोग किये हैं, जो पाठक को प्रभावित और राजस्थानी कहानी के भविष्य के प्रति आश्वस्त करते हैं।
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मेटहु तात जनक परितापा....
० सतीश छिम्पा, सूरतगढ़

    "मेटहु तात जनक परितापा" पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ का दूसरा कहानी संग्रह है। राजस्थानी कहानी में पुराने शिल्प के समानांतर एक नए शिल्प को उभारने वालों में पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ एक महत्वपूर्ण नाम है, इस संग्रह से पूर्व उनका 'डोळ उडीकती माटी' संग्रह प्रकाशित हो चुका है। मानवीय संवेदनाओं को स्वर देने और पात्रों को जीवन्त रूप प्रदान करने के ‘पूरण’ सिद्धहस्त कहानीकार हैं। उनके यहां उधार के सरोकारों की जगह भोगा हुआ यथार्थ है, या ऐसे भी कहा जा सकता है कि जो कुछ उनकी कहानियों में घटित होता है या कहानीकर मन द्वारा घटित करवाया जाता है वह रामगढ़,नोहर और भादरा की जमीन से किसी न किसी रूप में जुड़ा हुआ प्रगट होता है।
    पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ की कहानियाँ सजीव पदार्थ की चेतना और उनसे जुडी संवेनाओं का मूर्त रूप है, कोरा, थोथा आदर्श और सामन्तवादी दृष्टिकोण उनके यहां नहीं है। किसी भी कहानीकार के लिए जरूरी है- लोक और चीजों के प्रति उसका अन्वेषी दृष्टिकोण हो, अगर वह एक निवारक खोजी की तरह वस्तुओं को नही देखता है तो उसका कहानीकार संदिग्ध है, खुशी है कि पूर्ण शर्मा  ‘पूरण’ के कहानीकार में उक्त आधार विशेषतः मौजूद है। ‘खिंडतो आभो’, ‘सिम्मट री छोरी’, ‘फेर बठैई जीणो’,  ‘गोरु काको’ कहानियां इसके बेहतर प्रमाण हैं।
    पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ की भाषा प्रभावित करती है, टिंच करती हुई टणकाटेदार जो पाठक को कहानी के बीच ऊब महसूस नहीं होने देती बल्कि उन्हें अंत तक बांधे रखती है।
    इस संग्रह की सभी कहानियों में पात्र आर्थिक और सामाजिक संघर्षों में इस भांति उलझे हैं कि उनकी जियाजूण और संघर्ष एकमेक से लगते हैं, यह लेखक की स्याणप ही है कि उसने अपने पात्रों को खुला न छोड़कर कुछ खांचों में बांध दिया है। प्रस्तुत कहानियों में बहुत जगहों पर कोरा, उबाऊ और बोझिल-सा दिखावटी आदर्शवाद भी सामने आता है, जो मनुष्य की मूल-प्रवृत्ति से एकदम उलटा है। "मोरिया आछो बोल्यो रै....." कहानी को सोच-समझकर रोमानियत का पुट दिया गया है, और औरत को कुछ ज्यादा ही ईमानदार बनाने की कोशिश में कहानीकार भावों की ठोकर खा गया और कहानी 'अजीब-सी' हो गयी।
    राजस्थानी कहानी में जिस तरीके से बदलाव आ रहा हैं उसे देखकर एक बेहतर भविष्य का सहज ही अंदाज़ा हो जाता है। पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ इस बदलाव के आधार कहानीकार माने जा सकते हैं।
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उम्मेद धानिया का राजस्थानी कहानी संग्रह : ‘‘लेबल’’

 लेबल (राजस्थानी कहानी संग्रह) उम्मेद धानिया / संस्करण : 2013 / पृष्ठ :80 / मूल्य : 125 रुपये / प्रकाशक : एकता प्रकाशन, चूरू-331001 राजस्थान  
उम्मेद धानिया
जन्म : 18 दिसम्बर, 1987 
राजस्थानी युवा कहानीकारों में पर्याप्त पहचान रखने वाले उम्मेद का बचपन आभावों में बीता। वे निरंतर संघर्षरत रहे और कहानीकार के रूप में पहचान वर्ष 2007 में उनके कहानी संग्रह ‘आंतरो’ पर ‘किशोर कल्पनाकांत युवा साहित्यकार पुरस्कार’से हुई। राजस्थानी में दलित कहानियों का विधिवत श्रीगणेश करने वाले उम्मेद धानिया का दूसरा कहानी संग्रह ‘लेबल’ अनेक कारणों से चर्चा में रहा। जैसा कि पुस्तक के अंतिम आवरण पर परिचय में प्रकाशित है कि राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी ने ‘लेबल’ की पांडुलिपि को खारिज कर दिया। मित्रों ने सहयोग से इस कृति का प्रकाशन हुआ है। 
आपके द्वारा अनूदित लक्ष्मण माने की मराठी आत्मकथा का प्रकाशन साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा किया गया है। जल्द ही आपका राजस्थानी उपन्यास आने वाला है।
संपर्क : मेघवालों का बास, राजपुरा (वाया-दूधवाखारा) चूरू
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बुधवार, 5 अक्तूबर 2016

जितेन्द्र कुमार सोनी का राजस्थानी कविता संग्रह “रणखार” 05

रणखार (राजस्थानी कविता संग्रह) डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी / संस्करण : 2015 / पृष्ठ :80 / मूल्य : 120 रुपये / प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, एफ-77, सेक्टर- 9, रोड नं. 11, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर 
डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी
जन्म : 29 नवम्बर 1981
राजस्थानीऔर हिंदी में समान रूप से सृजनरत। अपने पहले ही राजस्थानी कविता संग्रह “रणखार” हेतु साहित्य अकादेमी नई दिल्ली का युवा पुरस्कार वर्ष 2016 से सम्मानित डॉ. सोनी अनुवाद के क्षेत्र में भी सक्रिय है। राजस्थानी में पंजाबी कवि हरिभजन सिंह रैणू के कविता संग्रह का अनुवाद ‘म्हारै पांती रा पाना’ एवं रस्किन बॉण्ड के कहानी संग्रह का अनुवाद ‘देहरा मांय आज ई उगै है आपणा रूंख’ प्रकाशित। युवा कविता संकलन ‘मंडाण’ और ‘थार सप्तक-6’ में कविताएं संकलित। राजस्थान शिक्षा विभाग के लिए एक संग्रह का संपादन। हिंदी में एक कविता संग्रह व अन्य पुस्तकें प्रकाशित। अनेक संस्थाओं द्वारा मान-सम्मान और पुरस्कार प्राप्त डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी वर्तमान में जिला कलेक्टर, झालावाड़ के पद पर सेवारत है।
 संपर्क- पुराने राधास्वामी सत्संग भवन के पास, रावतसर, जिला हनुमानगढ़ [राज.]
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पुस्तक के ब्लर्ब का अनुवाद :
लोक से जुड़ाव राजस्थानी कविता में बड़ी संभावना 
० रामस्वरूप किसान, परलीका
      मुक्तिबोध लिखते हैं- ‘आदमी के सामने दो ही मार्ग है, या तो वह सच्चा आदमी बने या पशु।’ धूमिल की एक काव्य-पंक्ति है- ‘कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है।’ और इसके अलावा यूनानी दार्शनिक अरस्तु ने युगों पहले कहा था कि आदमी एक सामाजिक प्राणी है, जो नहीं है वह या तो पशु है या फिर देवता।
    अब यदि मुक्तिबोध को अरस्तु और अरस्तु को धूमिल से जोड़ते हैं तो कविता का समाज से जुड़ाव ही उसे कविता बनाता है। नहीं तो वह कुछ और हो सकती है, कविता तो कतई नहीं। और कविता का सामाजिक कवि के सामाजिक से जुड़ा हुआ है। सीधी सपाट बात है, कवि सामाजिक है तो कविता सामाजिक है। दूसरे शब्दों में कविता काम आनी चाहिए। क्यों कि प्रत्येक उत्पाद का अंतिम ध्येय काम आना है। और काम वही उत्पाद आता है जो वस्तुगत और गोचर है। केवल काल्पनिक, जादुई, वायवीय और अमूर्त उत्पाद चौंका सकते हैं, काम नहीं आ सकते हैं।
    पहली और बड़ी बात यह है कि जितेन्द्र कुमार सोनी कवि होने से पहले एक सच्चे मनुष्य होने की शर्त पूरी करते हैं। और ये सभी शर्तों उनकी कविताओं में प्याज के छिलकों की भांति परत दर परत खुलती है। उनका यह संग्रह मनुष्यता का प्रमाण-पत्र है। मुक्तिबोध के अनुसार कवि भले स्वयं को कितना ही छिपाने का प्रयास करे, पर असल में वह रचना के बहाने स्वयं को ही रच रहा होता है। इण हिसाब से यह संग्रह कवि के चरित्र का रचाव है, जो काव्य-यात्रा के लिए ‘रोड-मैप’ का काम करता है।
    जितेन्द्र का यह सृजन एकांत में पकाया हुआ एकांत नहीं है। छिप कर दूर से मारा हुआ शिकार नहीं है और ना ही वातानुकूलित इमारत के किसी झरोखे में दूरबीन लगाकर कैद किया हुआ दृश्य है। इन कविताओं में पसीने से तर मेहनतकश जन का हिस्सा है कवि। समाज के मध्य खड़ा कवि अलग-थलग और विशेष नहीं दिखाता खुद को। उसने अपने निज और आत्म को समाज में मिला दिया है। जितेन्द्र के लिए लोक कोई भीड़ अथवा ईंटों का ढेर नहीं है। उस के लिए लोक विश्व-निर्माता का मूल, जीवन का स्रोत और कलाओं की आगार है। उसे अन्यों की भांति लोक में दुर्गंध नहीं आती। लोक उसके और वह लोक के कलेजे बसता है। इसी लिए कवि अपनी जड़ों से नहीं कटा है। जितेन्द्र का लोक से जुड़ाव राजस्थानी कविता में बड़ी संभावना जगाता करता है।
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तमीज की कविता : रणखार
० पृथ्वी परिहार, दिल्ली
   
हमें अपने बच्चों को नसीब की सीढ़ियों का भ्रम नहीं मेहनत के मजबूत पांव देने चाहिएं कि थार की माटी में दबा दिए गए तरबूजों तक कोई हिम्मती ही पहुंच पाता है।
        “कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है” -धूमिल
    आज जब भी कविता की बात होती है तो दो बड़े सवाल हमेशा सामने आते हैं। प्रकाशक वर्ग कहता है कि कविताएं (वह भी खरीदकर) कौन पढ़ता है;  तो आलोचकों की घोषणा रहती है कि अच्छी कविताएं अब लिखी ही नहीं जातीं। इस लिहाज से देखा जाए तो अभिव्यक्ति और लेखन की यह सक्षम व सुंदर विधा कड़े समकालीन सवालों का सामना कर रही है। कविता के लिए इस संकट को इंटरनेट, सोशल मीडिया व व्हाट्सएप जैसे मैसेजिंग मंचों ने और भी गहरा दिया है जहां कविता के नाम पर थोक के भाव में अधपकी पंक्तियां पाठकों तक पहुंच रही हैं।
    लेकिन कविता के मंच पर सब कुछ निराशाजनक भी नहीं हैं। अपने इर्द-गिर्द कंटीले सवालों के बावजूद पठनीय और संभावनाओं के नए क्षितिज बुनती कविताएं लिखीं जा रही हैं, छप रही हैं और लोग खरीदकर पढ़ते भी हैं। जितेन्द्र कुमार सोनी के राजस्थानी कविता संग्रह ‘रणखार’ की कविताएं भी इसी श्रेणी की हैं। यहां कविता के सामने खड़े हुए एक बड़े सवाल की बात भी करनी प्रासंगिक होगी कि कविता क्या है? कवि चिंतक रामस्वरूप किसान ने फ्लैप पर मुक्तिबोध, अरस्तू व धूमिल के विचारों को एक सूत्र में पिरोते हुए कहा है कि कविता का समाज से जुड़ाव ही उसे कविता बनाता है। नहीं तो वह रचना और कुछ हो सकती है, कविता तो कतई नहीं। इस खांचे से देखा जाए तो जितेन्द्र कुमार सोनी की रचनाएं सुखद आश्चर्य की तरह खुद को कविताएं साबित करती हैं।
    “बड़ी बात यह है कि जितेन्द्र कुमार सोनी कवि होने से पहले एक सच्चा इंसान होने की शर्तें पूरी करते हैं। ये शर्तें उनकी कविताओं में प्याज के छिलके की तरह परत दर परत उघड़ती जाती हैं। सोनी का यह कविता संग्रह उनके मानव होने का प्रमाण है” -रामस्वरूप किसान
        एसिड अटैक / तुम्हारे खातिर एक खबर / फेंकने वाले के लिए एक बदला / पर मेरे लिए / एक त्रासदी है।
    जितेन्द्र कुमार सोनी की कविताओं में मानव रचित और प्राकृतिक.... अनेक विपदाओं पर टीका-टिप्पणी है। वे थार की सांस सुखा देने वाली लुओं के बरक्स् जीवटता को खड़ा कर बताते हैं कि माटी के इस समंदर में परेशानियों की मोटे तनों से मजबूत तो उम्मीदों की कुल्हााड़ी है जो उन्हेंि काटती जाती है। वे कहते हैं कि क्रांति की मशालें खाली पेट वाले नंगे पैर लेकर निकलते हैं। कि इंकलाब का पहला और आखिरी नारा इसी वर्ग से लगता है। उनकी कविताएं- हरसिंगार, गेंदे, कनेर और गुड़हल के फूलों से गुजर हमारे आंगन में उतर आई धूप की बात करती हैं। वे बताते चलते हैं कि वैश्वीकरण जैसे तमाम नये शब्दों के हमारे शब्दकोषों में शामिल होने के बावजूद सर्वहारा व समाजवाद जैसे शब्दों की प्रासंगिकता खत्म नहीं हुई है।
    जितेन्द्र कुमार सोनी की कविताओं में बचपना है, बचपन है, पलायन है, धारावी है, एकांत है.... और सबसे बड़ी बात उनमें हमारे आस-पास का लोक है। इस दौर में जबकि अंग्रेजी बोलना व अंग्रेजी में लिखना ही सफलता का पर्याय मान लिया गया है, कितने लोग अपनी भाषा बोली में लिखते हैं। आई.ए.एस. डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी को इस बात के लिए भी सराहा जाना चाहिए कि उन्होंने कविताओं के लिए मातृभाषा राजस्थानी को चुना है। इस तरह से उन्होंने एक तरह से अपनी रचनाओं को एक पाठक व इलाके तक सीमित रखने का जोखिम उठाने का साहस दिखाया है। जैसा कि रामस्वरूप किसान ने पुस्तक के ब्लर्ब पर लिखा है कि जितेन्द्र कुमार सोनी का लोक से जुड़ाव राजस्थानी कविता में बड़ी संभावना जगाता है।
        पानी- / थार में / एक सवाल है / पीढियों से
        पानी- / बर्फ ही बर्फ होने  के बाद / एक चुनौती है / साइबेरिया जैसे इलाकों में।
        आप ग्लोब पर कहीं भी / अंगुली तो रखो / सभी रिश्तों से पहले / मिलेगा / पानी का रिश्ता।
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जमीन और मनुष्यता से जुड़ाव की कवितावां
० डॉ. नीरज दइया, बीकानेर

    डॉ. जितेन्द्रकुमार सोनी के कविता संग्रह ‘रणखार’ पर बात करने से पहले मैं युवा कवियों की कविता-यात्रा पर बात करना चाहता हूं। इसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं कि मैं युवा कवि की पहली कविता पुस्तक के साथ कविता-यात्रा की चर्चा कर रहा हूं। असल में इसे किसी युवा-मन के कविता तक पहुंचने के अभिप्राय में देखें। राजस्थानी के युवा कवि हिंदी अथवा अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा ग्रहण करते हैं तो उनके समक्ष कविता-लेखन से जुड़ते समय जो परंपरा होती है वह हिंदी-अंग्रेजी मिश्रित अथवा थोड़ी-बहुत राजस्थानी की होती है। यहां परंपरा का अर्थ इस रूप में कि कविता रचना से पूर्व कवि के सामने कविता को लेकर जो विचार-धाराएं और उन कविताओं/ कवियों से हैं जिनसे वे प्रेरणा ग्रहण करते हैं। जितेन्द्र कुमार सोनी अथवा स्वयं मेरे कवि के समक्ष जो परंपरा है वह दिनोंदिन अध्ययन चिंतन-मनन से बदलती हुई आधुनिक से अधिक आधुनिक होगी रहती है। हर किसी की अपनी-अपनी परंपरा होती है, और यह थाती समान नहीं होती है। असाक्षर व्यक्ति के पास लोक-साहित्य की सशक्त परंपरा होती है। किसी कवि को उसकी भाषा और रचना-विधा की परंपरा में जांचने-परखने का कार्य आलोचना करती है। मेरा अभिप्राय है कि सोनी की कविताओं में नई चमक दिखाई देती है तो उनके यह उनके अध्ययन से अर्जित राजस्थानी-हिंदी-अंग्रेजी की मिश्रित कविता-परंपरा के विकास का एक आधुनिक परिदृश्य है।
    आज के अत्याधुनिक युग में तकनीकी विकास साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाले कवि जितेन्द्र कुमार सोनी का सबल पक्ष उनका अपनी अनुभव-संपदा से मनुष्य में मनुष्यता को बचाए रखने की ऊर्जा है। वे कविता में सरल-सहज भाषा से अनेक मार्मिक प्रसंग और बातें उजागर करते हैं। कवि के अंतस का गांव और लोकभाषा के रंगों सजी एक पूरी दुनिया है, जो कविता को नए आयाम देती हैं। एक गांव की जमीन से जुड़ा सिरा है और दूसरा पूरी दुनिया के वर्तमान यर्थाथ से। विकास के नाम पर मनुष्यता के भयावह चित्र यहां देखने को मिलते हैं, तो इस बदलती दुनिया में मनुष्यता को बचाए रखने के स्वप्न कवि कविताओं में संजोता है। ‘इंकलाब’ और ‘सिरजण’ (सृजन) श्रृंखला-कविताएं साक्षी है। जैसे कि कविता ‘इंकलाब-3’ की पंक्तियां है- “वर्चुअल बातों से / महक नहीं आती / गरमास नहीं मिलता / रिस्तों का।” (पृष्ठ-11) एक प्रमाण यह पंक्ति देखें- ‘‘डर यही है कि / आने वाली / पीढ़ियों को / कहीं सोध ना करना हो / कि किस प्रकार / रहकर ठीक सामने-सामने / कर लेते थे लोग / घर-परिवार की बातें ! (पृष्ठ-12) इसी भांति ‘सिरजण-3' में कवि कविता लिखने-रचने की मनः स्थित पर विचार करते हुए लिखता है कि कविता लिखने का सोचकर कविता रची नहीं जाती, वह तो स्वतः प्रस्फुटित होती है। कवि वर्तमान संसार में कविता के बने रहने की आशा में सफलता देखता है।
    संग्रह की कविताओं में घर-परिवार और समाज के अनेक दृश्य हैं जो एक पाठ में ग्रहण करते ही हृदय में सामहित हो जाते हैं। उदाहरण के लिए ‘उडीक’ (इंतजार) कविता में एक यायवर परिवार की स्मृति में अपने विगत का स्मरण कवि करता है। कविता के संसार में कवि अपनी विगत स्मृतियों से सघन जुड़ाव महसूस करता है। कविताओं के परिवेश में जालौर जिले की स्थानीयता रणखार के संदर्भ में जहां जमीन से जुड़े प्रेम और अपनेपन के रंग शब्दों में सहजती हैं, वहीं यह गहरी संवेदनशीलता का परिचय भी है। कहना होगा कि इन कविताओं के माध्यम से जितेन्द्र कुमार सोनी ने युवा कविता को एक नया वितान दिया है। बदलती हवाओं और अपने समय को ये कविताएं नए रूप और अपनी भंगिमाओं के साथ अभिव्यक्त करती हैं, दूसरे शब्दों में कहें तो राजस्थानी युवा कविता के आंगन में दूसरी परंपरा को इतिहास में जोड़ने का प्रयास करती हैं। निसंदेह ‘रणखार’ की कविताएं अपनी जमीन और मनुष्यता से हमारा जुड़ाव बेहतर करने वाली कविताएं हैं।
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संवेदनशील कवि-मन की कविताएं
० माधव नागदा, लालमादड़ी (नाथद्वारा)

      ‘रणखार’ की कविताएं पढ़ कर कहा जा सकता है कि ये संग्रह की कविताएं आज की राजस्थानी युवा पीढ़ी द्वारा रची जा रही कविताओं का एक परिपक्व चेहरा है। यह चेहरा समकालीन राजस्थानी कविता-यात्रा में अलग से रेखांकित किए जाने योग्य है। जमीन से जुड़ी हुई इन रचनाओं की अलग ही तासीर है। इन्हें पढ़ते हुए मन में करुणा और आक्रोश एक साथ उपजते हैं, खासकर ‘इंकलाब’ शृंखला की कविताएँ पढ़कर। ये ‘फील्ड वर्क’ हैं न कि ‘ऑफिस वर्क’। कविता ‘सिरजण : तीन’ इस बात को बखूबी बताती है कि कविता का जन्म आलीशान कमरों में न होकर जिंदगी के थपेड़ों के बीच होता है। कविता लिखना जिंदगी को जीना है। यथार्थ की खुरदरी जमीन पर खड़ी ये कविताएं अनुभव और संवेदना की रगड़ से उत्पन्न आग है। यहाँ विचार अंडर-करन्ट की तरह बह रहा है। हमारे समय के प्रसिद्ध हिन्दी कवि लीलाधार जगूड़ी ने एक जगह कहा है- ‘‘कविता वही अच्छी नहीं होती बल्कि वह भी अच्छी हो सकती है जो हमारी हताशा को थोड़ा ही सही पुचकार कर होश में ला दे। कविता का यह भी एक काम है कि वह अनुभव को विचार में ढाल कर इस तरह तराश दे कि वह हमारी स्मृति का हिस्सा हो जाए।’’
      डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी की कविताएं इससे भी आगे जाकर लगातार अकाल की मार सहते आ रहे आम जन की हताशा-निराशा को न केवल पुचकार रही हैं, बल्कि उनमें हौसला भर रही हैं : ‘पण छोड़ जावांला / थारै महलां माय / चूल्है रो स्वाद / पसीने री सौरम’..... XXX ..... ‘आप मांडो तिजोरी / म्हे खळो / आप रुतबो / म्हे रिस्ता  / आप लालसा / म्हे संतोष’ जैसी पंक्तियाँ इस मरुभूमि के शोषित, पीड़ित, अभावग्रस्त जन की जिजीविषा, संघर्ष-क्षमता और सकारात्मक दीठ को बड़ी शिद्दत के साथ वाणी देती हैं। ‘नैणा भर लूं रंग’ की संप्रेषणीयता और संवेदनात्मकता अद्भुत है। यह कविता गहरी आत्मीयता के साथ बताती है कि कवि उच्च प्रशासनिक अधिकारी बनने के बावजूद, देश के हरे-भरे, प्रकृतिक सौंदर्य से भरपूर हिस्से मसूरी में प्रशिक्षणार्थ पहुंचकर भी अपनी माटी को याद रखता है, याद ही नहीं रखता बल्कि चाहता है- ‘चुण-चुण भर लेवूं अै सगळा / नैणा मांय / अर जाय’र छिड़क द्यूं / म्हारै थार री माटी मांय।’ अपनी माटी के प्रति यह अप्रतिम प्रेम निस्संदेह वंदनीय है।
      इन कविताओं में कई स्थलों पर आए मौलिक प्रयोग और बिम्ब इन्हें दीर्घजीवी और उल्लेखनीय बनाते हैं। वर्तमान समय और समाज के बीच विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी संवेदनशीलता और सृजनात्मकता को बचाए रखने का यह संग्रह एक अनुपम उदाहरण है, अतः इन कविताओं को संवेदनशील कवि-मन की कविताएं कहना सर्वथा उचित है।
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विभेदमूलक व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह का स्वर
० डॉ. जगदीश गिरी, जयपुर

      कविता और विचार में अटूट सम्बन्ध है। विचार ही किसी कविता को गहराई और गरिमा प्रदान करता है। बिना विचार के, महज शाब्दिक चमत्कार के द्वारा कविता रची तो जा सकती है, पर वह क्षणजीवी होती है। विचार कविता को कालजयी बनाता है, परन्तु उसे कविता में ठीक से परोटने की जरूरत होती है।
      युवा कवि डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी के काव्य संग्रह ‘रणखार’ को पढ़ते हुए इसी विचार तत्त्व को लगातार महसूस किया जा सकता है। कवि की प्रतिबद्धता समाज के शोषित, पीड़ित और दलित वर्ग के प्रति है। इस वर्ग की अतिसाधारणता में छिपी हुई असाधारणता को कवि महसूस करता है और पूरी सच्चाई और संवेदनशीलता से उसे प्रकट करता है। कवि इस वर्ग को जाग्रत करने के लिए क्रांति का आह्वान करता है, उन्हें अपनी मौजूदा स्थिति को बदलने के लिए आगे आने की प्रेरणा देता है। कवि का अपने लोक से गहरा जुड़ाव है, वह ‘मसूरी’ में पोलोग्राउंड के पास के पहाड़ों पर बादलों के रंग देखकर विमोहित नहीं होता, बल्कि अपनी ‘मरुभूमि’ को याद करता है। वह अपने अकाल ग्रसित प्रदेश में उन रंगों को छिड़कने की इच्छा रखता है- ‘पण चावूं/ चुण-चुण भर लेवूं अै सगळा रंग/ नैणां मांय/ अर जाय’र छिड़क द्यूं/ म्हारै थार री माटी मांय/ अकाळ सूं जूझता घरां माथै/ किणी गरीब रै चूल्है रै/ असवाड़ै-पसवाड़ै।’
      यही प्रतिबद्धता माउण्ट आबू से संबंधित कविताओं में नजर आती है। ‘बत्तीसो नाळो’, ‘चंद्रावती’, कविताओं में आबू के उस परिवेश को अभिव्यक्ति दी गई है, जिसे सामान्यतः उपेक्षित मानकर छोड़ दिया जाता है। बाबा नागार्जुन ‘मादा सुअर’ को कविता का विषय बनाते हैं तो त्रिलोचन ‘भोरई केवट’ और अनपढ़ बाला ‘चम्पा’ को, ठीक उसी प्रकार सोनी नक्की झील, सनसेट प्वांइट की बजाय आदिवासी गरासिया जनजाति की जीवन-रेखा कहे जाने वाले ‘बत्तीसा नाळा’ पर कविता करते हैं। चंद्रावती नगरी के माध्यम से भी कवि मनुष्य को अहंकार न करने का संदेश देते हैं। किसी समय परमारों की राजधानी रही ‘चंद्रावती’ आज अवशेष मात्र रह गई है। इस बहाने कवि उस सत्ताधारी, अहंकारी वर्ग को सावचेत करता है, जो जन-शोषण आधारित व्यवस्था से अपना विलास रचता है, परन्तु अन्ततः सब-कुछ नष्ट हो जाना है।
      संग्रह की ‘रणखार’ शीर्षक कविता की पृष्ठभूमि में राजस्थान के जालोर जिले से लगती गुजरात की सीमा है, जहां से कच्छ का रन शुरू होता है, वह क्षारीय धरती भारत और पाकिस्तान के मध्य तारबंदी से बंटी हुई है। कोई भी व्यक्ति सीमा के आर-पार नहीं जा सकता। परन्तु बारिश के दिनों में पानी मनुष्य की बनाई इन कृत्रिम सीमाओं को तोड़कर दोनों तरफ बहता है और मानो दोनों तरफ के लोगों से बात करता है- ‘तारां रै दोन्यां कानी/ ओ बांटै मिठास/ अर सारै-सारै रै/ गांवां मांय/ कर ल्यै बंतळ।’
      समाज के तथाकथित सभ्य और संभ्रांत वर्ग के लिए ‘ग्लोबलाइजेशन’ के इस दौर में दुनिया में सर्वत्र सुख ही सुख है। वह इस व्यवस्था में खुश है। उसे लगता है कि अब किसी को कोई दुःख नहीं, कोई बाधा नहीं, परन्तु कवि इस अंतरविरोध को बहुत ही प्रामाणिक ढंग से उठाता है कि अब भी भूखे-नंगे लोगों के लिए जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं भी पूरी करना संभव नहीं है। महलों और झोंपड़ियों का फर्क आज भी वैसा ही है- ‘ग्लोबलाइजेशन रै जुग मांय/ कागदां मांय/ मिट्या हुसी/ अै सबद/ पण आज ई/ ......../ पसीनै री सौरम/ पेट री भूख/ आंतड़ियां री लम्बाई/ मै’ल अर झूंपड़ी रो फरक नीं मिट्यो है।’
      शायद इसी विभेद को पाटने के लिए कवि को सिर्फ एक ही मार्ग सूझता है- वह है इंकलाब। इस संग्रह में इंकलाब सीरीज से कुल आठ कविताएं, इसी विभेदमूलक व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह का स्वर बुलन्द करती हैं। कवि कहता है कि वह दिन अवश्य आएगा जब- ‘म्हारी झूंपड़्यां री भूख/ तोड़’र सोनल किंवाड़/ मै’लां बड़ैली।’
      इंकलाब का यह स्वर ही इस संग्रह को महत्त्वपूर्ण बनाता है।
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करुणा की सलूणी पानीदार आंखें
० आईदानसिंह भाटी, जोधपुर

    डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी का कविता संग्रह ‘रणखार’ पढते समय ऐसा लगा ही नहीं कि यह कवि एक जिले में कलेक्टर है। मैंने पहले संग्रह की कविताएं पढ़ी और बाद में रामस्वरूप किसान की लिखा फ्लैप। किसानजी ने इन कविताओं के जिस लोक-जुड़ाव की बात जी है, मुझे लगता है इसी जमीन पर चर्चा करने से कविताओं का मर्म तक पहुंच सकेंगे।
    ‘इंकलाब’ शीर्षक से संग्रह में आठ कविताएं हैं। ये कविताएं इस संग्रह का आधार तय करती हैं। झूंपड़ियां, नाक बहते नंगे बच्चे, खुरदरा डोकरा, ढेरिया, ढोर, चूल्हे का स्वाद, बळबळती लूएं, मजदूर के सिर से टपकता पसीना, हळ की नोक, खळो, खाली पेट, चौपाल का भाईचारा, हथाई का रस, पनीली आंखों वाला बूढ़ा, पाटों का प्रेम, पींपलों के नीचे बने चबूतरे, गवाड़, समंदर का किनारा, पैदल चलना, लाल, हरे या पीले पीलू, सूखी पोखरें, सूनी कांकड़ां, कठिनाइयां, रंग, ईंडूणी, थार, कोसों दूर से पानी लाना, खेती-पाती, मेह-पानी, काली अंधारी रातें, संवाद-संस्कार, निर्लज संकेत, नारी होने का अहसास इत्यादि राजस्थानी शब्दों से कवि की मनःस्थिति जान सकते हैं कि कवि किस के पक्ष में है। कविता करुणा की कोख से जन्म लेती है। ‘रणखार’ की कविताएं भी इसका प्रमाण है। यह विकसित होने वाला युग सबसे बड़ा और लंबा-चौड़ा होता जा रहा है और आदमी भीतर से छोटा व बावना होता जा रहा है। जो इस विकसित होने वाले में फस गया उसके अंतस का इमी-रस सूख गया। जितेन्द्रकुमार सोनी के कविता-संग्रह ‘रणखार’ को पढ़ते हुए मुझे मेरे कविता-संग्रह ‘हंसतोड़ां होठां रौ साच’ की कविताओं का स्मरण हो आया, जिन में मैंने अकाल-दुकाल से जूझते मनुष्यों की कठिनाइयों के कुछ बिम्ब प्रस्तुत किए थे।
    आस : अेक, आस : दो, फुटपाथ पर बैठ्यै बाप रा सुपना, कचरो, धारावी, अकूरड़ी, उडीक, छोरियां इत्यादि कविताएं करुणा की कोख से उपजी हैं। कवि का संवेदनशील मन वहां परिक्रमाएं करता है, जहां मनुष्यता रो रही है, पीड़ाएं-दुख और कष्ट हैं। ग्रामीण जन-जीवन कवि के ईर्द-गिर्द घूमता रहता है पर साथ ही कवि महानगरीय समस्याओं पर भी नजर रखता है। ‘छोरियां’ नामक कविता में ‘रेड लाइट एरिया’ की पीड़ा पर अंगुली रखता है। स्त्री की दुर्दशा और अपने घरों में खपती औरतों को देख कर कवि का अंतर्मन परेशान है।
    ‘सिरजण’ शीर्षक की तीन कविताओं में कविता के सृजन-पक्ष की बात है। ‘सिरजण : एक’ में कवि लिखता है- ‘कविता / सिरजण खातर / कवि / सबदां री आली माटी नै / अणभण रै ढेरियै कातै / जमानै री धौंकणी तपावै / अर नवी निजर रै / ताणै-बाणै बुणै / कविता री चादर |’ यहां नई नज़र का ताना-बाना बुनना खास है। कवि सृजनकर्ता है। कविता कवि की दृष्टि में शास्वत है। कवि के शब्द हैं– ‘नीं भायला नीं / कविता तौ उपजै / कदै बस री भीड़ मांय / धक्कां रै बिचाळै / कदै रासण री कतार मांय ऊभां-ऊभां / कदै न्हावतां, गुणगुणावतां / अर कदै किणी री मुळक माथै रीझ’र / का पछै किणी रै आंसुवां सूं पसीज’र।’ कविता-सृजन की इस दृष्टि में कर्मयोग के आलाप भी समाहित हैं। करुणा संग प्यार-मोहब्बत का दृष्टिकोण भी शामिल है।
    जोडायत, बिछोह, निरखणो, बत्तीसो नाळो, प्रवासी-एक, प्रवासी-दो, पाणी, नवा सबद, एकलापो जैसी कविताएं कवि ने आपने आस-पास के जीवन पर नजर रखते हुए सृजित की हैं। संग्रह की कविताओं में बिछोह की पीड़ाएं और संवेदनशील प्रवासी-मन की धड़कनें हैं। जितेन्द्रकुमार सोनी की ये कविताएं पाठक तक उनकी भाषा की सहजता से पहुंचती है। कुछ तत्सम शब्दों से बचा जाता तो बेहतर था। परंतु प्रथम कृति में ऐसे बातों से नहीं बचा जाता। रामस्वरूप किसानजी की पंक्ति पुनः स्मरण कराता हूं– ‘जितेंद्र का लोक से जुड़ाव राजस्थानी कविता में बड़ी संभावना की सूचना है।’
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सतीश छिम्पा का कहानी संग्रह : ‘‘वान्या अर दूजी कहाणियां’’ 01

वान्या अर दूजी कहाणियां (राजस्थानी कहाणी संग्रह) सतीश छिम्पा / संस्करण : 201 6 / पृष्ठ :100 / मूल्य : 100 रुपये / प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, एफ-77, सेक्टर- 9, रोड नं. 11, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर 
सतीश छिम्पा
जन्म : 14 नवम्बर, 1986  शिक्षा : एम.ए., बी.एड.
अपने पहले ही कहानी संग्रह ‘वान्य अर दूजी कहाणियाँ’ से चर्चित कहानीकार छिम्पा कहानी को मूलतः जन जागरण और चेतना का वाहक मानते हैं। उनकी पहचान राजस्थानी कहानी में नए प्रयोग और युवा मन की बेलाग अभिव्यक्ति के रूप में की गई है। मूलतः सतीश कवि है और राजस्थानी में उनके दो मौलिक कविता संग्रह- ‘डाण्डी स्यूं अणजाण’ और ‘एजेलिना जोली अर समेस्ता’ प्रकाशित हुए हैं साथ ही आपकी कविताएं युवा कवियों के प्रतिनिधि संकलन ‘मंडाण’ में भी संकलित है। संपादक के रूप में ‘किरसा’ नामक अनियतकालीन पत्रिका का प्रकाशन भी आपने किया। हिंदी में कविता और अनुवाद की पुस्तकें प्रकाशित। अनेक संस्थाओं से पुरस्कृत-सम्मानित।
संपर्क : वार्ड नंबर-11, त्रिमूर्ति मंदिर के पीछे, सूरतगढ़- 334804
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अभिनव प्रयोग की राजस्थानी कहानियां
० डॉ. नीरज  दइया, बीकानेर

          युवा कवि-कहाणीकार सतीश छिम्पा का ‘वान्या अर दूजी कहाणियां’ पहला कहानी संग्रह है। संग्रह में संकलित दस कहानियों में संवेदना के स्तर पर कहानीकार कहानी में भाषा और भाव के स्तर पर कविता करता है। यहां दोनों विधाएं बेहद नजदीक आती हुई, जैसे एकमेक हो जाती है। वैसे ‘वान्या अर दूजी कहाणियां’ संग्रह को मार्क्सवादी विचारधारा का एक लंबा गीत कहा जा सकता है। जिसकी मूल संवेदना वर्तमान समय में बदलती मानवीय भावनाएं, मानसिकता, सार्वभौमिक प्रेम, युवाओं के सपने-संघर्ष, बदलती दुनिया और रोजगार की समस्याओं के बीच संघर्ष करती नई पीढ़ी है। 
          संग्रह में ‘वान्या’ शीर्षक कहानी की कथा-नायिका वान्या है। ‘वान्या’ नाम से कहानीकार को अत्यधिक लगाव है जिस के रहते अन्य कई कहानियों की नायिकाओं के नाम भी वान्या रखे गए हैं। और विशेष बात यह भी कि यह संग्रह वान्या को समर्पित है। आखिर वान्य कौन है? कोई सच या सपना? यदि सच है तो कहानीकार ने समव्यस्क नायिका से जुड़ी आत्मकथात्मक कहानियां लिखी है। कहानी तो सपनों को सच में फिर-फिर रचने का आनंद है। ‘वान्या’ के प्रेम में लिखी इन कहानियों में सार्वभौमिक प्रेम है वह देश-विदेश की सीमाओं से परे कहीं आ-जा सकता है और कहीं भी किसी को बुला सकता है। कहानीकार ने अपने शहर सूरतगढ़ को इन कहानियों में अनेक स्थलों पर इस भांति गूंथा है कि पूरा वहां का पूरा मानचित्र हमारी आंखों के सामने आता है- कॉलेज, आकाशवाणी, सड़कें और दौराहे-तिहारों के साथ बहुत सी जगह तो साथ स्वयं सूरतगढ़ ही किसी देह रूप में पाठकों से मिलता है। राजस्थानी कहानी के संदर्भ में इसे अभिनव प्रयोग कहा जा सकता है।
          “बीं गा गुरू जी प्रवीण भाटिया बीं नै रोज फोन कर-कर नै कैंता ‘आपां नै हारणो कोनी, दूणी मेंनत कहणी है- कामयाबी जरूर मिल सी।’ पण बो हार ग्यो... हार ग्यो घर रै हालातां अर बारी-बारी री असफलता स्यूं। फेर सोचै- ‘अजे के बीगड्यो है- फेर खड्यो हो स्यूं अर कामयाब हो स्यूं।’ इस्सा विच्यार बीं रै मन में आवै अर जावै- पण सार किं कोनी नीसरै। पण मां री आंख्यां देख उण रो मन सरणाटो खींच ज्यै।”
(कहानी- म्हूं बेगो इ घरे आ स्यूं ; पृष्ठ-38)
          प्रवीण भाटिया सूरतगढ़ में स्वनाम धन्य शिक्षक हैं और सतीश प्रेरित रहा है। असल में इन कहानियों में सूरतगढ़ की जिस कसबाई मानसिकता का जिक्र शत प्रतिशत यर्थाथ है और यहां अभिव्यक्त एक सूरतगढ़ नहीं ऐसे अनेक सूरतगढ़ देश में है। संज्ञाओं को विलुप्त कर देखा जाए तो पाठक अनेक सवालों से घिर जाता है। ऐसा कैसे हो सकता है? क्या यह सब कुछ सच है, झूठे तो वे सपने भी नहीं हैं जो कहानियों के पात्र देखते हैं। ‘वान्या अर दूजी कहाणियां’ बदलते युग में बदलते प्रेम को अपने पूरे परिवेश में व्याख्यायित करती है- यह प्रेम विजातीय और सहजातीय दैहिक भी है। डॉ. हीरेन, आईसलैंड का रॉबर्ट, लेस्बीयन बबीता, वान्या और स्वयं नरेटर प्रेम के इन कई रूपों में मिलती है तो पुरानी मानसिकता के आधार पर इन्हें खारिज किया जा सकता है।
          गलोब्लाइजेशन की गिरफ्त में दुनिया नितांत छोटी हो गई है, तो पूरा देश-दुनिया गड़मड़ है। इन कहानियों के माध्यम से कहानीकार समय और समाज के बदलते अथवा कहें बदले हुए चेहरे की पहचान सर्वथा नई भाषा-शैली में करवाता है। यहां पात्रों द्वारा पूरी व्यवस्था और सत्ता एकमेक है, जहां हर कोई आपने सोच से अमीर-गरीब है, कोई किसी से प्रेम करता हुआ सब कुछ अपनी इच्छाओं से कर सकता है।
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कुछ मित्रों के साथ आपका इंतजार है

इन दिनों यहां चर्चित किताबें