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सोमवार, 18 सितंबर 2017

अरविन्द सिंह आशिया का कहानी संग्रह : ‘‘कथा-2"

कथा- 2 (राजस्थानी कहानी संग्रह) अरविन्द सिंह आशिया / संस्करण : 2009 / पृष्ठ : 112 / मूल्य : 99 रुपये / प्रकाशक : कथा प्रकाशन, उदयपुर (मो. 941338066)
अरविन्द सिंह आशिया
जन्म : 6 दिसम्बर, 1964 सर्वाधिक चर्चित और सक्रिय कहानीकार। कविता-कहानी और अनुवाद के साथ विविध विधाओं में लेखन। राजस्थानी में दो कहानी संग्रह- ‘कथा-1’ , ‘कथा-2' तथा एक कविता संग्रह- ‘कांकिड़ौ’ प्रकाशित। रचनाओं के अनेक भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित। राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर से मुरलीधर व्यास कथा पुरस्कार-2003 से सम्मानित। आप साहित्य अकादेमी नई दिल्ली के परामर्श मंडल के सदस्य भी रहे हैं। हिंदी में ‘कचनार’ और ‘अंतिम योद्धा’ उपन्यास चर्चित।
संपर्क : उदयपुर
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सघन संवेदनाओं की अनुपम प्रस्तुति
० डॉ.सुरेश सालवी, उदयपुर

कहानी संग्रह ‘कथा-2’ की 11 कहानियां में डॉ. अरविन्द सिंह आशिया ने अनेक विषयों को समेटा है। संग्रह की कहानियों के कथानक में व्यापकता और गहनता देख सकते हैं। कहानी ‘सवासेर’ सन्देश देती है कि हमेशा अपनी बुद्धि पर घमण्ड़ नहीं करना चाहिए। कभी-कभी वक्त ऐसा भी आता है कि शेर को सवा शेर मिल जाता है। मोहन जो कि भंगार का धन्धा करता है। कम रुपये में कबाड़ लेकर दूसरों को अधिक में बेचना उसकी फितरत है। मोहन भीमा से एक पुरानी सन्दूक का सौदा एक हजार में तय कर कहता है कि इसकी लकड़ी जलाने के काम आयेगी। वह सोचता है कि इसको ठीक करवा कर अच्छे दामों में बेचूंगा। जब मोहन अपनी कार के टायर का पंचर निकालने जाता है तो भीमा पीछे से सन्दूक तूड़वा कर लकड़ी इकट्ठी करवा कर बंधवा देता है। इस प्रकार शीर्षक का संकेत सार्थक होता है।
‘अेक हाकम री मिरतु’ कहानी में कहानीकार ने समाज में फैली गंदी राजनीति का चित्रण किया है। एक्स, वाई, जेड़ और पी पात्रों के माध्यम से कथा को रोचकता प्रदान की गई है। आज की प्रशासनिक व्यवस्था को उजागर किया गया है। ‘बॉंझ’ कहानी नारी हृदय की पीड़ा को उजागर करती है। अब भी समाज में पुत्र विहीन नारी को हेय दृष्टि से देखा जाता है। नारी की व्यथा-कथा उजागर करने के साथ कहानी पुलिस प्रशासन पर भी आक्षेप करती है। ‘1947’ कहानी में कहानीकार ने अपने उद्देश्य को ऐतिहासिक रूप में उद्गाटित करते हुए आज के समाज को सम्प्रदायवाद और जातिवाद जैसी समस्याओं से रू-ब-रू कराया है। 1947 के बंटवारे के समय भाटिया अपनी पुत्री लाहौर में खो देता है परन्तु शिकारपुर आने पर दहशतगर्दों से शबाना को बचाकर अपनी पुत्री बनाकर सच्ची मानवता का सन्देश देता है। आज के समाज में मनुष्यता से परे कोई धर्म नही होता है।
‘पारायण’ कहानी के माध्यम से यथार्थ से परे जीवन मूल्यों पर सवाल किया गया है कि आज भी समाज में लोग साधु-संतों के पाखंड से भरे पड़े है। साधु के कहने पर कहानी में सभी अपने पिता की मौत की प्रतीक्षा में है। जबकि बुजुर्ग मौत से दूर है। एक तरफ धर्म के रूप का दिखावा मात्र रामायण पाठ करने में बताया गया है तो दूसरी ओर शराब आदि का रूप भी कहानी में उजागर हुआ है। कथनी-करनी और बंटवारे के साथ लोभ का यथार्थ चित्रण कहानी में सघन संवेदनाओं के साथ प्रकट हुआ है।
‘बाथरुम स्लिपर्स’’ कहानी के माध्यम से कहानीकार ने मिस्टर मेहरा और मिसेज यू.आर.मेहरा के माध्यम से दिखावटी जीवन के साथ फैशन परस्ती जीवन के साथ, ऐसो-आराम एवं फिजूलखर्ची को आड़े हाथों लिया है। यह सच्चाई है कि वर्तमान समय में बुर्जुगों का समाज से सम्मान घटता जा रहा है, इसी तथ्य को कहानी सुंदर ढंग से उजागर करती है।
संग्रह में सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिकता के साथ ऐतिहासिक आदि कहानियां बानगी रूप संकलित है। कहानीकार ने यदा-कदा राजस्थानी के साथ, सहज प्रवाह में हिन्दी एवं अंग्रजी वाक्यों का भी रोचक प्रयोग किया है। कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि कहानीकार डॉ.अरविन्द सिंह आसिया एक सफल कहानीकार है।
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उत्तर आधुनिकता का वंदन द्वार
चेतन औदिच्य, उदयपुर
    ‘कथा-दो’ कहानी संग्रह से गुजरने के बाद यह कहना सर्वथा उचित है कि हिंदी और राजस्थानी पट्टी के कथा-आकाश में अरविंद सिंह आशिया की कहानियां में ऐसा उजास है जो न केवल अपने शिल्प द्वारा आकर्षित करता है वरन, कहानी की नई जमीन हरी करता है। संग्रह की 11 कहानियों में संवेदना, घटनाक्रम और बुनावट में अभिनव प्रयोग हैं। सभी कहानियां अपने समय के यथार्थ और परिवेश को जीवंत करती वर्तमान होती हैं। कहानियों के रचाव का उपक्रम मौलिकता की नव-भंगिमाएं लिए हैं जो समकालीन कथा-दौर में अपना अलग स्थान बनाने का सामर्थ्य रखती हैं। कहानी के विन्यास के संयोजन की यह विशेषता है कि वह पाठक को पात्र-घटना से एकाकार करा कर देश-काल से अतीत कर देता है; और उसे मानवीय औदात्य की महनीय भूमि पर ला खड़ा करता है। यही इन कहानियों की सर्वोच्च उपलब्धि भी है। यदि इसे कसौटी माना जाए तो अरविंद सिंह आशिया प्रौढ़ एवं प्रगल्भ कहानियों के सर्जक के रूप में स्थापित होते हैं।
संग्रह की कहानियां मनुष्य की स्वयं से जूझ तो है ही साथ ही जीवन के स्वार्थ, संघर्ष एवं प्रपंच को बहुत प्रभावी रूप में प्रस्तुत करती है, पाठक के भीतर तक पैठ बनाती है। आधुनिक भाषा-शिल्प और उसका प्रवाह अरविंद सिंह का अपना है। कथ्य के विस्तार में हम उत्तर आधुनिकता की अनेक विशेषताएं इन कहानियों में देख पाते हैं। कहानियों का घटनाक्रम पर रचनाकार का दृष्टिकोण महज अभिधात्मक ही नहीं है अपितु , चिंतनपरक तथा गहरा व्यंजक है। इस चिंतनपरक दृष्टि के कारण ही कहानी में किसी एक खंड-घटना का कलेवर भी अद्भुत संसार रच देता है। कहानी की समकालीन धारा में यह विरल एवं उल्लेखनीय है।
सवासेर, बांझ, 1947, एकादशी, बाथरूम स्लीपर आदि कहानियां गहरी संवेदनाओं के साथ व्यापक फलक लिए हुए है। कहानी में घटनाक्रम का नाटकीय विन्यास लेखक की प्रयोगमूलक अभिवृत्ति का उल्लेखनीय पक्ष है। जैसे बांझ कहानी की नायिका पेमा के दस बरसों से कोई संतान नहीं है। पेमा का पति उसकी निस्संतति का जिम्मेदार पेमा को ठहराता है। प्रतिदिन की कलह की परिणति में पेमा के हाथों अपने पति की हत्या हो जाती है। पुलिस-हिरासत में पेमा का बलात्कार होता है और वह गर्भवती हो जाती है... न्यायालय के समक्ष पेमा का ठहाका लगाना और यह कहना कि “मैं बांझ नहीं हूं।” कहानी का चरम है।
इसी प्रकार कहानी '1947' भारत-पाकिस्तान के विभाजन की त्रासदी और मानवीय संवेदनाओं पर केंद्रित लंबी कहानी है जिसमें लेखक की व्यापक दृष्टि और संश्लिष्ट विषय का विश्लेषनात्मक निकष प्रस्तुत हुआ है। कुत्ता कहानी में एक अहंकारी अफसर द्वारा कुत्ते को मरवा देने पर उसकी कुतिया द्वारा अनशन करना लालफीताशाही की तानाशाही और आम आदमी की निरीहता को अभिव्यंजित करती है। लेखक द्वारा आदमी को कुत्ते का प्रतीक देना, कहानी-कला में नया रंग भरने जैसा है। एकादशी कहानी द्वारा गरीबी का बहुत बारीक एवं संवेदनात्मक पक्ष उजागर होता है। गरीब पुजारी को जब दिन-भर कुछ खाने को नहीं मिलता है तो वह तुलसी के पत्ते और पानी पीकर कहता है कि "आज एकादशी है, तुलसी खाने से मोक्ष मिलता है। " मन को मनाने वाले मनोविज्ञान-कक्ष में यह कहानी मानो करुणा का छलछलाता कलश है।
इस प्रकार स्तवक कहानी संग्रह ‘कथा-दो’ कहानीकार की नवदीठ अभूतियों की मंजूषा है, जिसमें मानवीय संबंधों और समय की धारा का उद्दाम आड़ोलन बहुत ही अनुशासन में अपनी उपस्थिति देता है। कहा जा सकता है कि संग्रह की कहानियां महज कहानियां नहीं अपितु उससे कहीं आगे, कहानी लेखन में उत्तर आधुनिकता का वंदन द्वार है। यह संग्रह कहानी कला की अनेक आश्वस्त्तियां और समृद्धि लेकर आया है।
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अपनी समस्याओं से जूझते किरदार 
० डा. कुसुम धनावत, उदयपुर

    अरविंद सिंह आशिया आज के राजस्थानी साहित्यकारों में एक जाना पहचाना नाम है।  इनकी रचनाओं की विविधता इनकी विशेषता है। आपका कहानी संग्रह ‘कथा-2’ विविध प्रकार के फूलों की तरह है। हर कहानी अपने अलग कन्सेप्ट के कारण प्रभावित करती है। कहीं वे आपके दिल के कोमल हिस्से को छूती है तो कभी मन को झकझोर कर बने बनाए ढर्रे पर चलने के बजाय उनके विरूद्ध खडे  होने को प्रेरित करती है। अरविंद कहीं अपनी तीक्ष्ण लेखनी से हमें सोचने, विचारने व सुधरने की अपील करते हैं तो कहीं वे स्वयं किरदार के साथ जीते महसूस होते हैं। अरविंद की यही बात इन्हे सबसे अलग बनाती है।
    अरविंद आशिया की सबसे अच्छी बात तो यह है कि वे अपने किरदार को बहुत अच्छे से पहचानते हैं। आशिया स्वयं अपने किरदार के साथ उनकी समस्याओं से जूझते हैं व उनके साथ संघर्ष करते नज़र आते हैं। यही कारण है कि पाठक भी अपने को रोक नहीं पाता व सहज ही उस किरदार से जुड जाता है। आपके किरदार भी परंपरागत ढर्रे से हट कर उससे विद्रोह करते नज़र आते हैं। कहानियों के किरदार एक संघर्ष से जूझते हैं जो कहानी के अंत के समीप अपने चरमोत्कर्ष पर होता है।
    अरविंद की कहानियां कई पहलुओं को सामने रखती हैं। अनेकानेक पहलुओं पर पुनर्विचार करने की अपील करतीं हैं। ‘बांझ’ कहानी के अनुसार किसी महिला को बार बार ‘बांझ’ शब्द से प्रताडित करना तथा  उसके मां न बन पाने का उपहास करना उसके कोमल मन पर दुष्कर्म जितना ही गहरा प्रभाव डाल सकता है व कभी कभी तो उससे भी गहरा। कहानी में पेमा के अंतरमन की व्यथा को पूरी तरह उकेरा गया है। बच्चे न हो पाना, लोगों द्वारा बांझ कहा जाना,  समाज द्वारा इसका उपहास किया जाना, पति द्वारा इसके लिये प्रताडित करना, चूडवेलन, सिकोतरी, डायन जैसे शब्दों का उसके लिये प्रयोग किया जाना, स्त्री को उपभोग का पात्र एवं बच्चे पैदा करने की मशीन समझना इस सब ने पेमा को कितना खोखला कर दिया था, इसका बहुत ही मार्मिक वर्णन कहानी में है।
    अरविंद सिंह आशिया के कहानी संग्रह ‘कथा-2’ में हमें लेखनी की परंपरागत विधा से हट कर कुछ कहानियों में नए प्रयोग भी देखने को मिले। ‘अेक हाकम री मिरतु’ कहानी में ‘उण सेर मांय तीन मिनख रेवता हा।........ क्यूं कै रैवसी री परिभासा में आवै वैइज रैवणिया।’ कथन हमें कई पहलुओं पर सोचने किरदार विवश करता है। जनप्रतिनिधियों द्वारा अपनी सुविधानुसार अफसरशाही का प्रयोग करना व अपने अनुकूलन होने पर ट्रांसफर करा देना तो वास्तव में अलिखित नियम सा हो गया है। इमानदार अफसरों को अपराधियों की तरह ही प्रताडित किया जी रहा है। इन सब बातों को ‘एक्स’, ‘वाय’, ‘जेड’ एवं ‘पी’ के माध्यम से एकदम जीवंत उकेरा है।
    ‘कुतौ’ कहानी अफसरशाही के मद में उन्मत बडे औहदेदारों पर सटीक व्यंग करती है। आधुनिक जीवनशैली में बुजुर्गों की दशा पर व्यंग करती कहानी ‘बाथरूम स्लीपर्स’,  स्वार्थीपन पर व्यंग करती कहानी ‘पारायण’ अरविंद आशिया के प्रयोग को पूरी तरह सफल साबित करती है। कहानी ‘गत’ व ‘ग्यारस’ तो पाठक को अपने साथ बहा कर ले जाती है। कहानी के शब्द स्वयं ही कहानी के काल व क्षेत्र में खींच लेते हैं। क्षेत्र व की खुशबू कहानी से आप ही आती है।
    कहानी की विषयवस्तु लेखक कहानी पर ही छोड देते हैं। कहानियों के किरदार स्वयं अपनी ही समस्याओं से जूझते हुए कुछ सीख लेते हैं व अनुभव प्राप्त करते हैं, इस प्रकार जो सीख या अनुभव वे प्राप्त करते हैं वही कहानी की विषयवस्तु होती है जिसे पाठक स्वयं ही समझ जाता है। यही एक अच्छे साहित्यकार का सूचक है कि वह ज्यादा उपदेशात्मक होने के बजाय स्वयं पाठक को झकझोर कर विचार करती पर मजबूर करते हैं।
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कहन में अनूठी कहानियां
सत्यनारायण सोनी, परलीका (हनुमानगढ़)
किसी भी रचनाकार को उसका अंदाजे-बयां और कथ्यगत नवीनता एक अलग पहचान देते हैं। इस दृष्टि से अरविंद सिंह आशिया राजस्थानी कहानीकारों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने में कामयाब हुए हैं। ‘कथा-2’ उनका दूसरा कहानी संग्रह है। इसमें 11 कहानियों को शामिल किया गया है। शुरुआती तीन कहानियां कहन की दृष्टि से अनूठी हैं। इन कहानियों के माध्यम से वे बिज्जी के लहजे और शिल्प को आगे बढ़ाते प्रतीत होते हैं। इन तीनों कहानियों में लेखक किसी मंजे हुए बातपोश के अंदाज में कहानी कहता हुआ-सा प्रतीत होता है। लेखक कहावतों व मुहावरों के जरिए चरित्र-चित्रण करने का हुनर रखता है- ‘‘मोवनिया काॅपरेटी वाळो किसौ? के गायां रै कीड़ा घालै जिसौ। एक नम्बर रौ अल्लाम। पाणी बतावै वठै कादौ ई को लाधै नीं। उणरा उडायोड़ा रूंखड़ां माथै तक नीं बैठै। पाणी मांयनै सूं हाथ बारै काढै पण भीजण को दै नीं। जिण रूंख री छियां बैठै वौ सूख जावै। अैंमदिया री टोपी मैंमदिया माथै मेलण में उस्ताद। टणकां-टणकां नै इसी टोपी पैरावै के ठा नीं पड़ै। अठै वड़ियोड़ो वठै नीसरै। दूखै पेट अर बतावै माथौ।’’
‘सवासेर’ अपने अप्रत्याशित अंत से चमत्कृत कर देती है। ग्रामीणों के सरल स्वभाव और वणिक की चतुराई को बड़ी बारीकी से बुनने में कामयाब हुए हैं कहानीकार। ‘अेक हाकम री मिरतू’ अेक कस्बे की संकीर्ण राजनीति की कथा है। राजनीतिक चेतना के अभाव में आमजन की हालत भेड़ सरीखी है और वह राजनीति का मोहरा बना रहता है। ‘बांझ’ काम मनोविज्ञान तथा स्त्री सशक्तीकरण की अच्छी कहानी है। इस कहानी में नायिका के यौवन-उभार पर प्रकृति के उपादानों के आकर्षित होने को भी बड़े अनूठे ढंग से चित्रित किया गया है- ‘‘पिणघट माथलौ पीपळ ई पण थोड़ौ उचक्यो। कागलौ उडग्यौ- ....‘कांव‘......। पेमां, जाणै सैंबूलो पीचकौ। बळदियां रै गळा की घंट्यां, पीपळ री फड़-फड़, पाणी री खळ-खळ, अरट रही चरड़ चूं। पीचकै रै उपर बण्योड़ी गोळ-गोळ दो टंक्यां जीवण रो पाणी उफणै।’’
‘1947’ विभाजन की त्रासदी पर लिखी गई कहानियों की संख्या में इजाफा करती है। ‘कुत्तौ’ लोकतंत्र पर करारा व्यंग्य है। इस कहानी में कुत्ते के मारफत आम आदमी की संघर्ष-भावना व्यक्त हुई है। ‘पारायण’ के माध्यम से कहानीकार एक परिवार के बहाने भारतीय परिवारों की सामाजिक व्यवस्था की हकीकत दर्शाते हैं। ‘बाथरूम स्लीपर’ तथाकथित शिक्षित तथा अभिजातीय लोगों के दिखावे, लोक के प्रति उनकी हीन-दृष्टि तथा परिवार के बड़े-बुजुर्गों की उपेक्षा को व्यक्त करती है। वहीं ‘न्यारा-न्यारा आबा’ हाई प्रोफाइल परिवारों में घटते रागात्मक संबंधों की कथा है। ‘गत’ की हंजा भुआ तथा ‘बुझागड़ काकौ’ का मगनौ बा ग्रामीण जनजीवन में रचे-बसे चरित्र हैं। दोनों ही कहानियां ग्राम्य जीवन की संवेदनाओं को उकेरती हैं। मगनो बा जैसे हकीम आधुनिक चिकित्सा पद्धत्तियों को भी दूर बैठाते हैं।
स्ंग्रह की सभी कहानियां पठनीयता से सराबोर हैं। छोटे-छोटे वाक्य और नाटकीय शैली इन कहानियों की एक और खूबी है। आशिया के पास बात कहने का सलीका है। अपना एक ढंग उन्होंने खुद विकसित किया है। कहा जा सकता है कि सर्वथा नवीन कथ्य को अपने मौलिक शिल्प में ढालने में वे निपुण हैं, मगर यही निपुणता शीर्षक-लेखन व प्रूफ-रीडिंग में रही होती तो वे राजस्थानी के चोटी के कथाकारों में अपना मुकाम हासिल कर लेते।
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देखने-परखने का अभिनव दृष्टिकोण और विषयगत नवीनता
डॉ. नीरज दइया, बीकानेर
राजस्थान के बदलते सांस्कृतिक जनजीवन, मूल्यों और भाषा को कहानीकार अरविन्द सिंह आशिया अपने दूसरे कहानी संग्रह ‘कथा-2' की कहानियों में साकार करते हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि उनकी कहानियों में स्थाई भाव के रूप में व्यंग्य किसी माल के धागे की भांति कहानियों की अंतर्वस्तु में गूंथा मिलता है। वे बदलती विचारधाराओं को बदलती भाषा के रूप से चिह्नित करते हुए कहानियों में राजस्थानी के साथ अंग्रेजी-हिंदी शब्दों को प्रतुक्त करते हैं तो यहां का आधुनिकता की दिशा में गति करता जनजीवन मूर्त होता है। संभवतः कहानीकार की यह चिंता भी वाजिब है कि हमारे सांस्कृतिक जीवन में गड़बड़ाते मूल्यों के साथ हमारी लोकभाषा की महक भी लुप्त होती जा रही हैं। संग्रह की कहानियों में जीवन की विभिन्न स्थितियों को देखने-परखने का दृष्टिकोण और विषयगत नवीनता हमें प्रभावित करती है।
पहली कहानी ‘सावासेर’ में कवाड़ सेठ के साथ घटित घटना को कहने का अंदाज किसी बातपोस की भांति है, जिससे त्रासदी स्मरणीय हो जाती है। व्यक्ति और चरित्र को किसी एक चेहरे के बंधन से मुक्त करते हुए एक्स, वाई और जेड के रूप में हम ‘एक हाकम री मिरतू’ में देखते हुए अपने-अपने देखे चरित्रों का स्मरण करते हैं। यह कहानी की सार्थकता है कि वह हमसे जुड़ती चली जाती है। कहानी ‘बांझ’ में संवाद शैली का प्रयोग है, तो साथ ही स्त्री-पुरुष के भेद और सामाजिक खामियों को जो अब तक हमारे समाज में घर किए हुए हैं पर बेहद मार्मिकता के साथ व्यंग्य किया गया है।
कहानी ‘1947’ एक लंबी कहानी है जो देश की आजादी से जुड़ी है। यह हिंदु-मुसलमान दंगों और अंतस पर धातों-प्रतिधातों के बाद भी प्रीत को हरेपन को उजागर करती है। कुछ कहानियों में तो अरविंद सिंह आशिया धर्म और संस्कारों के कारण कष्ट पाती आत्मा को जैसे शरीरों से बाहर निकाल कर कहानी में अपने पाठकों के आगे परोस देते हैं। ‘इग्यारस’ का मोवनदास हो या फिर ‘गत’ की हंजा भुआ हमें अपनी आस्था और अडिग विश्वास के बल पर जैसे जीत लेते हैं। ‘पारायण’ का रामायण पाठ अथवा ‘बाथरूम स्लिपर्स का थीम एक्स्टेम्पोर दोनों ही स्थितियों में हमारा सांस्कृतिक दर्प जैसे चूर-चूर होता है। हम सोचने को विवश होते हैं कि इतने विकास और इस आधुनिकता की चकाचौंध में आखिर हम पहुंचे कहां है?
‘न्यारा-न्यारा आबा’ में अनिल के मेल बॉक्स में मिले तीन पत्र जैसे उसके सामने तीन कहानियों को खोलते हैं। यह कहानी शैल्पिक प्रयोग के साथ ही बदलते जीवन में नाटकीय जीवन और वास्तविक जीवन का मर्म भी उजागर करती है। निश्चय ही राजस्थानी कहानी के मार्फत भारतीय कहानी में यह उम्मीद भरा हस्तक्षेप है। इन सभी कहानियों में जहां विषयगत नवनीता है वहीं एक सामान्य और प्रचलित विषय से इतर कहानियों में प्रतिनिधि चरित्रों और पात्रों द्वारा सराहनीय सार्थक प्रयास प्रचुर मात्रा में नजर आते हैं।
कहानी के लिए कथा शब्द प्रयुक्त करते हुए संभतः अरविन्द हमारी लौकिक परंपरा से जुड़ने का अहसास कराते हैं किंतु संग्रह में सभी कहानियां आधुनिक है। आशा है वे भविष्य में ‘कथा’ के मोह से मुक्त होकर शीर्षक पर विशेष ध्यान देंगे। कहानियों की व्यंजना शीर्षक में भी साकार होनी चाहिए।
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समय व समाज का जीवंत दस्तावेज
० डॉ. मदन गोपाल लढ़ा, महाजन (बीकानेर)
साहित्य अपने समय व समाज का जीवंत दस्तावेज होता है। कहानी विधा में समय की धड़कन को स्पष्ट रूप से सुना जा सकता है। कहानीकार अरविन्द सिंह आशिया की कहानियों में समाज के ताने-बाने के साथ वक्त के मुताबिक आ रहे बदलावों का भी विश्वसनीय अंकन हुआ है। आशिया राजस्थानी के उन चुनिंदा कहानीकारों में से एक हैं जिन्होंने कथ्य के स्तर पर नूतन व विविधतापूर्ण विषयों पर कलम चलाकर कहानी विधा को समृद्ध किया है। उनके कहानी संग्रह ‘कथा-दो’ में जहां परम्परागत देहाती जीवन के विश्वसनीय ब्यौरे दर्ज हुए हैं वहीं एयरपोर्ट, किटी-पार्टियों, तकनीक के साए में पनपी आभासी दुनिया के अनछुए चित्र भी मौजूद हैं। परम्परा एवं आधुनिकता का यह जोड़ उनको राजस्थानी कहानी यात्रा में अलग पहचान दिलाने में सफल हुआ है।
आलोच्य संग्रह की पहली कहानी ‘सवासेर’ धन-मोह से ग्रस्त व्यक्ति की चालाकियां के साथ ‘एंटीक’ सामान के खरीद-फरोख्त व ग्रामीण कमेरे वर्ग का भोलापन सहज रूप में प्रकाशित हुआ है। यहां ‘मोवनियो कॉपरेटी वालो’ केवल एक कबाड़ व्यवसायी भर नहीं रहता बल्कि मुनाफाखोर बाजार व्यवस्था का प्रतिनिधि बन जाता है। ‘बाथरूम स्लिपर्स’ को आशिया की स्मरणीय कहानियों में शामिल माना जा सकता है, जिसमें नगरीय जीवन शैली में हाशिये पर आ चुके बुजुर्गों की पीड़ा को नितांत नए रूप में अभिव्यक्त किया गया है। प्रसंगवश मॉडर्न दिखने की चाह में जड़ों से कटते अभिजात्य वर्ग के ढकोसले भी इस कहानी द्वारा सामने आए हैं। ‘‘मुझे तो यह समझ में नहीं आता कि ये बुढ्ढे आखिर बाथरूम में स्लिप होकर ही क्यूं हड्डियां तुड़वाते है। हजार बार मना करो तो भी बेपरवाही बरतते है और नतीजा हम पीछे वाले भुगतते हैं।’’ मिसेज मेहरा का यह कथन उच्च वर्ग की मानसिकता को उजागर करता है।
‘गत’ व ‘बांझ’ कहानियां स्त्री जीवन की पीड़ाओं व संघर्षों को प्रकाशित करती है। ‘गत’ की हंजा भुआ गरीबी और अकेलेपन से जूझती हुई भी अपनी संवेदना को मरने नहीं देती। ‘बांझ’ में पेमां पर पुलिसिया अत्याचार त्रासद है, वहीं सामाजिक ढांचा भी स्त्री को उपभोग की वस्तु से अधिक नहीं आंकता। संग्रह की अन्य कहानियां भी हमारे इर्द-गिर्द पसरी विसंगतियों को उजागर करती है।
अरविन्द सिंह आशिया का कहानीकार कस्बों-शहरों में रहने वाले मध्यम व उच्च वर्ग के जीवन विधान को भी कहानियों में उजागर करता है। ऐसा करके वे राजस्थानी कहानी को गांव-देहात के परम्परागत दायरे से बाहर निकालते हैं। इस प्रक्रिया में उन्होंने पात्रों के संवादों में अंग्रेजी के लम्बे-लम्बे वाक्यों का बेहिचक प्रयोग किया है। शिल्प के स्तर पर उनकी कहानियों में अभी भी संभावना है, खासकर शीर्षक व कसावट को लेकर। बावजूद इसके निर्विवाद यह कहा जा सकता है कि अरविन्द सिंह आशिया ने राजस्थानी कहानी की नई जमीन तोड़ी है। विषयगत विविधता, परिवेश का जीवंत अंकन एवं कथ्यगत प्रयोग उनको राजस्थानी के समकालीन कहानीकारों में भीड़ से अलगाते हैं। उनके अब तक प्रकाशित दोनों संग्रह उनसे बड़ी उम्मीदें जगाते हैं। आशा की जा सकती है कि वे आगामी रचनाओं से कहानी परम्परा को उस ऊंचाई तक ले जाएंगे जहां भारतीय भाषाओं के बीच उसकी सशक्त उपस्थिति दर्ज होगी।
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तिरोहित होती संवेदनाओं की कहानियां...
० डॉ. संजू श्रीमाली, बीकानेर
    अरविंद सिंह आशिया की कहानियों को पढ़ते हुए एक बार बार ऐसा लगता है कि कहानीकार का सोच और अनुभव फलक अत्यंत व्यापक है। कहानियों का आरंभ पढ़ते हुए हमें परंपरागत बात शैली का अहसास भीतर किसी छोर को छूता प्रतीत होता है। दादी-नानी की कहानियों जैसी बातपोशी से संपृक्त ये पठनीय कहानियां हैं।
    संग्रह की पहली कहानी ‘सवासेर’ अपनी राजस्थानी ठसक और मर्म से हृदयस्पर्शी बन पड़ी है। इसमें कथानायक मोवनिया एंटीक पीस के चक्कर में ठगा जाता है। खुद को बड़ा होशियार समझने वाला वह अनपढ़, गंवार, अबूझ दिखवाले व्यक्तियों से मात खा जाता है। भाषा की व्यंग्यात्मकता कहानी में रोचकता पैदा करती है तो शैली में लोककथा जैसी एक अनोखी त्वरा से अंत तक आते आते अविस्मरणीय बन जाती है।
    ‘एक हाकम री मिरतु’ में कहानीकार की यह खूबी है कि वह बिना किसी पार्टी सत्ता का नाम लिए बड़ी कुशलता से सब कुछ कह देता है। एक्स, वाइ, जेड नामक राजनेता और ईमानदार एस.पी. प्रतीकात्मक रूप में चित्रित किए गए हैं जो किसी भी शहर में पाए जा सकते हैं। कहानीकार यह बताने में सफल हुआ है कि किस भांति रसूखदारों के आगे ईमानदारी वर्तमान दौर में हारने को विवश है। ‘बांझ’ कहानी समाज के ठाए ठेकेदारों, नियमों, पितृसत्ता को चुनौती देती है। इसमें कथा नायिका पेमां जैसे स्त्रीत्व की जीत के उद्घोष के साथ कोर्ट में पेशी के समय चिल्लाकर कहती है- ‘म्हूं बांझ कोनी’। जीवन में सतत त्रासदी भोगने वाली पेमां कहानी के अंत में पुरुषत्व और रीति-रिवाजों के साथ पुलिस की भी कलई खोल देती है। ‘बांझ’ शब्द स्त्री के स्त्रीत्व पर इस कदर कलंक है कि वह अपने साथ हुआ अन्याय, अत्याचार और सब कुछ भूलकर जैसे अतीत से विद्रोह करती है।
    ‘1947’ कहानी में भारत-पाक बंटवारे की दास्तां है। रानीतिज्ञों की बंटवारे के नाम पर सिकती रोटियां और तन-मन-धन से टूटती जनता का सुंदर सफल चित्रण इस कहानी में मिलता है। ‘कुत्तौ’ कहानी का आरंभ रोमांचित करता है। कहानीकार यह बताने में सफल हुआ है कि मानव अपनी संवेदना को खोता जा रहा है वहीं संवेदनहीन समझे जाने वाले जानवरों के बीच संवेदनशीलता बची हुई है। कहानी में उच्च और मध्यवर्गीय जीवन-पद्धति पर भी प्रतीकात्मक ढंग से कटाक्ष किया गया है।
    ‘ग्यारस’ कहानी धर्म के खोखलेपन को प्रस्तुत करती है। दिखावा परस्त व्यक्ति पर किस कदर हावी हो जाता है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण कहानी में पुजारी परिवार स्वयं है। यहां धर्म की अंधता व्यक्ति के व्यक्ति होने के आभास को लीलती प्रतीत होती है। वहीं कहानी ‘पारायण’ में रिश्तों की बखिया उधड़ती नजर आती है। तो ‘गत’ की हंजा बुआ इसी धर्म और संस्कारों की वजह से किशोरावस्था में वैधव्य की त्रासदी से गुजरती हुई, घरों में काम करके गुजर-बसर करती है। मा की मृत्यु के बाद पिता का गम उसे सालता है। वैशाख महीने में पिता के नहीं रहने के बाद उसका दो सौ रुपये देना समाज के पाखंड और थोथे रीति-रिवाजों की पोल खोलते हैं।
    ‘बाथरूम-स्लिपर्स’ आधुनिकता की चकाचौंध और उच्च मध्यम वर्गीय महिलाओं की स्थिति बयां करती है तो ‘न्यारा न्यारा आबा’ अहं की टकराहट से टूटते रिश्तों और अकेलेपन से जूझते जीवन का आइना है। वर्तमान दौर में मन की कोमलता, संवेदनाएं तिरोहित होते जाने की इन कहानियों में शिल्पगत वैशिष्ट्य देखते ही बनता है।
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आधुनिकतम भावभूमि की कहानियां
० डॉ सतपाल खाती, परलीका (नोहर)  

    आधुनिक कहानीकारों में अरविन्द सिंह आशिया ने अपनी कहानियों का एजेण्डा और फण्डा स्वमेव तय कर कहानी को अत्याधुनिक शक्ल प्रदान की है। उन जैसे कहानीकारों द्वारा राजस्थानी कहानी अपने बने-बनाए और बंधे-बंधाए खांचे व सांचे से बाहर निकलने में सफल हुई है। कहानियों की विषयवस्तु के नए क्षेत्रों का सूत्रपात करने वालों में एक भरोसेमंद नाम अरविंद सिंह आशिया का है।     पुरानी वस्तुओं को कबाड़ कहकर खरीदने वाले और उन्हें ’एंटीक पीस’ बताकर बेचने वाले पात्र मोवनियां पर संग्रह की पहली कहानी ’सवासेर’ आधारित है। यह कहानी पूंजीवादी मनोवृति के कुटिल दिमाग और आम सरलमना लोगों की सोच के मध्य का अंतर स्पष्ट करती है। भाषाशैली की दृष्टि से यह कहानी बेहद प्रभावी है और व्यंग्य भरे संवाद पाठक को बांधे रखते हैं। ’अेक हाकम री मिरतु’ कहानी का कथानक नवीन तो नहीं कहा जा सकता क्योंकि ईमानदार अधिकारियों की स्थिति और भ्रष्ट राजनीति पर अनेकों कहानियां लिखी जा चुकी है। भाषा-शैली की दृष्टि से कहानी ठीक प्रतीत होती है।
    दमित नारी की व्यथा-कथा की ’बांझ’ कहानी है, जिसमें संतान नहीं होने के कारण कथा नायिका प्रताड़ना झेलती है। तंग आकर वह अपने पति को मार देती है। पुलिस हिरासत में उसके साथ बलात्कार होता है और वह गर्भवती भी हो जाती है। गर्भवती होने को वह अपनी विजय मानती है और यहीं कहानी समाप्त हो जाती है। हालांकि यह कहानी बेहद साधारण कथानक और दोहराव भरे कथ्य का ही रूप कहा जा सकती है क्योंकि हिरासत में बलात्कार जैसी घटनाएं आजकल संभव नहीं हैं। इसी प्रकार ’1947’ कहानी भारत-पाक विभाजन के समय के कथानक पर आधारित लम्बी कहानी है। इस कहानी में विभाजन की त्रासदी और तत्युगीन वातावरण चित्रित है। यह भी एक साधारण कहानी बनकर रह जाती है।
    संग्रह की प्रभावी कहानी में ’कुत्तौ’ उभरकर सामने आती है। इसमें आम आदमी का व्यवस्था के विरूद्ध अंतहीन संघर्ष को प्रकट किया गया है। भाषा-शिल्प की दृष्टि से यह कहानी अनुपम है और प्रतीक पात्र कहानी को बेहद पठनीय बना देते हैं। ’इग्यारस’ कहानी गांव के छोटे से मंदिर के पुजारी मोवनदास की व्यथा-कथा है। ’पारायण’ कहानी भी साधारण कथानक पर आधारित है जिसमें परिवार के वृद्धतम मुखिया को जबरन ’रामायण’ का पाठ सुनाकर निराहार रखते हुए मार दिया जाता है। ’हंजा भुआ’ कहानी वैधव्य के बाद मजदूरी करते हुए अपना पेट पालती अनवरत संघर्ष करने वाली स्त्री की व्यथा-कथा है। ’बाथरूम स्लिपर्स’ और ’न्यारा-न्यारा आबा’ कहानियों के माध्यम से अरविंद राजस्थानी पाठकों को महानगरीय जीवनशैली के दृश्य बारीकी से दिखाने का यत्न करते हैं। मिसेज मेहरा अपने ससुर के प्रति नफरत मानों उलीच सी देती हैं और उन्हें ’बाथरूम स्लिपर्स’ की उपमा देती हैं। कहानी बेजोड़ है और एक अपरिचित से कथानक को पाठकों तक पहुंचाने में सफलता हासिल की है।
    राजस्थानी में महानगरीय जीवन के दृश्य उपस्थित करने वाले अरविंद पहले कहानीकार हैं। आम जीवन में बदलती हुई भाषा को कहानियों में बेहिचक बरतना अरविंद को दूसरे रचनाकारों से अलग मुकाम दिलाता है। अंग्रेजी की शब्दावली सामान्य युवा वर्ग और शहरी-कस्बाई संस्कृति में रच-बस गई है और इसे स्वीकारना भी होगा।
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कथ्य और शिल्प पर खरी कहानियां
० मधु आचार्य ‘आशावादी’, बीकानेर

      राजस्थानी कहानी की खासियत उसका कथ्य और सरल भाषा शैली है। बात साहित्य के रूप में राजस्थान की साख को आधुनिक रचनाकारों ने भी जीवित रखा है। राजस्थानी कहानी ने समय के साथ अपने को भी बदला है और परिमार्जित किया है। आधुनिक राजस्थानी कथा साहित्य में अरविंद सिंह आशिया का नाम बहुत आदर के साथ लिया जाता है। उनका कहनी संग्रह ‘कथा-2’ कथ्य और शिल्प के स्तर पर चर्चित है। 
    संग्रह की 11 कहानियों में जहां विषयगत विविधता है वहीं शिल्प के स्तर पर नवीनता है। कहा जा सकता है कि अच्छी और पठनीय कहानी वह है जो अनावश्यक विस्तार न लिए हो, इस दृष्टि से भी यह कृति सफल है। सफल कहानीकार वह जो कहानी लिखते समय मुख्य रूप से यह ध्यान रखे कि उसे क्या नहीं लिखना है, इस पैमाने पर भी अरविंद जी खरे उतरते हैं।
    संग्रह की पहली कहानी ‘सवासेर’ ग्रामीण परिवेश में रची-बसी कहानी है। मानवीय व्यवहार का दार्शनिक विश्लेषण इस कहानी की खासियत है जो ग्रामीण की जरूरत, संघर्ष और मजबूरी पर भी होले से प्रहार कर जाती है। ‘एक हाकम री मिरतु’ कहानी वर्तमान लालफीताशाही और उससे त्रासद आम आदमी की व्यथा है। ‘बांझ’ कहानी “पेमा’ के जरिए सामाजिक व्यवस्था पर करारी चोट करती है। इस कहानी में प्रचलित मुहावरों का सुंदर उपयोग हुआ है जो पाठ की रोचकता बनाए रखता है।
    आजादी के संघर्ष और समाजों के मध्य उस समय पनपे विद्वैष का जीवंत दस्तावेज है कहानी ‘1947'। इस लंबी कहानी में तत्कालीन समाज की विद्रूपता को जहां एक तरफ स्वर दिया गया है वहीं जातियों के संघर्ष का प्रामाणिक इतिहास भी उकेरा गया है। कहानी उत्सुकता का भाव पाठक में जगाती है इसलिए अंत तक एक सांस में पढ़ने को विवश करती है। कहानी ‘कुत्तौ’ में जानवरी के जरिए मानवीय स्वभाव की पड़ताल है। लेखकीय दर्शन इस कहानी की खासियत है। हिकारात, गाली जैसे शब्दों के माध्यम से लोकतंत्र के मानक बताने का कठिन काम अरविंद जी ने किया है। ‘इग्यारस’ संस्कारों की जड़ता पर जहां कठोर प्रहार करती है, वहीं जीवन मूल्यों के प्रति आदर भाव जगाती है। इस छोटी कहानी में बड़ी बात कही गई है। ‘पारायण’ और ‘गत’ कहानिया समसामयिक धरातल पर रची गई है और मानव के कटु यथार्थ को सश्क्त रूप में अभिव्यक्त करती है।
    संग्रह की अंतिम तीन कहानियां ‘बाथरूम स्लिपर्स’, ‘न्यारा-न्यारा आबा’ और ‘बुझागड़ काको’ अपने कथानक के कारण बहुत प्रभावी है। प्रतिरोध और विद्रोह के स्वर इन कहानियों को महत्त्वपूर्ण बनाते हैं। इस नजरिये से देखा जाए तो कहानीकार इस संग्रह में प्रतिरोध के स्वर मुखरित करने में सफल हुआ है। राजस्थानी कहानियों का यह एक सुंदर गुलदस्ता है जो राजस्थानी साहित्य को दूसरी भाषाओं के समकक्ष खड़ा करता है। यह संग्रह इस बात का प्रमाण है कि राजस्थानी कहानी ने भी अपने को समय के साथ बदला है। यहा प्रयोग से परहेज नहीं वरन प्रयोग को आधार के रूप में प्रयुक्त देखा जा सकता है। किसी भी कथा-कृति को परखने के दो बड़े आधार- कथ्य और शिल्प को माना गया है, इन दोनों आधारों पर अरविंद सिंह आशिया के इस संग्रह की कहानियां पूरी खरी उतरती है।
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विशिष्ट शैली, शिल्प और नवीन कथ्य की कहानियां 
० राजूराम बिजारणियां, लूनकरनसर (बीकानेर)
    वक्त की आहट को ठीक से पहचान कर आस-पास की विडरूपताओं, चिंताओं, पीड़ाओं एवं जीवन के खुरदरे-चिकने दिनों से झांकते सुख-दुख को धीरज-सावचेती के साथ किसी साधक की भांति साधने का भागीरथी प्रयास रचनाधर्मी बखूबी करते हैं।
    राजस्थानी कहानी विकास-यात्रा में अरविन्द सिंह आशिया अपनी विशिष्ट शैली, शिल्प और नवीन कथ्य के दम पर अलग पहचान बनाने में सफल हुए हैं। 'कथा-2' में भाषा, शिल्प और भावों के मार्फत स्त्री-विमर्श के स्वर, संकीर्णता की पराकाष्ठा, गुणोपेक्षा, निजी स्वार्थों में उछाल, मानवीय मूल्यों का ह्रास, दरकते रिस्तों की आहट, दम घुटती संवेदनाएं शब्द दर शब्द प्याज की परतों की भांति खुलती जाती है। हमें अपने आस-पास तेजी से बदलता परिदृश्य दर्पण की तरह साफ-साफ दिखाई देता है। प्रभावशाली भाषा में मुहावरों और लोकोक्तियों का सटीक प्रयोग रेखांकित किए जाने योग्य है। बानगी स्वरूप देखें तो- एमदियै री टोपी मैमदियै माथै, एक सरपनाथ एक नागनाथ, खब्ती बस मांय सूं थोड़ै ई उतरे, ठीकरी सूं घड़ो फोड़णो, तेल देखो तेल की धार देखो, एक ई थाळी रा चट्टा-बट्टा, थूक बिलोवणो आदि। वहीं संग्रह में ऑक्सन, डिमांड लिस्ट, बेक मिरर, फीड बैक, गैलेरी, टिपिकल, सरनेम जैसे कितने ही अंग्रेजी शब्दों का खुल कर प्रयोग किया गया है किंतु ये कहीं अखरते नहीं, बल्कि भाषा में घुलमिल उसके अंग बन जाते हैं।
    'एक हाकम री मिरतु' कहानी में पात्र एक्स, वाई, जेड को केंद्र में रखकर समाज की मनोवृत्ति का खुलासा करते हुए 'नाम के भीतर नाम' और 'चेहरे के पीछे चेहरे' की खामियां उजागर करते-करते राजनैतिक स्वार्थों को भी बेपर्दा करने का साहस कहानीकार दिखाता है। बंटवारा हर हाल में दुखद होता है, चाहे किसी भी प्रकार का हो.! रिस्ते-नाते,  सीर-संस्कार, घर-परिवार, संवेदना-सरोकार इत्यादि सब कुछ मुठ्ठी से रेत की तरहा फिसलते जाते हैं। कहानी '1947' में भारत-पाकिस्तान के विभाजन की कुछ ऐसी ही त्रासदी बयां हुई है।
    'बांझ' कहानी में  दंभ भरती पुरुष-मानसिकता स्त्री को महज उपभोग की वस्तु मानना व्यापकता से चित्रित हुई है। ‘पण तो ई मरद मरद बाजै। चूंतरा माथै पङ्या पांगरै, जलम्या जद सूं मर् या तद तांई मरद। अर थूं....कदेई लुगाई, कदेई रांड, कदेई चुड़वैलण, कदेई सिकोतरी, कदेई डाकण, कदेई वायरै में आयोड़ी। थारी मरजी कुण पूछै?’ यहां कहानीकार नारी सशक्तिकरण के अनेक प्रश्न प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष खड़े कर झकझोरता है। वहीं लाइफ स्टाइल में आधुनिक रंग भरने को तत्पर उच्च मध्यम वर्ग की नारी मानसिकता का मनोविश्लेषण कहानी ‘बाथरूम-स्लिपर्स’ में देखा जा सकता है। यह कहानी हमें सोचने पर विवश करती है।
कहानी ‘गत’ नायिका हंजा भुआ के इर्द-गिर्द घूमती एक बाप की पीड़ा को खुद के भीतर समेटे है जो बेटी के जरिए बड़ी मार्मिक बन पड़ी है। कहानी ‘सवासेर’ में शेर पर सवाशेर से हम रू-ब-रू होते हैं, तो आम आदमी की बेबसी का पोस्टमार्टम करती 'कुत्तौ' कहानी में विवशता को छुपाने एवं गरीबी को ढांकने में तुलसी-पत्र का सहारा कहानी 'इग्यारस' में देखा जा सकता है। 'न्यारा-न्यारा आबा' रिश्तों की टूटन और एकाकीपन की सशक्त कहानी है।
    अरविंद सिंह आशिया की कहानियों के पात्र जीवन से कदमताल मिलाते, आधुनिक कहे जाने वाले समाज की अनेक त्रासदियों को जीवंत रूप में वर्णित करते हैं। ये कहानियां शिल्प और भाषा से पहचान बनाने में सक्षम है।
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लोक रंगों और घनीभूत भावनाओं की कहानियां
० डॉ. जयदेव पानेरी, उदयपुर

    जैसे ही कथा-2 संग्रह के बारे में लेखन का विचार किया वैसे ही बरसों पहले पढ़े प्रसिद्ध आलोचक डॉ. नगेंद्र के एक निबंध ‘साहित्य में आत्माभिव्यक्ति’ का मूल प्रश्न ‘मैं क्यों लिखता हूं...’ मस्तिष्क की जाने कौनसी खोह से निकलकर मानस पटल पर लहराने लगा, किंतु अपने मूल स्वरूप में नहीं, बल्कि मेरी इस मौलिक ध्वनि के साथ कि आज की नयी पीढी को जब किताबों से ‘कै’ आती है तो ‘मैं क्यों पढ़ता हूं...’। नगेंद्र जी ने तो बेहद खूबसूरत और विस्तृत शब्द-वितान के साथ अपने प्रश्न को विश्लेषित किया है लेकिन मेरी सामर्थ्य पांडित्य की नहीं महज शब्द-यात्री की है, इसीलिए अपने मानस में उठे इस प्रश्न को कि ‘मैं क्यों पढ़ता हूं’ का बेहद सरल सा जवाब ही पाता हूं और वो ये है कि ‘अरविंद जी जैसे लेखक आज साहित्य की पतवार थामें हैं शायद इसलिए...’।
मैं ये नहीं कहता कि मैनें हिंदी के पुराने रचनाकारों की भांति नये लेखकों बहुत को पढ़ा है लेकिन ये कह सकता हूं कि जितने लेखक पढ़ें हैं उनमें अरविंद जी का मिजाज कुछ हटकर है और शायद ‘हटकर होना’ ही ‘अपने होने को’ आज के समय मे साबित करने का एक मुख्तसर-सा अंदाज है। कथा-2 इसका उदाहरण है। वैसे इसे योग ही कहूंगा कि अरविंद जी से मेरा व्यक्तिशः संपर्क भी रहा और मैनें पाया जैसे वे हैं, वैसे वे नहीं हैं। फर्राटे से अंग्रेजी बोलते हुए अचानक हिंग्लिश में चुटकियां लेने लगते हैं और बीच-बीच में उर्दू के लफ्जों को यूं बेसाख्ता बुरका देते हैं, लगता है भाषा की पाकशाला में ऐसा अनुपम पकवान तैयार हो रहा है जिसका नामकरण अभी शेष है। लेकिन इस अंग्रेजी पसंद शख्सियत में इतना संवेदनशील देसीपन होगा यह यह अंदाजा लगाना बिना इनकी कलम का कमाल देखे संभव ही नहीं है। इन्हें मारवाड़ से बाहर आकर मेवाड़ में बसे एक अर्सा हो गया लेकिन फिर भी मारवाड़ इनमें बना रहा, अर्जन भले ही हिंदी में किया लेकिन सर्जन का सेतु राजस्थानी ही बनी। कथा-2 संग्रह इसका प्रमाण है। कहानियों में बिखरे धोरों की धरती के लोकरंग जहां इन्हें मायड़ संस्कारों से जोड़ते हैं तो वहीं इनकी कहानियों की गहरी और घनीभूत संवेदनाएं पाठक के लिए मानस मंथन का कारण बन जाती है।
कथा-2 की कहानियॉं साहित्य के सामाजिक सरोकारों को ईमानदारी से निभाती है। ‘एक हाकिम री मिरतु’ में जिस राजनैतिक स्याह पाताल गंगा के दर्शन होते हैं वह पाठकों की वास्तविक दुनियां से परे नहीं है। इस कहानी में आम आदमी की त्रासद दशा के चित्र पाठक को बैचेन करते हैं। कहानी ‘सवासेर’ ऊपरी तौर पर भले ही हास्य कथा लगे लेकिन अंतर्दृष्टि युक्त पाठक पाता है कि हमारे यहां एक ही समाज के दो छोर हैं एक छोर पर दूसरों को बेवकूफ बनाकर जीवन करने यापन की विवशता हैं तो दूसरे छोर के लोगों के लिए बेवकूफ बनकर भी जी जाने की मजबूरी है। कथांत में एंटिक बक्से का टूटकर्र इंधन में बदल जाना इंगित कर जाता है कि जीवन तो हल्का फुल्का ही है ख्वाहिशों का बोझ ढोते-ढोते हम कब दो पाये से चौपाये बन जाते हैं, पता ही नहीं चलता।
इसी संग्रह की कहानी ‘1947’ अपने विस्तार के साथ ही पाठक की संवेदनाओं को टटोलती चलती है तथा अपने अंत के साथ ही यह प्रमाणित करने में सफल होती है कि ‘इंसान को ईश्वर ने बनाया है और सरहदों को इंसान ने इसीलिए इंसान आज भी सच्चा है और सरहदें बेईमान’।
महादेवी ने ‘नीरभरी दुःख की बदली’ लिखकर जिस पुरूष प्रधान समाज में स्त्री पीड़ा को स्वर दिया उसी पुरूष प्रधान समाज को लानत के कठघरे में घेरकर अट्टाहास करती ‘बांझ’ कहानी की ‘पेमा’ भीतर तक झकझोर जाती है। पेमा के अट्टाहास के साथ कहानी भले ही समाप्त हो जाती है लेकिन एक चिंतन आरंभ होता जो स्त्री की दारूण स्थिति पर सभ्य समाज को विचलित करता है।
‘कुत विधि रची नारि जग माही, पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं’ लिखकर बरसों पहले तुलसी जिस सवाल को छोड़ गये वह आज भी अनुत्तरित ही है। अरविंद जी की कहानी ‘गत’ उसी सजल श्रद्धा स्वरूपा स्त्री की भावनाओं को स्वर देती है। हंजा गरीब है, विषम परिस्थिति में है लेकिन पिता से मिलना उसके लिए एक साध है। पिता के नहीं रहने पर गरीब होते हुए भी महज इस विश्वास पर एकत्र धनराशि से प्याऊ लगवा देना कि शायद पिता को इससे मोक्ष मिल जाए, भीतर तक पाठक को भिगो जाती है।
‘ग्यारस’ कहानी में समर्पण की पराकाष्ठा दिखाई देती है प्रसाद की आकांक्षा में भूखा रहा परिवार का मुख्य पात्र तुलसी दल से व्रत खोल ग्यारस का पुण्य प्राप्त करने का बहाना बनाकर अपना दर्द छिपा ले जाता है। लेकिन पाठक उसके दर्द की नमी को बेहद करीब से महसूस करता है। इसी संग्रह की कहानियां पारायण, बुझागड़ काका और बाथरूम स्लीपर भी अपने आप में विविध रंगों को समेटे हुए है तथा पाठक को बांधने में सफल रही है।
साहित्य में कठिन लिखना सरल है लेकिन सरल लिखना बहुत कठिन है,  यह कठिन कार्य अरविंद जी ने मायड़ भाषा के लिए किया है। और तब जब राजस्थानी अपनी मान्यता के लिए संघर्ष कर रही है  ऐसे में अरविंद जी जैसे लेखक जिस दक्षता से इस मायड़ भाषा में अपने हृदय को ढाल रहे हैं तो लगता है कि सरकारी प्रमाणपत्रों से इतर यह भाषा स्वयंमेव अपने हस्ताक्षर है। लोक रंगों और घनीभूत भावनाओं में सीझती-भीगती ये राजस्थानी कहानियां आंगन से उठी वह सौंधी महक है जो इत्रों से भरे बाज़ार में अपनी मौलिकता से पहचानी जाएगी। मायड़ भाषा के मानस पुत्र को पाठकों की कोटिशः शुभकामनाएं।
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शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2016

पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ का कहानी संग्रह : ‘‘ मेटहु तात जनक परितापा’’

मेटहु तात जनक परितापा (राजस्थानी कहानी संग्रह) पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ संस्करण : 2012 / पृष्ठ : 112 / मूल्य : 80 रुपये / प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, एफ-77, सेक्टर- 9, रोड नं. 11, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर 
पूर्ण शर्मा ‘पूरण’
जन्म : 01 जुलाई, 1966 रामगढ़ (हनुमानगढ़)
नई पीढ़ी के सर्वाधिक चर्चित कहानीकार। कविता-कहानी और अनुवाद के साथ विविध विधाओं में लेखन। दो राजस्थानी कहानी संग्रह प्रकाशित- ‘डौळ उडीकती माटी’ और ‘मेटहु तात जनक परितापा’। आपकी कहानियों के मारठी-अनुवाद दो संग्रह- ‘अेक सुपना चा अंत’ और ‘विखुरेलेले आकाश’ प्रकाशित हैं। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के उपन्यास का आपने राजस्थानी अनुवाद ‘गोरा’ किया जो साहित्य अकादेमी नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित एवं ‘साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार’ से सम्मानित है।
संपर्क : प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, रामगढ़- 335504 (नोहर) हनुमानगढ़
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पुस्तक के ब्लर्ब का अनुवाद :
जीवन की तलाश में संघर्षशील पात्रों की कहानियां 
० श्याम जांगिड़, चिड़ावा (झुंझुनू)
    इन दिनों राजस्थानी कहानी के क्षेत्र में अग्रिम पंक्ति के जिन कहानीकारों ने उसे आधुनिक और असरदार बनाने का बीड़ा उठा रखा है, उनमें पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ का नाम बड़े उत्साह से लिया जाता है। ‘पूरण’ ने कहानी में अपना आना एक लम्बी तैयारी के साथ किया है। इनका पहला कहानी संग्रह इसी बात का साक्षी है। इस कहानी संग्रह की साहित्यिक जगत में खूब चर्चा रही है।
    ‘पूरण’ की भाषा जरा हटकर है, जो अपनी तरलता और सहजता के दम पाठक को बांधे रखती है। अपनी कहानी में अनुकूल भाषआ को ढूंढ़ लाना ही इन्हें औरों से अलग करता है। नित-नए शिल्पगत प्रयोग और उस पर भी कथारस को बनाए रख पाना, कोई इनसे सीखे। राजस्थानी कहानी को अन्य भारतीय भाषाओं की कहानी से जरा कदम आगे बनाए रखना इनकी कोशिस रही है। इसी कोशिस का परिणाम है संग्रह में आयी इनकी कहानी ‘सिमेंट की लड़की’। यह एक प्रतीकात्मक कहानी है, जो पात्रों की मनःस्थिति को प्रतीकों के माध्यम से उभारती है। संग्रह की शीर्षक कहानी ‘मेटहु तात जनक परितापा’ भी इनके इसी प्रयोगात्मक तेवर को दर्शाती है।
    कहानीकार का यह दूसरा कहानी-संग्रह अपने भीतर कई बेजोड़ कहानियां समेट लाया है। ‘बाग चिड़िया और स्वप्न’, ‘आईना झूठ बोलता है’, ‘जोगन’, ‘मेटहु तात जनक परितापा’, ‘फिर वहीं जीना’, ‘सिमेंट की लड़की’, ‘मोर तूने खूब गाया’, ‘मैं जीना चाहता हूं’, आदि कहानियां खूबसूरत रचनाएं हैं। निश्चय ही ये रचनाएं राजस्थानी कहानी में अपना एक निश्चित स्थान पा सकेंगी।
    पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ के पात्र अपनी ही परिस्थितियों में उलझे पर संघर्षशील हैं। कहानीकार अपने यहां कथानक ही ऐसा उठाते हैं जहां विद्रोह की गुंजाइश न के बराबर रह जाती है। मतलब यह कि ऐसी परिस्थितियां जहां मन चहुं ओर से घिर जाता है। ऐसी स्थिति में कहानी के भीतर किसी कोने से रिस आयी संवेदनाओं का दर्द पाठक को बींध-बींध देता है। ‘जोगन’ कहानी इसका उदाहरण है। ‘जोगन’ की नायिका कैसे और किससे विद्रोह करे? एक-एक कर अपने सामने आती मुश्किलें उसके समूचे वजूद को ही लील जाती हैं। ठीक इसी तरह ‘मेटहु तात जनक परितापा’ एक ऐसे बेबस और बेचारे बाप की कहानी है, जो अपने प्रत्यक्ष दीखती बदनामी को भी आखिरकार अपना हित मान लेने को मजबूर है। माने यह कि इनके सभी पात्र अपनी अंतिम सांस तक जीवन की तलाश में संघर्षशील हैं।
    मुझे पूरा विश्वास है कि ‘पूरण’ का यह कहानी संग्रह पाठकों को भाएगा, साथ ही साहित्यिक जगत में भी सराहना पाएगा।
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राजस्थानी कहानी के भविष्य के प्रति आश्वस्त करती कहानियां
० डॉ.मंगत बादल,रायसिंह नगर
      नई पीढ़ी के कहानीकारों में पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ एक जाना-पहचाना नाम है। ‘मेटहु तात जनक परितापा’ कहानी संग्रह इसका साक्ष्य है। इस संग्रह में उनकी पन्द्रह कहानियाँ हैं, जो अलग-अलग विषयों और भावभूमि पर रचित हैं। ‘बनवारी नै कुण मारियो’ एक मनोवैज्ञानिक कहानी है। अपनी परम्पराओं और रूढ़ियों को मानने वाला बनवारी एक छोटी-सी बात से इतना आहत हो जाता है कि अन्त में वह अपनी जीवन लीला ही समाप्त कर लेता है।‘बाग चिड़ी अर सपनो’ कहानी समाज में निरन्तर बढ़ती गुंडागर्दी को लेकर है। गुंडा तत्त्व लड़कियों को सरेआम छेड़ते हैं, उन पर तेजाब तक फेंक देते हैं लेकिन समाज में कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं होती।
‘आरसी झूठ बोलै’ कहानी में भारतीय नौकरशाही का पर्दाफास किया गया है कि देश में आँकड़ों की खेती किस प्रकार की जाती है? ‘कीं तो बाकी है’ कहानी इस बात की ओर संकेत करती है कि साम्प्रदायिक विद्वेष की जड़ों को कहीं न कहीं आर्थिक असमानता भी सिंचित करती है। ‘कर्फ्यू’ चाहे छोटा सा शब्द है किन्तु इसकी मार झेलने वाले जानते हैं कि यह कितना खतरनाक है। प्रतिदिन निरन्तर बढ़ती हुई असहिष्णुता जब साम्प्रदायिक दंगे का रूप धारण कर लेती है तो सामाजिक ढांचे को अस्त-व्यस्त कर देती है।
      ‘मेटहु तात जनक परितापा’ कहानी मातृविहीन पुत्री के विवाह योग्य होने पर होने पर बाप की चिन्ताओं को लेकर है। जाति-पाँति,समाज के रीति-रिवाजों और शास्त्रों को मानने वाले पंडित जी को जब बेटी की समीज की जेब में प्रेम-पत्र मिलता है तो वे एक तरह से आश्वस्त हो जाते हैं कि उनकी बेटी जो भी निर्णय लेगी वह ठीक होगा। ‘गोरू काको’ कहानी बतलाती है कि प्रत्येक व्यक्ति की पसन्द और प्रतिभा अलग-अलग होती है। सब को एक साथ हाँकना अत्याचार ही है। गोरू जैसे समाजसेवी और परोपकारी व्यक्ति को जब कोई विपरीत दिशा में हाँकना चाहेगा तो क्या परिणाम निकलेगा?‘तास री गट्टी’ एक मनोवैज्ञानिक कहानी है जब कि ‘जोगन’ औरत की पीड़ा और विवशता की कहानी है। इन्दरो का पति जब घर छोड़कर संन्यासी बन जाता है तो उसे घर की चारदीवारी के भीतर जो कुछ सहन करना पड़ता है वास्तव में वह उसे एक योगिनी ही बना देता है। यह एक अत्यन्त मार्मिक कहानी है। सांयत झील, फेर बठै ई जीणो,खिंडतो आभौ आदि प्रत्येक कहानी किसी न किसी सामाजिक समस्या का बड़ी सिद्दत से चित्रण करती है।
       ऊपर से छोटी और सामान्य दिखलाई पड़ने वाली घटनाएं कितनी मार्मिक हैं, इन कहानियों में चित्रित है। कहानियों की भाषा पाठक को अपनी रौ में बहा ले जानेमें सक्षम है। कहानियों की भाषा यथार्थ की परतें उधेड़ती हुई हमारी संवेदनाओं को झकझोरती हैं। लेखक ने इन कहानियों में शिल्प के नये प्रयोग किये हैं, जो पाठक को प्रभावित और राजस्थानी कहानी के भविष्य के प्रति आश्वस्त करते हैं।
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मेटहु तात जनक परितापा....
० सतीश छिम्पा, सूरतगढ़

    "मेटहु तात जनक परितापा" पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ का दूसरा कहानी संग्रह है। राजस्थानी कहानी में पुराने शिल्प के समानांतर एक नए शिल्प को उभारने वालों में पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ एक महत्वपूर्ण नाम है, इस संग्रह से पूर्व उनका 'डोळ उडीकती माटी' संग्रह प्रकाशित हो चुका है। मानवीय संवेदनाओं को स्वर देने और पात्रों को जीवन्त रूप प्रदान करने के ‘पूरण’ सिद्धहस्त कहानीकार हैं। उनके यहां उधार के सरोकारों की जगह भोगा हुआ यथार्थ है, या ऐसे भी कहा जा सकता है कि जो कुछ उनकी कहानियों में घटित होता है या कहानीकर मन द्वारा घटित करवाया जाता है वह रामगढ़,नोहर और भादरा की जमीन से किसी न किसी रूप में जुड़ा हुआ प्रगट होता है।
    पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ की कहानियाँ सजीव पदार्थ की चेतना और उनसे जुडी संवेनाओं का मूर्त रूप है, कोरा, थोथा आदर्श और सामन्तवादी दृष्टिकोण उनके यहां नहीं है। किसी भी कहानीकार के लिए जरूरी है- लोक और चीजों के प्रति उसका अन्वेषी दृष्टिकोण हो, अगर वह एक निवारक खोजी की तरह वस्तुओं को नही देखता है तो उसका कहानीकार संदिग्ध है, खुशी है कि पूर्ण शर्मा  ‘पूरण’ के कहानीकार में उक्त आधार विशेषतः मौजूद है। ‘खिंडतो आभो’, ‘सिम्मट री छोरी’, ‘फेर बठैई जीणो’,  ‘गोरु काको’ कहानियां इसके बेहतर प्रमाण हैं।
    पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ की भाषा प्रभावित करती है, टिंच करती हुई टणकाटेदार जो पाठक को कहानी के बीच ऊब महसूस नहीं होने देती बल्कि उन्हें अंत तक बांधे रखती है।
    इस संग्रह की सभी कहानियों में पात्र आर्थिक और सामाजिक संघर्षों में इस भांति उलझे हैं कि उनकी जियाजूण और संघर्ष एकमेक से लगते हैं, यह लेखक की स्याणप ही है कि उसने अपने पात्रों को खुला न छोड़कर कुछ खांचों में बांध दिया है। प्रस्तुत कहानियों में बहुत जगहों पर कोरा, उबाऊ और बोझिल-सा दिखावटी आदर्शवाद भी सामने आता है, जो मनुष्य की मूल-प्रवृत्ति से एकदम उलटा है। "मोरिया आछो बोल्यो रै....." कहानी को सोच-समझकर रोमानियत का पुट दिया गया है, और औरत को कुछ ज्यादा ही ईमानदार बनाने की कोशिश में कहानीकार भावों की ठोकर खा गया और कहानी 'अजीब-सी' हो गयी।
    राजस्थानी कहानी में जिस तरीके से बदलाव आ रहा हैं उसे देखकर एक बेहतर भविष्य का सहज ही अंदाज़ा हो जाता है। पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ इस बदलाव के आधार कहानीकार माने जा सकते हैं।
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आधुनिक भाव-बोध की सबल कहानियां
० नवनीत पाण्डे, बीकानेर
राजस्थानी के चर्चित कथाकार पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ का दूसरा कहानी संग्रह है- ‘मेटहु ताज जनक परितापा’। संग्रह का नाम जरूर कुछ भ्रमित करता है पर इसके पाठ के बाद सारे भ्रम दूर हो जाते हैं। संग्रह की कहानियों में आधुनिकताबोध का विकास परंपरा को आधार बनाते हुए किया गया है। पहली कहानी ‘बनवारी नै कुण मारियो’ से लेकर अंतिम कहानी ‘सांयत झील’ तक की सभी कहानियों में हमारे आस-पास की कहानियां होते हुए भी जो परिवेशगत नवीनता और पात्रों का जीवन को लेकर जो व्यवहार है वह रेखांकित किए जाने योग्य है। राजस्थानी भाषा में नवीन भाषिक प्रयोग जिन में पठनीयता को बचाते हुए काव्यात्मकता और भाषिक लय से जो अनुभव अभिव्यक्त होते हैं वे हमारे स्मृति में जैसे रच-बस जाते हैं। कथावस्तु के लिहाज से ‘मेटहु ताज जनक परितापा’ की कहानियों के पात्र नए नहीं है पर वे अपने ट्रीटमेंट, प्रस्तुतिकरण के लिहाज से मनमोहक है। ‘बनवारी नै कुण मारियो’ कहानी जहां रिस्तों में छिजती मानवी संवेदनाओं की परतें उघाड़ती है वहीं ‘बाग चीड़ी अर सुपनौ’ की सुनीता दीदी के बहाने कथाकार ने आज समाज में जवान होती युवा पीढ़ी में प्रेम के नाम पर हो रहे चरित्रिक और नैतिक पतन की विड़ंबनाओं को उजागर करती है।
‘सिम्मट री छोरी’ में बचपन से जवानी की दहलीज पर सपनों और प्रेम के सुंदर प्रतीक जिस ढंग से प्रयुक्त किए गए हैं वे सब इतने व्यवस्थित है कि बिना कौशल के यह असंभव था। ‘मोरिया आछौ बोल्यौ रै...’ में रेवड़ चराने वाला और मीठे गीत गाने वाला बाजीगर मनीराम उर्फ मनियौ के प्रेम और विवाह संबंधों की अनूठी त्रासदी चित्रित हुई है। धन की सत्ता से मानवीय संबंधों यहां तक कि कुंवारापन उतारने तक की चेष्टा अपने संश्लिष्ट रूप में बहुत करीने से कहानी में अभिव्यक्त हुई है।
‘कीं तौ बाकी है’ कहानी में एक तरफ बुखार से पीड़ित अन्नू, अनवर की पत्नी, बूढ़ी मां है तो दूसरी तरफ गांव में फैली बीमारी री विड़रूपता। अन्य समुदाय को सांप्रदायिक सोच और दंगै के कारण मानने समझने वाले और तनाव की आग में जलते गांव में कर्फ्यू के हालात मार्मिक है। कहानी में जीवंतता ऐसी उजागर होती है जैसे कि कहानी हमारे सामने घटित हो रही है।
शीर्षक कहानी ‘मेटहु तात जनक परितापा’ एक पिता की पीड़ा का दस्तावेज है। विवाह योग्य बेटी के विवाह नहीं हो सकने का तनाव है उसी बीच उसका लव लैटर और कहानी का टर्न अविस्मरणीय है।
‘मेटहु तात जनक परितापा’ की 15 कहानियां जैसे 15 रंग लिए हुए है। कुंवारा जोगी, गौरु काका, बाजीगर मनीराम, राजिंदर जैसे चरित्र कहानीकार पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ ने अपने आस-पास से चुने हैं। ये चरित्र मानवीय संबंधों के बनते-बिगड़ते विभिन्न ग्राफ को प्रस्तुत करते हुए अपने देश-काल की सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं। यही इन कहानियों का सबल पक्ष है।
पूर्ण शर्मा के यहां यर्थाथ, परिपक्व भाषा, शिल्प और बुनावट के कौशल से कथा साहित्य में एक स्थाई उपस्थिति दर्ज कराते हैं। चरित्रों की मनोदशा को दर्शाने में कहीं कहीं विस्तार अनावश्यक भी लगता है किंतु समग्र प्रभाव में ये कहानियां अपना स्थाई असर पाठकों पर छोड़ती है।
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 आधुनिक कथा-जगत का एक रुपहला पन्ना
० जितेंद्र निर्मोही, कोटा
राजस्थानी साहित्य का कथा जगत ‘विश्रांत प्रवासी’ से प्रारंभ होकर आज जिस आधुनिक भावबोध की भूमि पर खड़ा है, उसे विद्वान जानते हैं। आधुनिक कहानीकारों में पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ एक जाना-पहचाना नाम है। उनकी कथा-यात्रा ‘डील उडकती माटी’ से प्रारंभ होकर रवां होती है और आगे चलकर उनकी कहानियों के अनुवाद मराठी, पंजाबी, मलयालम, हिन्दी आदि भाषाओं में होने लगते हैं। वे स्वयं अनुवाद के क्षेत्र में साहित्य अकादमी नई दिल्ली से राजस्थानी में पुरस्कृत किए गए हैं। साहित्य की अहर्निस यात्रा उन्हें पहचान दिलाती है और उन्हें राजस्थानी भाषा के दूसरे कहानी-संग्रह ‘मेटहू तात जनक परितापा’ पर प्रतिष्ठित पुरस्कार स्व. गोरी शंकर कमलेश स्मृति राजस्थानी भाषा पुरस्कार एवं सम्मान वर्ष 2016 प्राप्त होता है। हनुमानगढ़-गंगानगर क्षेत्र से एक ऐसी खुशबू साहित्य जगत में दिखाई दे रही है, जैसी किसी समय बंगाल की धरती से देखी जाती थी जिसने कई श्रेष्ठ कथाकार दिए थे। भरत ओला, मंगत बादल, रामस्वरूप किसान, डा. सत्यनारायण सोनी आदि इसी धरा के कहानीकार हैं।
    सच कहा जाए तो पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ आधुनिक कथा-जगत का एक रुपहला पन्ना है। साहित्यकार श्याम जांगिड़ लिखते हैं- ‘पूरण की भाषा निराली है, वे पाठकों को अपनी बारीक और सुंदर-सुगठित भाषा से बांध लेते हैं। कथा अनुकूल भाषा प्रयुक्त करना उनकी विशेषता है।’ सच कहूं तो वे प्रयोगधर्मी कहानीकार हैं जो आधुनिक जगत में कथा के नाते सूत्र तलाश करते दिखाई देते हैं। इसीलिए उनकी प्रतिकार कथाएं भी पहचान पाती है। इस कृति में जमाने और अपने परिवार के परिवेश से जूझता किसान है। जो आत्महत्या करने को मजबूर हैं, समाज से पीड़ित दलित मजदूर हैं, खूबसूरत लड़कियों का तेजाब से झुलसना, किसानों की फसल पर मौसम की मार, आदमी पर बाजार की मार, पोंगा पंथी रुढ़िवादिता पर चोट उनकी कहानियों में देखी जा सकती है।
    पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ का कहानीकार रुग्ण सामाजिक मानसिकता के साथ अपना कथा मनोविज्ञान जोड़ कर एक कहानी ‘बनवारी नै कुण मारियो’ से सवाल प्रस्तुत करते देख सकते हैं। हमारे सामाजिक सरोकार उनकी कहानियों में उनके गांव के भौगोलिक परिवेश के साथ देखे जा सकते हैं। उनके यहां टिब्बे हैं, रुंख हैं, बी.पी.एल. का मजदूर हैं, अपनी अस्मत बचाती किशोरी है, फसलों से जूझता किसान आदि है। वे ग्रामीण संवेदनशील लेखक के साथ साथ मन से दार्शनिक भी है।
    उनके कथ्य शानदार है, वे अपनी भाषा के साथ अपना निजी शिल्प खड़ा करते हैं। इसलिए वे ग्रामीन जन जीवन और राजस्थान की मिट्टी से जुड़े कहानीकार हैं। जिस कहानीकारों को बातें बनानी नहीं आती जो कोई मुहवारा गढ़ना नहीं जानते, वहीं ऐसा सीधा-साधा कथ्य प्रस्तुत कर सकता है। पूरण शर्मा ‘पूरण’ ऐसे ही कहानीकार हैं। उनके जैसी कहानियां ए.सी. में बैठकर नहीं लिखी जा सकती।
    राजस्थानी भाषा में हरियाणवी ठसका है, पंजाबी लहजा, झिलमिल-झिलमिल हंसी के मध्य झरझर झरते नैन, खास बात तो यह है वे मजदूर वर्ग किसान की भाषा जानते हैं। इन पंद्रह कहानियों में दुखांत ज्यादा है, सुखांत कम। अस्तु ‘मेटहु नाथ जनक परितापा’ शीर्षक भी सार्थक होता है। संग्रह आम जन की पीड़ा को चित्रित करने के साथ सामाजिक सरोकारों के प्रति भी सावचेत करता है। इन कहानियों से वे राजस्थानी कहानी में नई पीढ़ी के प्रमुख हस्ताक्षर सिद्ध होते हैं।      
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डूबकर तैरने को मजबूर करती कहानियां
० ओमप्रकाश सिंघाठिया, रामगढ़ (हनुमानगढ़)
राजस्थानी भाषा साहित्य में आधुनिक राजस्थानी कहानीकार के रूप में पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ का नाम अग्रिम पंक्ति में लिया जाता है। पूरण की कहानियां अपने आसपास की घटनाओं को इस कदर सूक्ष्मावलोकन करती दिखती हैं कि वे अपने समय का ही नहीं बल्कि आने वाले समय का भी सच हो जाती हैं। उनकी कहानियों में भाषा की तारतम्यता बनी रहती है। पाठक को पता ही नहीं चल पाता और वह कथा रस में डूबा कथा के साथ-साथ ही आगे बढ़ने लगता है। भाषा में सरल शब्दों के साथ नए प्रयोगों को प्रस्तुत कर पाना संग्रह की भाषा में चार चांद लगाता है।
    संग्रह की प्रत्येक कहानी जहां यथार्थ की ऊपरी सतह को परिलक्षित करती चलती है वहीं उसके भीतर बहते चीन्हे-से सच को भी प्रकट करती दिखती है। कथा संग्रह का शीर्षक ‘मेटहु तात जनक परितापा’ एकबारगी तो हिन्दीनिष्ठ और विचलित करने वाला प्रतीत होता है, पर पूरा संग्रह पढ़ने पर यही शीर्षक सटीक लगता है। कहानी ‘बनवारी नै कुण मारियो’ से लेकर ‘सांयत झील’ तक हर कहानी पाठक को कथारस में ऊभचूभ रखती है। पाठक कहानी के सांकेतिक और मार्मिक यथार्थ को अपने ढंग से आत्मसात कर सके इसके लिए शब्दों की सरलता और सहजता मायने रखती है। शब्दों को दिखावटी परिधान और लबादों से अलग रख पाना कोई ‘पूरण’ से सीखे। सीधे मर्म पर चोट करती संग्रह की भाषा इसकी उपलब्धि है। पाठक कथा को सहजता से समझ सकता है, वह कहानी में प्रवहित विचार और यथार्थ को अपनी बुद्धि और समझ से संश्लेशित-विश्लेशित कर सकता है, यह बड़ी बात है।
‘पूरण’ की कहानियां अपने समय का सच उजागर करती बेखौफ कहानियां हैं। वे समय के मैदान में डरी-सिकुड़ी और किसी अबला की तरह नहीं बल्कि अपनी पूरी तैयारी और तेवर के साथ उतरी दिखती हैं। कहानी ‘सिमट री छोरी’ में जवानी के सपनों को प्रेम के साथ सुंदर ढंग से चित्रित किया गया है। कहानी ‘मोरिया आछौ बोल्यौ रै’ में मनीराम की विडम्बना के साथ-साथ आज के समय के जिस को उजागर किया गया है वह बहुत भयानक है, .... ’  बावळा मंझ टिपग्यौ। इब किण री उडीक करै ?  थूं सोचतौ हुयसी रिस्तौ चालनै आयसी। वै दिन लदग्या। छोरियां नै तौ मसीनां खायगी। आखी झ्यान मांय टोटौ आयरियो है। तीस-तीस साल रा कूंगर फिरै इयां ई।’
 कहानी ‘कीं तो बाकी है’ में धर्म और जातिगत-सामाजिक पीड़ा को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है वहीं कहानी ‘मेटहु तात जनक परितापा’ समाज में आधुनिक समस्या का जीवंत चित्रण है। इसी प्रकार अन्य कहानियां ‘गोरू काको’, ‘‘माटी री आंख्यां’, ‘जोगण’, ‘म्हैं जीणौ चावूं’, ‘‘फेर बैठैई जीणौ’ आदि अलग-अलग रंग और विभिन्नता लिए मगर यथार्थ को चित्रित करती कहानियां है जो अपने कथा रस में पाठक को डूबकर तैरने को मजबूर करती हैं।
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मानवीय संवेदनाओं का दस्तावेज  कहानियां
अशोक शर्मा, भीलवाड़ा
पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ का कहानी संग्रह ‘मेटहु तात जनक परितापा’ मानवीय संवेदनाओं का जीवन्त दस्तावेज है। मानव मन की अंतर्व्यथा व भीतरी हलचल को उकेरा गया है। इसमें वर्तमान समय के भीतर बसे द्वद्व और जटिल संवेदनाएं सहज सरल भाषा में उजागर होना अपने आप में विशिष्ट है।
कहानी ‘बनवारी नै कुण मारियो’ में मानवीय गरिमा, स्वाभिमान और अन्तर्मन के दरकने का सजीव चित्रण है। कहानी में आदमी के बिखरने की व्यथा कथा शब्द-दर-शब्द सजीव होती चली जाती है।
कहानी ‘तास री गट्टी’ के माध्यम से गत दशकों के जीवन की झांकी, गली-गुवाड़ की गुरबत और देहाती जीवन के मनोरंजन के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि आदमी घर की देहरी के भीतर बहुत कुछ सहन करता जाता है मगर देहरी के बाहर वही बात उसके अहम को चोट मारती है और वह ताशा के पत्तों की नांई बिखर जाता है। जब कहानी की पात्र ‘काकी’ ताश खेलते लोगों के बीच कचरा लाकर डाल देती है तो ताश के साथ-साथ कथा नायक ‘काका’ भी जैसे बिखर जाता है। यह कहानी मानवीय मन का अफसोस व पश्चाताप सहजता से प्रकट करती है। कहानी के अंत में काकी का ताश की नई गड्डी लाकर देना पानी में शहद की तरह घुल जाने जैसा प्रतीत होता है।
कहानी ‘सांयत झील’ के माध्यम से जहां एक तरफ लिंगानुपात बिगड़ने से पैदा हुई वर्तमान ज्वलंत समस्या को उजागर किया गया है वहीं दूसरी ओर एक बुजुर्ग महिला ‘दादी’ का अपने बच्चों के प्रति अनुराग व अपनत्व का स्वाभाविक चित्रण देखा जा सकता है।
संग्रह की भाषा-शैली व संवाद-योजना परिवेशगत व पात्रोनुकूल है। सहजता से प्रयुक्त प्रतीक-बिंबों ने पात्रों के अन्तर्मन की हलचल व भावों को सजीव तथा बोधगम्य कर दिया है। मिसाल के तौर पर ‘बनवारी नै कुण मारियो’ कहानी में ‘... पण भीतर पाटेड़ौ होवै जद कारी कद लागै?’ ‘कानां सुण्या बोल काळजै जमग्या।” पड़्यां-पड़्यां डील रौ वजन बधै हौ ... स्यात भीतर रौ ई।’ .......इसी तरह कहानी ‘तास री गट्टी’ में भी ‘उण री मुळक मांय ई मांय ढुळी...’ और ‘काकी री गळगळी आंख्यां मांय तास री नूंवीं गट्टी तिरै ही’ जैसे वाक्यों में सूक्ष्म अनुभूतियों और संवेदना को बड़ी कारीगरी से गढ़ा गया है।
कहना होगा कि इस संग्रह की प्रत्येक कहानी वर्तमान जीवन और गांव-देहात की आंतरिक समस्याओं को किसी प्रश्न की तरह प्रस्तुत करती है तो साथ ही जैसे समाधान के लिए भी मौन संकेत भी यहां दिखई देते हैं।
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भाव, भाषा और शिल्प का अनूठा कहानीकार 
० डॉ. नीरज दइया, बीकानेर
समकालीन राजस्थानी कहानी में जिन नए हस्ताक्षरों ने कहानी का मान बढ़ाया है उनमें एक महत्त्वपूर्ण नाम पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ का है। इसके प्रमाण में उनका दूसरा कहानी संग्रह “मेटहु तात जनक परितापा’ देखा जा सकता है। यहां किसी लड़की पर तेजाब फेका जाना, लड़कियों को जन्म से पहले मारना, लिंगानुपात, असमाजिक तत्व, गुंडागर्दी, पर्यावरण और पेड़ आदि अनेक नए घटक राजस्थानी कहानी में जुड़ते हैं।
शीर्षक कहानी में कहानीकार जैसे धर्म को किसी बंधन से मुक्त कर मनुष्यता के मर्म को समझता है। इसे पढ़ते हुए हिंदी के प्रख्यात कहानीकार निर्मल वर्मा की कहानियों का स्मरण होता है। जिन में वर्मा पात्रों के साथ साथ उनके आस-पास की दुनिया को भी जीवंत करते थे। यहां भी पिता और पुत्री की कहानी में पिता की चिंता बेटी है और बेटी के चिंतन में आधुनिकता का रंग। प्रेम-पत्र के माध्यम से कहानीकार द्वंद्व रचता है जिसमें हिंदूं और पंडित पिता के सपनों का रंग कहानीकार राजा जनक और सीता के संदर्भों तक ले जाता है। जाति और धर्म से परे कहानी में नए मूल्यों को स्वीकार करने की स्थितियां प्रभावित करती है।
देश की वर्तमान समस्याओं का स्पर्श करती पूर्ण शर्मा की कहानियां मानवता का पाठ पढ़ाती है। हमारे प्रेम और भाईचारे का इन कहानियों में सकारात्मक पक्ष संजोया गया है। सामाजिक और जातिय असमानता को प्रगट करती कहानी ‘फेर बठैई जीणौ’ इसका उदाहरण है। ‘खिंडतौ आभौ’ कहानी का सरपंच जमीन हड़पने के लिए मंदिर बनावाने की चाल खेलता है। खिलाफत करने वाला वह असमाजिक तत्वों की जोर जबरदस्ती और गुंडागर्दी की हद तक पहुंचना वर्तमान यथार्थ है। पुरखों की जमीन का मोह और इज्जतदार आदमी का द्वंद्व और आस्थाओं का चित्रण प्रभावित करता है।
‘मोरिया आछो बोल्यौ रे’ कहानी लोक संस्कृति के रंग रंगी मनीराम जैसे रेवड़ चाराने वाले के जीवन के चार सुनहरे पृष्ठों की बानगी है। एकदम नई जमीन को स्पर्श करती यह कहानी मां-बेटे के सपनों की कहानी है। बेटी के विवाह का सपना लिए मां संसार छोड़ कर चली गई। और अंततः जब मां का सपना साकार हुआ मगर वह सपने जितना ही सुख हिस्से में था। एक औरत की मार्मिक कहानी से यह कहानी अविस्मरणीय बन सकी है। इसी प्रकार ‘सांयत झील’ कहानी में भी विवाह से जुड़ी वर्तमान संदर्भों की समस्या है।
पूरण की अधिकांश कहानियां पूर्वदीप्ति में छोटे काल खंड के भीतर अपने विगत को लिए वर्तमान को अर्थवत्ता प्रदान करती है। वे पर्यावरण जैसी महत्त्वपूर्ण विषय को जिस भांति कहानी ‘सिम्मट री छोरी’ और ‘बाग चिड़ी अर सुपनौ’ में लेकर आते हैं वह अपने आप में अनूठा है। कहानी अपनी भाषा, प्रयोग और प्रतीकों द्वारा न केवल प्रकृति से हमारी रागात्मकता बढ़ाती है वरन राजस्थानी कहानी की रागात्मकता भी बढ़ाने वाली है। ‘आरसी झूठ बोलै’ कहानी न केवल पी.एच.सी. के कर्मचारियों वरन सभी कर्मचारियों की कहानी इस लिए भी कही जाएगी कि सभी जगह इसी प्रकार के और इस के मिलते जुलते घटना प्रसंग हम देखते-सुनते हैं। ‘बनवारी नैं कुण मारियौ’ कहानी की मार्मिकता प्रभावित करती है कि जरा सी बात न जाने कहां किस स्थल पर चोट कर दे और फिर वह अमिट घाव कहानी में वर्णित स्थितियां भी ला सकता है। ‘तास री गट्टी’ कहानी पढ़ते हुए राजस्थानी के प्रख्यात कहानीकार करणीदान बारहठ की कहानी ‘थे बारै जावो’ का स्मरण होता है। किसी रचना का इस भांति अपनी परंपरा में जुड़ना और विगत भावभूमि का स्मरण होना केवल साम्य नहीं वरन उस शक्ति का प्रवाह है जिससे राजस्थानी कहानी ने विकास यात्रा की है।
भाव, भाषा और शिल्प का अनूठा कहानीकार पूरण अपने इस संग्रह से राजस्थानी कहानी को बहुत आगे ले गया है और निश्चय ही इससे उम्मीदें बढ़ी है कि राजस्थानी कहानी को भारतीय कहानी के प्रागंण में रेखांकित किया जा सकेगा।
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वक्त के साथ कदमताल करती कहानियां
मदन गोपाल लढ़ा, लूनकरनसर (बीकानेर)

    वक्त के साथ कहानी ने रूप-रंग बदला है। आज की कहानी में न तो घटनाओं की भीड़ जरूरी है, न ही कथानक का वर्णन-विस्तार। परिवेश का बारीकी से अंकन समकालीन कहानी की मुख्य प्रवृत्ति है। कथ्य के साथ अब शिल्प का महत्व बढ़ गया है। परिवेश को रचते हुए कहानीकार पात्रों की मनगत को सूक्ष्मता से अंकित करने में अपने कथा-कौशल का उपयोग करते दिखाई देते हैं। पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ की राजस्थानी कहानियों में कहानी के इस बदलते मिजाज को स्पष्ट देखा जा सकता है।
    पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ के दूसरे कहानी-संग्रह ‘मेटहु तात जनक परितापा’ की कहानियां कई मायनों में राजस्थानी कहानी के परंपरागत ढांचे को तोड़कर उसे इक्कीसवीं सदी का तेवर प्रदान करती है। राजस्थानी कहानी को भारतीय भाषाओं की समकालीन कहानी के बराबर खड़ी करने के लिहाज से ऐसे प्रयास जरूरी है। पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ का कहानी रचने का अपना निजी मुहावरा है। कहानी रचने के लिए जिस धीरज की जरूरत होती है वह ‘पूरण’ ने सतत साधना से अर्जित किया है। शिल्प के प्रति सावचेती उनका सबल पक्ष है।
    शीर्षक कहानी ‘मेटहु तात जनक परितापा’ स्त्री मन की व्याकुलता, पिता की विवषता के साथ सामाजिक परिवर्तन को सूक्ष्मता से प्रकाषित करती है। रेवा के प्रेम के प्रति पिता की मौन स्वीकृति अनायास नहीं मिली है बल्कि उसके पीछे समाज का ताना-बाना व वैवाहिक रिवाज बड़ा कारण रहे हैं।
    ‘म्हैं जीणौ चावूं’ धरती के अन्नदाता की चिंताओं व जूझ को सामने लाने वाली सशक्त कहानी है। विकास के लम्बे-चौड़े दावों के बीच किसान-मजदूर तबके के बदतर हालात व्यवस्था की असलियत उजागर कर रहे हैं। यह वाकई त्रासद है कि महंगाई व कर्ज के बोझ तले दबे किसानों को अपघात जैसा कदम उठाना पड़ रहा है। कथानायक का जीवन इस बात का प्रमाण है कि हाडतोड़ मेहनत के बावजूद कमेरा वर्ग दो जून की रोटी मुष्किल से जुटा पाता है। आलोच्य संग्रह में ‘सिम्मट री छोरी’ कहानी शिल्पगत प्रयोग का उल्लेखनीय उदाहरण है। प्रतीकों के माध्यम से आगे बढती यह कहानी प्रकृति, प्रीत व स्त्री जीवन के खुरदरे यथार्थ से रू-ब-रू करवाती है। डिटेलिंग इस कहानी की अन्यतम विषेषता है जो कई अन्य कहानियों में भी ध्यान खींचती है। बानगी देखिए- ‘दरखत री टोगी माथै इब फूल मावता कोनी। पानकौ-पानकौ जाणै फूल हुयग्यौ हो। छोरी बैंच माथै बैठी मुळकती रैवती। दरखत आपरी टोगी सूं फूल झाड़तो जावतौ। जियां-जियां दरखत आपरी टोगी सूं फूल झारतौ, छोरी री आंख्यां रो मून झरतो जावतौ।’
    बाग चीड़ी अर सुपनौ, जोगण, सायंत झील, आरसी झूठ बोलै सहित संग्रह की अन्य कहानियां भी हमारे इर्द-गिर्द के जीवन के विविध रंगों को कहानी के वस्तु-विन्यास में सामने लाती है। इन कहानियों की विषय वस्तु हमारी जानी-पहचानी है मगर कहानीकार का कौशल पाठक को संवेदित कर उसके अनुभव संसार को समृद्ध बना देता है। मरुधरा का जीवन पूरण की कहानियों में पूरी मुखरता से व्यक्त हुआ है। उनकी कहानियों के पात्र जीवट से भरपूर हैं। संघर्ष का यह जज्बा निश्चय ही यहां की मिट्टी से मिला है। अलबत्ता कभी-कभार ऐसा भी लगता है कि पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ का कहानीकार नए विषयों के मोह में स्वाभाविकता खो बैठता है मगर ऐसा अक्सर नहीं होता। बहरहाल इसमें दोराय नहीं है कि पूर्ण शर्मा ‘पूर्ण’ राजस्थानी कहानी की बड़ी संभावना का एक विश्वसनीय नाम है।
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भाषा, भाव और शिल्प की दृष्टि से नए तेवर
० राजूराम बिजारणियां, लूनकरनसर (बीकानेर)

    राजस्थानी साहित्य को समृद्ध बनाने में कितने ही रचनाधर्मी धैर्य के साथ लगे हुए हैं। पद्य और गद्य में लेखन करने वालों की इस भाषा में कमी नहीं है। गद्य साहित्य में कहानी विधा पर सधी गति से काम हुआ और हो रहा है, जिसे भारतीय कहानी के प्रांगण में गर्व के साथ रखा जा सकता है।
राजस्थानी कहानी को 'हरियल' करने वाले ऊपरी पायदान पर जिन कहानीकारों को समकालीन कहानी के लिए अदब के साथ याद किया जा सकता है, उनमें निश्चित रूप से एक नाम पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ है। अपने पहले कहानी संग्रह 'डौळ उडीकती माटी' से साहित्यिक गलियारे की चर्चाओं का हिस्सा बनने में सफल रहे पूर्ण शर्मा 'पूरण' का दूसरा कहानी संग्रह 'मेटहु तात जनक परितापा' अपनी भाषा, भाव-सौंदर्य और शिल्प-सौष्टव की दृष्टि से नए तेवर लिए हुए है। नारी मन की अतल संवेदनाएं, पग-पग पर बिखराव की चिंताएं, दरकते संबंधों से उपजी पीड़ाएं, गांव, हथाई, गवाड़, गलियारों के बदलते मायनों के अनूठे नोट्स समेटे इस संग्रह की कहानियों को कसौटी पर कसें तो यह सफलता की कहानी बयां करता है।
समकालीन कहानी में हम देखते हैं कि कहीं-कहीं अनावश्यक विस्तार और वर्णन से कहानियों में बिखराव की स्थितियां भी बनती है, परंतु इस संग्रह में 'पूरण' की खूबसूरती यह है कि वे कहीं भी विस्तार को हावी नहीं होने देते। कहानी 'सिम्मट री छोरी' प्रतीकों के बेहतरीन प्रयोग की कहानी है। जो किसी भी स्तर पर अपने आप को बेहतर से बेहतर साबित करने में सक्षम है। समय और संदर्भों को समझते हुए कहानीकार पाठकों की नब्ज़ को पहचानने में सफल हुआ है। यही कारण है संग्रह की सभी कहानियां भाषा-भाव के स्तर पर पाठक के साथ सरलता से जुड़ती है। 'बाग, चिड़ी अर सपनो' कहानी समाज के विकराल चेहरे को बेनकाब करने के साथ नारी की अपने ही समाज में सुरक्षा को लेकर सवाल खड़ा करती चिंताओं को उकेरती है। 'कीं तौ बाकी है' कहानी सांप्रदायिकता एवं आर्थिक असमानताओं को जोड़ने वाली कड़ियों को खोलने का प्रयास करती है। वहीं कहानी 'तास री गट्टी' मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करने को मजबूर करती है।
संग्रह की शीर्षक कहानी में उम्र के साथ बड़ी होती बेटी की चिंताओं का रेखांकन एक पिता की जिम्मेदारियों के बीच कुशलता से किया गया है। यह कहानी पूरी होते-होते धर्म के बंधन खोल मानव मन की मर्मस्पर्शी परतों को आहिस्ता से उघाड़ देती है। कहानीकार मर्म तक पहुंचने वाले कुशल चितेरे हैं, जो संवेदना की कड़ियों के सहारे भीतर तक उतरने में सफल रहते हैं। कहानीकार ने जिस यथार्थ को महसूस किया, खुद जिया वह उससे गुजरते हुए आसपास की चिंताओं को अंगीकार करता है। प्रत्येक कहानी की रंगत अलग है, यहां भाषाई नवीनता और प्रयोग है जो पात्रों की चिंताओं, पीड़ाओं और सवालों से प्रत्येक पाठक को साझा करती है। जिस इलाके में पूर्ण शर्मा ‘पूरन’ रहते हैं, वह इलाका पंजाबी और हरियाणवी परिवेश से भी सरोकार रखता है। इस परिवेश की ताक-झांक के बीच कहानीकार शर्मा राजस्थानी भाषा की कहानी यात्रा को पूरी सिद्दत के साथ संभालते, संवारते आगे बढ़ते हैं। इन कहानियों के हिंदी, मराठी और इतर भाषाओं में अनुवाद 'पूरण' को सशक्त कहानीकार के रूप में पहचान दिलवाता है।
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मन-मथने वाली कहानियां 
० बुलाकी शर्मा, बीकानेर

राजस्थानी के युवा कहानीकारों में पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ अपनी खास अलहदा पहचान बनाए हुए कहानीकार हैं। ‘मेटहु तात जनक परितापा’ संग्रह की कहानियों पाठकों को लंबे समय तक विचलित करने वाली है। कहानी-पात्रों की स्थितियों-परिस्थितियों पर पाठक भरे मन से सोचता रहता है- ऐसा क्यों हुआ, ऐसी स्थितियों से कब मुक्ति मिलेगी, कैसे मिलेगी? कहानी-पात्रों की आंतरिक पीड़ा, व्यथा-संत्रास से वह उबर नहीं पाता।
    पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ कहानी में एक-एक क्षण को जैसे सजीव करते चलते हैं। यहां सूरज, चांद, आकाश, पेड़-पौधे, निर्जीव घर तक आ उपस्थित होते हैं सजीव पात्रों के रूप में। यह उनकी शैल्पिक कलाकारी है। बहुत ही सधी हुई, चित्रात्मक भाषा। इस संग्रह में शामिल सभी 15 कहानियां हमें ऐसे संसार से साक्षात कराती है, जहां परिस्थितियां मन को छलनी कर रही है, सपने खंड-खंड हो रहे हैं, स्त्री हो अथवा पुरुष सब ही अंदर से टूटे हुए हैं, वे मार्ग ढूंढ रहे हैं किंतु मिल नहीं पा रहा है। पहले शीर्षक कहानी ‘मेटहु तात जनक परितापा’ की बात करें। कितना विवश है बाप अपनी युवा होती पुत्री रेवा को देखकर। विवाह की उम्र ढलती छब्बीस साल की रेवा की ओर झांकते उसके मन में भय समा जाता है। कहानीकार ने असहाय बाप की व्यथा को मार्मिकता दी है। रेवा किसी से प्रेम करने लगे तो बाप को शुकून ही होगा कि चलो, उसे अपना रास्ता स्वयं तय कर लिया। कब तक वह अपनी शादी की प्रतीक्षा करे? किंतु ‘जोगण’ कहानी की इंदरो कहां जाए, किससे अपना दर्द साझा करे, जब घर में ही उसका देह और मन शोषित हो रहा है। उसका पति जोगी उसको अखंड कुंवारी रखे ही घर छोड़ गया, देवर गोपी से ‘चूडी’ पहनी किंतु गोपी ने उसे छुआ ही नहीं, फिर कैसा पति। और श्वसुर रूपे ने उसके साथ जबरजन्ना किया, फिर भी दोषी औरत ही? औरत की विवश्ता और पुरुष की ज्यादती। इस नंगे सच को कहानीकार ने इन शब्दों में सामने रखा है- ‘एक मरद दूजै मरद रा खोट कद देखै। उणरौ हरेक वार तो लुगाई माथै हुवै।’ (पृष्ठ-62) फिर भी औरतें गोपी और रूपे की मौत पर इंदरो को रोने के लिए जबरदस्ती करती है। क्या ये गोपी और रूपे के चाल-चलन से अपरिचित है? इंदरो के संत्रास को क्यों नहीं महसूसती औरतें ही? पाठक बुरी तरह से विचलित हो जाता है इंदरो के दर्द से।
    ‘बाग चीड़ी अर सुपनो’ कहानी की दीदी, जो चिड़िया की तरह फुदकती साइकिल के पीछे नन्ही चुन्नी को बिठाए कॉलेज जाती-आती थी... कितने सपने संजो रखे थे उसने.... उसको लेकर नन्ही मासूम चुन्नी ने उसने छेड़खानी करनेवाले युवक को थप्पड़ मारा और उसके मुंह-शरीर पर तेजाब फैंक दिया युवकों ने.... । कहां सुरक्षित है औरत? कब साकार होंगे औरत के सपने? औरत ही क्यों, पुरुष के सपने भी कब पूरे होते हैं। यही तो जीवन की त्रासदी है। पूर्ण शर्मा मानव मन के कुशल पारखी हैं। छोटी-सी बात भी स्वाभिमानी पुरुष के लिए मृत्यु का कारण बन सकती है, यह उनकी कहानी ‘बनवारी ने कुण मारियो’ में देख सकते हैं। सच में पूर्ण शर्मा का कहानी-संसार हमें गहरे तईं मन को मथने वाला है। उनको पढ़ते हुए मेरी स्मृति में जैनेंद्र, इलाचंद जोशी की कहानियां आने लगती है। मनोविश्लेषन-मनोवैज्ञानिक घरातल पर अलग कहानी-संसार है उनका।
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बुधवार, 5 अक्तूबर 2016

जितेन्द्र कुमार सोनी का राजस्थानी कविता संग्रह “रणखार” 05

रणखार (राजस्थानी कविता संग्रह) डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी / संस्करण : 2015 / पृष्ठ :80 / मूल्य : 120 रुपये / प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, एफ-77, सेक्टर- 9, रोड नं. 11, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर 
डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी
जन्म : 29 नवम्बर 1981
राजस्थानीऔर हिंदी में समान रूप से सृजनरत। अपने पहले ही राजस्थानी कविता संग्रह “रणखार” हेतु साहित्य अकादेमी नई दिल्ली का युवा पुरस्कार वर्ष 2016 से सम्मानित डॉ. सोनी अनुवाद के क्षेत्र में भी सक्रिय है। राजस्थानी में पंजाबी कवि हरिभजन सिंह रैणू के कविता संग्रह का अनुवाद ‘म्हारै पांती रा पाना’ एवं रस्किन बॉण्ड के कहानी संग्रह का अनुवाद ‘देहरा मांय आज ई उगै है आपणा रूंख’ प्रकाशित। युवा कविता संकलन ‘मंडाण’ और ‘थार सप्तक-6’ में कविताएं संकलित। राजस्थान शिक्षा विभाग के लिए एक संग्रह का संपादन। हिंदी में एक कविता संग्रह व अन्य पुस्तकें प्रकाशित। अनेक संस्थाओं द्वारा मान-सम्मान और पुरस्कार प्राप्त डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी वर्तमान में जिला कलेक्टर, झालावाड़ के पद पर सेवारत है।
 संपर्क- पुराने राधास्वामी सत्संग भवन के पास, रावतसर, जिला हनुमानगढ़ [राज.]
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पुस्तक के ब्लर्ब का अनुवाद :
लोक से जुड़ाव राजस्थानी कविता में बड़ी संभावना 
० रामस्वरूप किसान, परलीका
      मुक्तिबोध लिखते हैं- ‘आदमी के सामने दो ही मार्ग है, या तो वह सच्चा आदमी बने या पशु।’ धूमिल की एक काव्य-पंक्ति है- ‘कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है।’ और इसके अलावा यूनानी दार्शनिक अरस्तु ने युगों पहले कहा था कि आदमी एक सामाजिक प्राणी है, जो नहीं है वह या तो पशु है या फिर देवता।
    अब यदि मुक्तिबोध को अरस्तु और अरस्तु को धूमिल से जोड़ते हैं तो कविता का समाज से जुड़ाव ही उसे कविता बनाता है। नहीं तो वह कुछ और हो सकती है, कविता तो कतई नहीं। और कविता का सामाजिक कवि के सामाजिक से जुड़ा हुआ है। सीधी सपाट बात है, कवि सामाजिक है तो कविता सामाजिक है। दूसरे शब्दों में कविता काम आनी चाहिए। क्यों कि प्रत्येक उत्पाद का अंतिम ध्येय काम आना है। और काम वही उत्पाद आता है जो वस्तुगत और गोचर है। केवल काल्पनिक, जादुई, वायवीय और अमूर्त उत्पाद चौंका सकते हैं, काम नहीं आ सकते हैं।
    पहली और बड़ी बात यह है कि जितेन्द्र कुमार सोनी कवि होने से पहले एक सच्चे मनुष्य होने की शर्त पूरी करते हैं। और ये सभी शर्तों उनकी कविताओं में प्याज के छिलकों की भांति परत दर परत खुलती है। उनका यह संग्रह मनुष्यता का प्रमाण-पत्र है। मुक्तिबोध के अनुसार कवि भले स्वयं को कितना ही छिपाने का प्रयास करे, पर असल में वह रचना के बहाने स्वयं को ही रच रहा होता है। इण हिसाब से यह संग्रह कवि के चरित्र का रचाव है, जो काव्य-यात्रा के लिए ‘रोड-मैप’ का काम करता है।
    जितेन्द्र का यह सृजन एकांत में पकाया हुआ एकांत नहीं है। छिप कर दूर से मारा हुआ शिकार नहीं है और ना ही वातानुकूलित इमारत के किसी झरोखे में दूरबीन लगाकर कैद किया हुआ दृश्य है। इन कविताओं में पसीने से तर मेहनतकश जन का हिस्सा है कवि। समाज के मध्य खड़ा कवि अलग-थलग और विशेष नहीं दिखाता खुद को। उसने अपने निज और आत्म को समाज में मिला दिया है। जितेन्द्र के लिए लोक कोई भीड़ अथवा ईंटों का ढेर नहीं है। उस के लिए लोक विश्व-निर्माता का मूल, जीवन का स्रोत और कलाओं की आगार है। उसे अन्यों की भांति लोक में दुर्गंध नहीं आती। लोक उसके और वह लोक के कलेजे बसता है। इसी लिए कवि अपनी जड़ों से नहीं कटा है। जितेन्द्र का लोक से जुड़ाव राजस्थानी कविता में बड़ी संभावना जगाता करता है।
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तमीज की कविता : रणखार
० पृथ्वी परिहार, दिल्ली
   
हमें अपने बच्चों को नसीब की सीढ़ियों का भ्रम नहीं मेहनत के मजबूत पांव देने चाहिएं कि थार की माटी में दबा दिए गए तरबूजों तक कोई हिम्मती ही पहुंच पाता है।
        “कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है” -धूमिल
    आज जब भी कविता की बात होती है तो दो बड़े सवाल हमेशा सामने आते हैं। प्रकाशक वर्ग कहता है कि कविताएं (वह भी खरीदकर) कौन पढ़ता है;  तो आलोचकों की घोषणा रहती है कि अच्छी कविताएं अब लिखी ही नहीं जातीं। इस लिहाज से देखा जाए तो अभिव्यक्ति और लेखन की यह सक्षम व सुंदर विधा कड़े समकालीन सवालों का सामना कर रही है। कविता के लिए इस संकट को इंटरनेट, सोशल मीडिया व व्हाट्सएप जैसे मैसेजिंग मंचों ने और भी गहरा दिया है जहां कविता के नाम पर थोक के भाव में अधपकी पंक्तियां पाठकों तक पहुंच रही हैं।
    लेकिन कविता के मंच पर सब कुछ निराशाजनक भी नहीं हैं। अपने इर्द-गिर्द कंटीले सवालों के बावजूद पठनीय और संभावनाओं के नए क्षितिज बुनती कविताएं लिखीं जा रही हैं, छप रही हैं और लोग खरीदकर पढ़ते भी हैं। जितेन्द्र कुमार सोनी के राजस्थानी कविता संग्रह ‘रणखार’ की कविताएं भी इसी श्रेणी की हैं। यहां कविता के सामने खड़े हुए एक बड़े सवाल की बात भी करनी प्रासंगिक होगी कि कविता क्या है? कवि चिंतक रामस्वरूप किसान ने फ्लैप पर मुक्तिबोध, अरस्तू व धूमिल के विचारों को एक सूत्र में पिरोते हुए कहा है कि कविता का समाज से जुड़ाव ही उसे कविता बनाता है। नहीं तो वह रचना और कुछ हो सकती है, कविता तो कतई नहीं। इस खांचे से देखा जाए तो जितेन्द्र कुमार सोनी की रचनाएं सुखद आश्चर्य की तरह खुद को कविताएं साबित करती हैं।
    “बड़ी बात यह है कि जितेन्द्र कुमार सोनी कवि होने से पहले एक सच्चा इंसान होने की शर्तें पूरी करते हैं। ये शर्तें उनकी कविताओं में प्याज के छिलके की तरह परत दर परत उघड़ती जाती हैं। सोनी का यह कविता संग्रह उनके मानव होने का प्रमाण है” -रामस्वरूप किसान
        एसिड अटैक / तुम्हारे खातिर एक खबर / फेंकने वाले के लिए एक बदला / पर मेरे लिए / एक त्रासदी है।
    जितेन्द्र कुमार सोनी की कविताओं में मानव रचित और प्राकृतिक.... अनेक विपदाओं पर टीका-टिप्पणी है। वे थार की सांस सुखा देने वाली लुओं के बरक्स् जीवटता को खड़ा कर बताते हैं कि माटी के इस समंदर में परेशानियों की मोटे तनों से मजबूत तो उम्मीदों की कुल्हााड़ी है जो उन्हेंि काटती जाती है। वे कहते हैं कि क्रांति की मशालें खाली पेट वाले नंगे पैर लेकर निकलते हैं। कि इंकलाब का पहला और आखिरी नारा इसी वर्ग से लगता है। उनकी कविताएं- हरसिंगार, गेंदे, कनेर और गुड़हल के फूलों से गुजर हमारे आंगन में उतर आई धूप की बात करती हैं। वे बताते चलते हैं कि वैश्वीकरण जैसे तमाम नये शब्दों के हमारे शब्दकोषों में शामिल होने के बावजूद सर्वहारा व समाजवाद जैसे शब्दों की प्रासंगिकता खत्म नहीं हुई है।
    जितेन्द्र कुमार सोनी की कविताओं में बचपना है, बचपन है, पलायन है, धारावी है, एकांत है.... और सबसे बड़ी बात उनमें हमारे आस-पास का लोक है। इस दौर में जबकि अंग्रेजी बोलना व अंग्रेजी में लिखना ही सफलता का पर्याय मान लिया गया है, कितने लोग अपनी भाषा बोली में लिखते हैं। आई.ए.एस. डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी को इस बात के लिए भी सराहा जाना चाहिए कि उन्होंने कविताओं के लिए मातृभाषा राजस्थानी को चुना है। इस तरह से उन्होंने एक तरह से अपनी रचनाओं को एक पाठक व इलाके तक सीमित रखने का जोखिम उठाने का साहस दिखाया है। जैसा कि रामस्वरूप किसान ने पुस्तक के ब्लर्ब पर लिखा है कि जितेन्द्र कुमार सोनी का लोक से जुड़ाव राजस्थानी कविता में बड़ी संभावना जगाता है।
        पानी- / थार में / एक सवाल है / पीढियों से
        पानी- / बर्फ ही बर्फ होने  के बाद / एक चुनौती है / साइबेरिया जैसे इलाकों में।
        आप ग्लोब पर कहीं भी / अंगुली तो रखो / सभी रिश्तों से पहले / मिलेगा / पानी का रिश्ता।
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जमीन और मनुष्यता से जुड़ाव की कवितावां
० डॉ. नीरज दइया, बीकानेर

    डॉ. जितेन्द्रकुमार सोनी के कविता संग्रह ‘रणखार’ पर बात करने से पहले मैं युवा कवियों की कविता-यात्रा पर बात करना चाहता हूं। इसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं कि मैं युवा कवि की पहली कविता पुस्तक के साथ कविता-यात्रा की चर्चा कर रहा हूं। असल में इसे किसी युवा-मन के कविता तक पहुंचने के अभिप्राय में देखें। राजस्थानी के युवा कवि हिंदी अथवा अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा ग्रहण करते हैं तो उनके समक्ष कविता-लेखन से जुड़ते समय जो परंपरा होती है वह हिंदी-अंग्रेजी मिश्रित अथवा थोड़ी-बहुत राजस्थानी की होती है। यहां परंपरा का अर्थ इस रूप में कि कविता रचना से पूर्व कवि के सामने कविता को लेकर जो विचार-धाराएं और उन कविताओं/ कवियों से हैं जिनसे वे प्रेरणा ग्रहण करते हैं। जितेन्द्र कुमार सोनी अथवा स्वयं मेरे कवि के समक्ष जो परंपरा है वह दिनोंदिन अध्ययन चिंतन-मनन से बदलती हुई आधुनिक से अधिक आधुनिक होगी रहती है। हर किसी की अपनी-अपनी परंपरा होती है, और यह थाती समान नहीं होती है। असाक्षर व्यक्ति के पास लोक-साहित्य की सशक्त परंपरा होती है। किसी कवि को उसकी भाषा और रचना-विधा की परंपरा में जांचने-परखने का कार्य आलोचना करती है। मेरा अभिप्राय है कि सोनी की कविताओं में नई चमक दिखाई देती है तो उनके यह उनके अध्ययन से अर्जित राजस्थानी-हिंदी-अंग्रेजी की मिश्रित कविता-परंपरा के विकास का एक आधुनिक परिदृश्य है।
    आज के अत्याधुनिक युग में तकनीकी विकास साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाले कवि जितेन्द्र कुमार सोनी का सबल पक्ष उनका अपनी अनुभव-संपदा से मनुष्य में मनुष्यता को बचाए रखने की ऊर्जा है। वे कविता में सरल-सहज भाषा से अनेक मार्मिक प्रसंग और बातें उजागर करते हैं। कवि के अंतस का गांव और लोकभाषा के रंगों सजी एक पूरी दुनिया है, जो कविता को नए आयाम देती हैं। एक गांव की जमीन से जुड़ा सिरा है और दूसरा पूरी दुनिया के वर्तमान यर्थाथ से। विकास के नाम पर मनुष्यता के भयावह चित्र यहां देखने को मिलते हैं, तो इस बदलती दुनिया में मनुष्यता को बचाए रखने के स्वप्न कवि कविताओं में संजोता है। ‘इंकलाब’ और ‘सिरजण’ (सृजन) श्रृंखला-कविताएं साक्षी है। जैसे कि कविता ‘इंकलाब-3’ की पंक्तियां है- “वर्चुअल बातों से / महक नहीं आती / गरमास नहीं मिलता / रिस्तों का।” (पृष्ठ-11) एक प्रमाण यह पंक्ति देखें- ‘‘डर यही है कि / आने वाली / पीढ़ियों को / कहीं सोध ना करना हो / कि किस प्रकार / रहकर ठीक सामने-सामने / कर लेते थे लोग / घर-परिवार की बातें ! (पृष्ठ-12) इसी भांति ‘सिरजण-3' में कवि कविता लिखने-रचने की मनः स्थित पर विचार करते हुए लिखता है कि कविता लिखने का सोचकर कविता रची नहीं जाती, वह तो स्वतः प्रस्फुटित होती है। कवि वर्तमान संसार में कविता के बने रहने की आशा में सफलता देखता है।
    संग्रह की कविताओं में घर-परिवार और समाज के अनेक दृश्य हैं जो एक पाठ में ग्रहण करते ही हृदय में सामहित हो जाते हैं। उदाहरण के लिए ‘उडीक’ (इंतजार) कविता में एक यायवर परिवार की स्मृति में अपने विगत का स्मरण कवि करता है। कविता के संसार में कवि अपनी विगत स्मृतियों से सघन जुड़ाव महसूस करता है। कविताओं के परिवेश में जालौर जिले की स्थानीयता रणखार के संदर्भ में जहां जमीन से जुड़े प्रेम और अपनेपन के रंग शब्दों में सहजती हैं, वहीं यह गहरी संवेदनशीलता का परिचय भी है। कहना होगा कि इन कविताओं के माध्यम से जितेन्द्र कुमार सोनी ने युवा कविता को एक नया वितान दिया है। बदलती हवाओं और अपने समय को ये कविताएं नए रूप और अपनी भंगिमाओं के साथ अभिव्यक्त करती हैं, दूसरे शब्दों में कहें तो राजस्थानी युवा कविता के आंगन में दूसरी परंपरा को इतिहास में जोड़ने का प्रयास करती हैं। निसंदेह ‘रणखार’ की कविताएं अपनी जमीन और मनुष्यता से हमारा जुड़ाव बेहतर करने वाली कविताएं हैं।
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संवेदनशील कवि-मन की कविताएं
० माधव नागदा, लालमादड़ी (नाथद्वारा)

      ‘रणखार’ की कविताएं पढ़ कर कहा जा सकता है कि ये संग्रह की कविताएं आज की राजस्थानी युवा पीढ़ी द्वारा रची जा रही कविताओं का एक परिपक्व चेहरा है। यह चेहरा समकालीन राजस्थानी कविता-यात्रा में अलग से रेखांकित किए जाने योग्य है। जमीन से जुड़ी हुई इन रचनाओं की अलग ही तासीर है। इन्हें पढ़ते हुए मन में करुणा और आक्रोश एक साथ उपजते हैं, खासकर ‘इंकलाब’ शृंखला की कविताएँ पढ़कर। ये ‘फील्ड वर्क’ हैं न कि ‘ऑफिस वर्क’। कविता ‘सिरजण : तीन’ इस बात को बखूबी बताती है कि कविता का जन्म आलीशान कमरों में न होकर जिंदगी के थपेड़ों के बीच होता है। कविता लिखना जिंदगी को जीना है। यथार्थ की खुरदरी जमीन पर खड़ी ये कविताएं अनुभव और संवेदना की रगड़ से उत्पन्न आग है। यहाँ विचार अंडर-करन्ट की तरह बह रहा है। हमारे समय के प्रसिद्ध हिन्दी कवि लीलाधार जगूड़ी ने एक जगह कहा है- ‘‘कविता वही अच्छी नहीं होती बल्कि वह भी अच्छी हो सकती है जो हमारी हताशा को थोड़ा ही सही पुचकार कर होश में ला दे। कविता का यह भी एक काम है कि वह अनुभव को विचार में ढाल कर इस तरह तराश दे कि वह हमारी स्मृति का हिस्सा हो जाए।’’
      डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी की कविताएं इससे भी आगे जाकर लगातार अकाल की मार सहते आ रहे आम जन की हताशा-निराशा को न केवल पुचकार रही हैं, बल्कि उनमें हौसला भर रही हैं : ‘पण छोड़ जावांला / थारै महलां माय / चूल्है रो स्वाद / पसीने री सौरम’..... XXX ..... ‘आप मांडो तिजोरी / म्हे खळो / आप रुतबो / म्हे रिस्ता  / आप लालसा / म्हे संतोष’ जैसी पंक्तियाँ इस मरुभूमि के शोषित, पीड़ित, अभावग्रस्त जन की जिजीविषा, संघर्ष-क्षमता और सकारात्मक दीठ को बड़ी शिद्दत के साथ वाणी देती हैं। ‘नैणा भर लूं रंग’ की संप्रेषणीयता और संवेदनात्मकता अद्भुत है। यह कविता गहरी आत्मीयता के साथ बताती है कि कवि उच्च प्रशासनिक अधिकारी बनने के बावजूद, देश के हरे-भरे, प्रकृतिक सौंदर्य से भरपूर हिस्से मसूरी में प्रशिक्षणार्थ पहुंचकर भी अपनी माटी को याद रखता है, याद ही नहीं रखता बल्कि चाहता है- ‘चुण-चुण भर लेवूं अै सगळा / नैणा मांय / अर जाय’र छिड़क द्यूं / म्हारै थार री माटी मांय।’ अपनी माटी के प्रति यह अप्रतिम प्रेम निस्संदेह वंदनीय है।
      इन कविताओं में कई स्थलों पर आए मौलिक प्रयोग और बिम्ब इन्हें दीर्घजीवी और उल्लेखनीय बनाते हैं। वर्तमान समय और समाज के बीच विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी संवेदनशीलता और सृजनात्मकता को बचाए रखने का यह संग्रह एक अनुपम उदाहरण है, अतः इन कविताओं को संवेदनशील कवि-मन की कविताएं कहना सर्वथा उचित है।
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विभेदमूलक व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह का स्वर
० डॉ. जगदीश गिरी, जयपुर

      कविता और विचार में अटूट सम्बन्ध है। विचार ही किसी कविता को गहराई और गरिमा प्रदान करता है। बिना विचार के, महज शाब्दिक चमत्कार के द्वारा कविता रची तो जा सकती है, पर वह क्षणजीवी होती है। विचार कविता को कालजयी बनाता है, परन्तु उसे कविता में ठीक से परोटने की जरूरत होती है।
      युवा कवि डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी के काव्य संग्रह ‘रणखार’ को पढ़ते हुए इसी विचार तत्त्व को लगातार महसूस किया जा सकता है। कवि की प्रतिबद्धता समाज के शोषित, पीड़ित और दलित वर्ग के प्रति है। इस वर्ग की अतिसाधारणता में छिपी हुई असाधारणता को कवि महसूस करता है और पूरी सच्चाई और संवेदनशीलता से उसे प्रकट करता है। कवि इस वर्ग को जाग्रत करने के लिए क्रांति का आह्वान करता है, उन्हें अपनी मौजूदा स्थिति को बदलने के लिए आगे आने की प्रेरणा देता है। कवि का अपने लोक से गहरा जुड़ाव है, वह ‘मसूरी’ में पोलोग्राउंड के पास के पहाड़ों पर बादलों के रंग देखकर विमोहित नहीं होता, बल्कि अपनी ‘मरुभूमि’ को याद करता है। वह अपने अकाल ग्रसित प्रदेश में उन रंगों को छिड़कने की इच्छा रखता है- ‘पण चावूं/ चुण-चुण भर लेवूं अै सगळा रंग/ नैणां मांय/ अर जाय’र छिड़क द्यूं/ म्हारै थार री माटी मांय/ अकाळ सूं जूझता घरां माथै/ किणी गरीब रै चूल्है रै/ असवाड़ै-पसवाड़ै।’
      यही प्रतिबद्धता माउण्ट आबू से संबंधित कविताओं में नजर आती है। ‘बत्तीसो नाळो’, ‘चंद्रावती’, कविताओं में आबू के उस परिवेश को अभिव्यक्ति दी गई है, जिसे सामान्यतः उपेक्षित मानकर छोड़ दिया जाता है। बाबा नागार्जुन ‘मादा सुअर’ को कविता का विषय बनाते हैं तो त्रिलोचन ‘भोरई केवट’ और अनपढ़ बाला ‘चम्पा’ को, ठीक उसी प्रकार सोनी नक्की झील, सनसेट प्वांइट की बजाय आदिवासी गरासिया जनजाति की जीवन-रेखा कहे जाने वाले ‘बत्तीसा नाळा’ पर कविता करते हैं। चंद्रावती नगरी के माध्यम से भी कवि मनुष्य को अहंकार न करने का संदेश देते हैं। किसी समय परमारों की राजधानी रही ‘चंद्रावती’ आज अवशेष मात्र रह गई है। इस बहाने कवि उस सत्ताधारी, अहंकारी वर्ग को सावचेत करता है, जो जन-शोषण आधारित व्यवस्था से अपना विलास रचता है, परन्तु अन्ततः सब-कुछ नष्ट हो जाना है।
      संग्रह की ‘रणखार’ शीर्षक कविता की पृष्ठभूमि में राजस्थान के जालोर जिले से लगती गुजरात की सीमा है, जहां से कच्छ का रन शुरू होता है, वह क्षारीय धरती भारत और पाकिस्तान के मध्य तारबंदी से बंटी हुई है। कोई भी व्यक्ति सीमा के आर-पार नहीं जा सकता। परन्तु बारिश के दिनों में पानी मनुष्य की बनाई इन कृत्रिम सीमाओं को तोड़कर दोनों तरफ बहता है और मानो दोनों तरफ के लोगों से बात करता है- ‘तारां रै दोन्यां कानी/ ओ बांटै मिठास/ अर सारै-सारै रै/ गांवां मांय/ कर ल्यै बंतळ।’
      समाज के तथाकथित सभ्य और संभ्रांत वर्ग के लिए ‘ग्लोबलाइजेशन’ के इस दौर में दुनिया में सर्वत्र सुख ही सुख है। वह इस व्यवस्था में खुश है। उसे लगता है कि अब किसी को कोई दुःख नहीं, कोई बाधा नहीं, परन्तु कवि इस अंतरविरोध को बहुत ही प्रामाणिक ढंग से उठाता है कि अब भी भूखे-नंगे लोगों के लिए जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं भी पूरी करना संभव नहीं है। महलों और झोंपड़ियों का फर्क आज भी वैसा ही है- ‘ग्लोबलाइजेशन रै जुग मांय/ कागदां मांय/ मिट्या हुसी/ अै सबद/ पण आज ई/ ......../ पसीनै री सौरम/ पेट री भूख/ आंतड़ियां री लम्बाई/ मै’ल अर झूंपड़ी रो फरक नीं मिट्यो है।’
      शायद इसी विभेद को पाटने के लिए कवि को सिर्फ एक ही मार्ग सूझता है- वह है इंकलाब। इस संग्रह में इंकलाब सीरीज से कुल आठ कविताएं, इसी विभेदमूलक व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह का स्वर बुलन्द करती हैं। कवि कहता है कि वह दिन अवश्य आएगा जब- ‘म्हारी झूंपड़्यां री भूख/ तोड़’र सोनल किंवाड़/ मै’लां बड़ैली।’
      इंकलाब का यह स्वर ही इस संग्रह को महत्त्वपूर्ण बनाता है।
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करुणा की सलूणी पानीदार आंखें
० आईदानसिंह भाटी, जोधपुर

    डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी का कविता संग्रह ‘रणखार’ पढते समय ऐसा लगा ही नहीं कि यह कवि एक जिले में कलेक्टर है। मैंने पहले संग्रह की कविताएं पढ़ी और बाद में रामस्वरूप किसान की लिखा फ्लैप। किसानजी ने इन कविताओं के जिस लोक-जुड़ाव की बात जी है, मुझे लगता है इसी जमीन पर चर्चा करने से कविताओं का मर्म तक पहुंच सकेंगे।
    ‘इंकलाब’ शीर्षक से संग्रह में आठ कविताएं हैं। ये कविताएं इस संग्रह का आधार तय करती हैं। झूंपड़ियां, नाक बहते नंगे बच्चे, खुरदरा डोकरा, ढेरिया, ढोर, चूल्हे का स्वाद, बळबळती लूएं, मजदूर के सिर से टपकता पसीना, हळ की नोक, खळो, खाली पेट, चौपाल का भाईचारा, हथाई का रस, पनीली आंखों वाला बूढ़ा, पाटों का प्रेम, पींपलों के नीचे बने चबूतरे, गवाड़, समंदर का किनारा, पैदल चलना, लाल, हरे या पीले पीलू, सूखी पोखरें, सूनी कांकड़ां, कठिनाइयां, रंग, ईंडूणी, थार, कोसों दूर से पानी लाना, खेती-पाती, मेह-पानी, काली अंधारी रातें, संवाद-संस्कार, निर्लज संकेत, नारी होने का अहसास इत्यादि राजस्थानी शब्दों से कवि की मनःस्थिति जान सकते हैं कि कवि किस के पक्ष में है। कविता करुणा की कोख से जन्म लेती है। ‘रणखार’ की कविताएं भी इसका प्रमाण है। यह विकसित होने वाला युग सबसे बड़ा और लंबा-चौड़ा होता जा रहा है और आदमी भीतर से छोटा व बावना होता जा रहा है। जो इस विकसित होने वाले में फस गया उसके अंतस का इमी-रस सूख गया। जितेन्द्रकुमार सोनी के कविता-संग्रह ‘रणखार’ को पढ़ते हुए मुझे मेरे कविता-संग्रह ‘हंसतोड़ां होठां रौ साच’ की कविताओं का स्मरण हो आया, जिन में मैंने अकाल-दुकाल से जूझते मनुष्यों की कठिनाइयों के कुछ बिम्ब प्रस्तुत किए थे।
    आस : अेक, आस : दो, फुटपाथ पर बैठ्यै बाप रा सुपना, कचरो, धारावी, अकूरड़ी, उडीक, छोरियां इत्यादि कविताएं करुणा की कोख से उपजी हैं। कवि का संवेदनशील मन वहां परिक्रमाएं करता है, जहां मनुष्यता रो रही है, पीड़ाएं-दुख और कष्ट हैं। ग्रामीण जन-जीवन कवि के ईर्द-गिर्द घूमता रहता है पर साथ ही कवि महानगरीय समस्याओं पर भी नजर रखता है। ‘छोरियां’ नामक कविता में ‘रेड लाइट एरिया’ की पीड़ा पर अंगुली रखता है। स्त्री की दुर्दशा और अपने घरों में खपती औरतों को देख कर कवि का अंतर्मन परेशान है।
    ‘सिरजण’ शीर्षक की तीन कविताओं में कविता के सृजन-पक्ष की बात है। ‘सिरजण : एक’ में कवि लिखता है- ‘कविता / सिरजण खातर / कवि / सबदां री आली माटी नै / अणभण रै ढेरियै कातै / जमानै री धौंकणी तपावै / अर नवी निजर रै / ताणै-बाणै बुणै / कविता री चादर |’ यहां नई नज़र का ताना-बाना बुनना खास है। कवि सृजनकर्ता है। कविता कवि की दृष्टि में शास्वत है। कवि के शब्द हैं– ‘नीं भायला नीं / कविता तौ उपजै / कदै बस री भीड़ मांय / धक्कां रै बिचाळै / कदै रासण री कतार मांय ऊभां-ऊभां / कदै न्हावतां, गुणगुणावतां / अर कदै किणी री मुळक माथै रीझ’र / का पछै किणी रै आंसुवां सूं पसीज’र।’ कविता-सृजन की इस दृष्टि में कर्मयोग के आलाप भी समाहित हैं। करुणा संग प्यार-मोहब्बत का दृष्टिकोण भी शामिल है।
    जोडायत, बिछोह, निरखणो, बत्तीसो नाळो, प्रवासी-एक, प्रवासी-दो, पाणी, नवा सबद, एकलापो जैसी कविताएं कवि ने आपने आस-पास के जीवन पर नजर रखते हुए सृजित की हैं। संग्रह की कविताओं में बिछोह की पीड़ाएं और संवेदनशील प्रवासी-मन की धड़कनें हैं। जितेन्द्रकुमार सोनी की ये कविताएं पाठक तक उनकी भाषा की सहजता से पहुंचती है। कुछ तत्सम शब्दों से बचा जाता तो बेहतर था। परंतु प्रथम कृति में ऐसे बातों से नहीं बचा जाता। रामस्वरूप किसानजी की पंक्ति पुनः स्मरण कराता हूं– ‘जितेंद्र का लोक से जुड़ाव राजस्थानी कविता में बड़ी संभावना की सूचना है।’
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पुस्तक मेले 2018 में

पुस्तक मेले 2018 में
राजस्थानी कहानी का वर्तमान ० डॉ. नीरज दइया

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